गंगा का पुण्य और भक्तों का पाखंड
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :17 Jul 2015 1:50 AM (IST)
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तरुण विजय राज्यसभा सांसद, भाजपा गंगा और भारतवर्ष एक-दूसरे के पर्याय हैं. यदि सिंधु नदी के कारण हमारा और हमारी सभ्यता का नाम हिंदू तथा देश इंडिया और हिंदुस्तान कहलाया, तो गंगा के कारण हमारी सांस्कृतिक विरासत और पहचान सारी दुनिया में मान्य हुई. हमारे लिए गंगा हमारी मां और हम उसकी संतान. जन्मते ही […]
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तरुण विजय
राज्यसभा सांसद, भाजपा
गंगा और भारतवर्ष एक-दूसरे के पर्याय हैं. यदि सिंधु नदी के कारण हमारा और हमारी सभ्यता का नाम हिंदू तथा देश इंडिया और हिंदुस्तान कहलाया, तो गंगा के कारण हमारी सांस्कृतिक विरासत और पहचान सारी दुनिया में मान्य हुई. हमारे लिए गंगा हमारी मां और हम उसकी संतान.
जन्मते ही बच्चे के मुख में गंगाजल की दो बूंदें और अंतिम समय महाप्रयाण करते हुए मुख में दो बूंद गंगाजल की पड़ जाये, तो जीवन धन्य मान लिया जाता है. स्नान, ध्यान और पूजन के समय जिन पवित्र नदियों का आह्वान करते हुए कार्य आरंभ किया जाता है, उनमें गंगा का नाम सबसे पहले आता है- गंगे च यमुने चैव गोदावरी, सरस्वती.
भारत के लोग विदेशों में जहां भी गये, गंगा नदी और गंगाजल का अवतरण कर दिखाया. मॉरीशस में कोटलुई के सबसे बड़े तालाब को गंगा तालाब नाम दे दिया और वहां सभी हिंदू रीति-रिवाज उसी धार्मिक श्रद्धा और विश्वास से पूरे किये जाते हैं, जैसे वे भारत में गंगा तट पर किया करते थे. सूरीनाम की राजधानी पारामारिबू की सबसे बड़ी नदी के किनारे गंगा घाट बना है. वैसे भी गंगा मैया वहीं अवतरित हो जाती हैं, जहां कोई भगीरथ श्रद्धा और विश्वास से उनका आवाहन करता है. संत रविदास पेशे से चर्मकार थे, पर ऐसे गंगाभक्त, कि जिस कठौती (चमड़ा धोने का पात्र) में वे काम करते थे, उसी में गंगा प्रकट हो गयीं और तब से मुहावरा भी चल पड़ा कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा.’
यह गंगा उत्तराखंड से गोमुख से निकलती है और ढाई हजार किमी की यात्रा कर गंगा सागर में लीन होती है. वैसे स्वामी प्रणवानंद जी के शोध के अनुसार गंगा का उद्गम कैलास-मानसरोवर क्षेत्र में है. गोमुख में भगीरथ अपने साठ हजार पूर्वजों की मुक्ति के लिए शिवजी की तपस्या कर उनकी जटाओं से गंगा की धारा धरती पर उतार लाये थे, इसलिए गोमुख से प्रकटी गंगा भागीरथी कहलायीं. आगे देवप्रयाग में जब उसका अलकनंदा से संगम होता है, तब सम्मिलित धारा को गंगा नाम से पुकारा जाता है. गोमुख हिमनद 12,770 फीट की ऊंचाई पर है.
टिहरी के पास भागीरथी पर विराट बांध बांधा गया है, जिससे निचले मैदानों की ओर गंगा का जल गरमियों में नियंत्रित करते हुए छोड़ा जाता है. जो गंगा हजारों वर्षो से अठखेलियां करती अबाधित बहती आ रही थी, उसे विकासशील समाज की राजनीति ने ऐसा तोड़ा कि टिहरी बांध की झील दूर से देखने पर दहशत भरा जल का विराट ठहरा हुआ मौन विस्तार प्रतीत होता है. पहाड़ से जंगल भ्रष्टाचार तथा धन लोलुपता के कारण कट गये, तो पर्वतों का क्षरण बाढ़ और प्रलय जैसी दुर्घटनाएं लाता है. दो वर्ष पहले केदारनाथ त्रसदी में सात हजार यात्रा ी मारे गये थे.
उत्तराखंड से आगे चलते हुए गंगा में कन्नौज के पास रामगंगा का विशाल प्रवाह मिलता है, तो प्रयाग में यमुना एवं अदृश्य सरस्वती गंगा में त्रिवेणी संगम का महान तीर्थ सृजित करती है. प्रयाग से आगे बढ़ते हुए पश्चिम बंगाल के मालदा तट पहुंचते-पहुंचते अनेक नदियां और जलप्रवाह गंगा में मिलते हैं.
वहां फरक्का बैराज गंगा के प्रवाह को नियंत्रित करता है और कुछ जल हुगली की ओर लहर में प्रवाहित होता है, शेष बांग्लादेश जाता है. हुगली में पुन: गंगा भागीरथी कहलाती हैं. बायीं ओर का प्रवाह पद्मा और दायीं ओर का प्रवाह भागीरथी. भागीरथी कोलकाता से 150 किमी दूर गंगासागर में पहुंच कर बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है, तो पद्मा का प्रवाह बांग्लादेश की ओर जाकर ब्रह्मपुत्र और मेघना से मिलते हुए बंगाल की खाड़ी में जा समाता है.
गंगा का जल प्रवाही क्षेत्र भारत में सबसे विराट और विस्तृत है, जो भारत के भू-क्षेत्र का 26 प्रतिशत है. यह क्षेत्र भारत की 43 प्रतिशत जनसंख्या को सहारा देता है. यह गंगा आज अपने ही भक्तों के कारण प्रदूषित एवं आचमन स्नान के अयोग्य होती जा रही है. गंगोत्री से ही गंगा में कूड़ा-कचरा बहाना शुरू हो जाता है, जो हुगली तक हजारों कारखानों के प्रदूषित जल तक चलता रहता है. गंगा को प्रदूषित करने कोई तुर्क, मंगोल या अरब नहीं आये, जो लोग गंगा के किनारे मुक्ति की आस लिये आते हैं, उन्होंने ही गंगा को खत्म किया.
उत्तराखंड में कम-से-कम 24 ऐसे जल विद्युत संयंत्र गंगा पर बने हैं, जिससे गंगा खतरे में आ गयी है. हरिद्वार में मैला और अन्य कचरा बहाने के कारण हर की पौड़ी के पास गंगाजल में प्रदूषण 1,000 एमपीएन प्रति 100 मिली से 400.6 लाख एमपीएन प्रति 100 मिली तक पाया गया है. स्थिति यह है कि यदि आप हरिद्वार में हरकी पौड़ी पर स्नान करेंगे, तो प्रदूषित जल से बीमार पड़ जायेंगे. हुगली व दक्षिणोश्वर (कोलकाता) के पास गंगाजल के प्रदूषण का स्तर 50,000 एमपीएन प्रति 100 मिली पाया गया है.
दक्षिणोश्वर में लाखों भक्त गंगा स्नान करते हैं. यहीं वह काली मंदिर है, जहां रामकृष्ण परमहंस पूजा करते थे. यहां गंगाजल में प्रदूषण का स्तर 1,10,000 एमपीएन प्रति 100 मिली पाया गया है, जबकि स्नान के लिए शुद्धता का स्तर न्यूनतम 500 एमपीएन प्रति 100 मिली निर्धारित किया गया है.
क्या यह संभव है कि गंगा किनारे शवों का अंतिम संस्कार करने की पद्धति को बदला जा सके और भक्तगण अपने प्रियजन के पार्थिव शरीर पर गंगाजल छिड़क कर या तो विद्युत शवदाह गृह में अंतिम संस्कार करें अथवा कम-से-कम गंगा में चिता की भस्म प्रवाहित न करें? गंगा में दुर्गा पूजा की मूर्तियों और गणपति का विसर्जन भी रोका जाना चाहिए.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘नमामि गंगे’ योजना का श्रीगणोश एक बहुत आशादायी कदम है. पहली बार गंगा की स्वच्छता के लिए उमा भारती के नेतृत्व में अलग मंत्रलय बना. केंद्रीय नौ-परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मई 2015 में राष्ट्रीय जल मार्ग विधेयक 2015 प्रस्तुत कर एक क्रांतिकारी कदम उठाया, क्योंकि यदि गंगा में जल का स्तर बढ़ाते हुए नौ-परिवहन प्रारंभ हो सकेगा, तो गंगा का प्राचीन वैभव लौट सकेगा. हल्दिया से इलाहाबाद तक गंगा का 1630 किमी प्रवाह राष्ट्रीय जलमार्ग प्रथम कहा जाता है.
यह पश्चिम बंगाल, बिहार और पूर्वी यूपी के उन क्षेत्रों से गुजरता है, जो देश के सबसे गरीब एवं ढांचागत सुविधाओं से विहीन क्षेत्र हैं. गंगा जलमार्ग इन क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था बदल सकता है और देश में माल परिवहन का एक नया अध्याय प्रारंभ हो सकता है. इतना ही नहीं, ब्रह्मपुत्र के राष्ट्रीय जलमार्ग द्वितीय के साथ भी जलमार्ग प्रथम जुड़ कर पूर्वोत्तर को समृद्धि का वरदान दे सकता है. इन जलमार्गो का पुनरुज्जीवन रेलवे के एक-तिहाई मालवाह बोझ का कम कर देगा.
गंगा भारत के आर्थिक उदय का मेरूदंड है. एक बार यदि गंगा की स्वच्छता और उसके जलप्रवाह की शक्ति पुन: लौट आती है, तो भारत समृद्धि का केंद्र बन सकता है. वास्तव में गंगा भारत की आर्थिक राजधानी है. इसको इसी रूप में स्वीकार कर नवीन भारतवर्ष का अभ्युदय गंगा के माध्यम से हो सकता है.
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