दो कदम उस राह चल कर तो दिखायें!
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :04 Apr 2015 5:15 AM (IST)
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सदस्य-संख्या में हुई भारी ‘बढ़ोतरी’ से भाजपा के नेताओं और समर्थकों का उत्साहित होना स्वाभाविक है. बंगलुरू में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में चुनावी जीत के सिलसिले और सांगठनिक ताकत बढ़ने का आत्मविश्वास भी झलक रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अध्यक्ष अमित शाह का जो प्रशस्ति-गान किया, वह भी उचित ही है. […]
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सदस्य-संख्या में हुई भारी ‘बढ़ोतरी’ से भाजपा के नेताओं और समर्थकों का उत्साहित होना स्वाभाविक है. बंगलुरू में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में चुनावी जीत के सिलसिले और सांगठनिक ताकत बढ़ने का आत्मविश्वास भी झलक रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अध्यक्ष अमित शाह का जो प्रशस्ति-गान किया, वह भी उचित ही है.
लेकिन शाह की नेतृत्व-क्षमता और पार्टी की बढ़त को महात्मा गांधी और डॉ राममनोहर लोहिया के जीवन और योगदान से जोड़ कर देखना निश्चित रूप से आपत्तिजनक है, क्योंकि उन महान नेताओं के विराट व्यक्तित्व के साथ ऐसी प्रशंसात्मक उपमाओं का प्रयोग उनके कद को छोटा करने का प्रयास भी प्रतीत होता है.
इसमें कोई संदेह नहीं है कि अमित शाह ने लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक अपने रणनीतिक कौशल का जोरदार प्रदर्शन किया है और पार्टी को राजनीतिक सफलता की राह पर अग्रसर किया है. परंतु, क्या गांधी, लोहिया, बाल गंगाधर तिलक, जयप्रकाश नारायण जैसे राजनेताओं का मूल्यांकन का आधार सिर्फ उनकी नेतृत्व-क्षमता होगी?
क्या उनके उदाहरण सिर्फ जनता को लामबंद करने के संदर्भ में प्रयुक्त होंगे? अगर उनके नाम और काम को किसी व्यक्ति या संगठन से जोड़ा जायेगा, तो क्या यह विचार नहीं किया जायेगा कि उस व्यक्ति या संगठन की राजनीतिक और वैचारिक पृष्ठभूमि क्या है? दुर्भाग्य से आधुनिक भारतीय इतिहास की विभूतियों को सत्ता और राजनीति के खेल में ब्रांड के रूप में भुनाना हमारे राजनीतिक वर्तमान की आम प्रवृत्ति बन गयी है.
राष्ट्र-निर्माताओं का नाम भुना कर अपने औचित्य को रेखांकित करनेवाले नेताओं और पार्टियों को कुछ ठहर कर उनके आदर्शो और मूल्यों से भी परिचय कर लेना चाहिए.
हमारे नेताओं और राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना चाहिए कि जिन महान लोगों का उल्लेख वे अकसर करते रहते हैं, उनके सिद्धांतों, विशिष्टताओं और आदर्शो को कितना आत्मसात किया है तथा अपने आचरण व नीतियों में परिलक्षित किया है. गांधी और लोहिया जैसे लोग मात्र संज्ञाएं नहीं हैं, बल्कि उच्चतम मूल्यों के प्रतिनिधि हैं. नेताओं को उनका नाम जप कर राजनीतिक लाभ लेने की जगह उनके अनुगमन और अनुसरण की कोशिश करनी चाहिए.
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