आस्था की आड़ में पशुओं की बलि?

Published at :21 Jul 2015 1:22 AM (IST)
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आस्था की आड़ में पशुओं की बलि?

दुनिया के सुंदरतम देशों में भारत एक है. विश्व शांति और अहिंसा का सबक सिखाने में इसकी भूमिका अहम रही है. यह साधु, संतों, फकीरों, महापुरुषों और धर्मगुरुओं का देश है. यहां सभी धर्मो के लोगों को स्वतंत्र व समान रूप से जीने का अधिकार है. इस अधिकार से देश के पशु-पक्षी भी अछूते नहीं […]

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दुनिया के सुंदरतम देशों में भारत एक है. विश्व शांति और अहिंसा का सबक सिखाने में इसकी भूमिका अहम रही है. यह साधु, संतों, फकीरों, महापुरुषों और धर्मगुरुओं का देश है. यहां सभी धर्मो के लोगों को स्वतंत्र व समान रूप से जीने का अधिकार है. इस अधिकार से देश के पशु-पक्षी भी अछूते नहीं हैं.
यह विडंबना ही है कि 21वीं सदी के आधुनिक युग में भी हम अंधविश्वास में पशुओं की बलि देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते. प्राचीन काल से प्रचलित यह प्रथा एक अहिंसावादी सभ्य समाज को झकझोर कर रख देती है.
पूर्व मान्यताओं के चलते, हमारे समाज में आज भी आस्था के नाम पर अनेक भ्रांतियां हैं, जिसे कठोर कानून बना कर सक्रियता से दूर करने की जरूरत है. अपनी चाहतों को पूरा करने के लिए इंसान किसी भी देवी-देवता से मन्नत मांगता है. संयोगवश सबों की चाहत पूर्ण नहीं होती. बिरले ही होते हैं, जिनकी आकांक्षा पूरी हो जाती है.
जिनकी मंशा पूरी हो जाती है, वे इसे देवी-देवताओं का चमत्कार मान कर पशुओं की बलि चढ़ाते हैं. यह जो पुरानी मान्यता और प्रथा है, वह उचित प्रतीत नहीं होती है. यह कानूनी, धार्मिक और मानवीय तौर पर भी अमान्य है. चूंकि, दुनिया के पशु भी देवी-देवताओं की कृपा से ही पैदा होकर मनुष्यों की तरह विकास करते हैं. इस लिहाज से यदि उनकी बलि चढ़ाई जाती है, तो यह ईश्वरीय प्रक्रिया के विपरीत मानी जानी चाहिए.
ऐसे में यदि कोई पुरानी मान्यताओं की लीक पर चलते हुए पशुओं की बलि चढ़ाता है, तो वह जघन्य अपराध है. हमारा यह मानना है कि भारत के लोगों को पुरानी परंपराओं और मान्यताओं के अनुरूप पशु बलि से बचना चाहिए. इसके साथ ही सभ्य समाज के लोगों को रूढ़िवादियों को जागरूक करने का अभियान चलाना चाहिए.
बैजनाथ महतो, हुरलुंग, बोकारो
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