महिला आरक्षण : दिल्ली बनाम दक्षिण की लड़ाई अब तेज होगी

Published at :20 Apr 2026 7:04 AM (IST)
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pm modi

नरेंद्र मोदी

women reservation : लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा की निरंतर जीत का कारण भी उसकी सटीक रणनीति रही है. अब तक अपने सभी महत्वाकांक्षी अभियानों को सफलता से अंजाम देकर वह विपक्ष की विफलता को भी बार-बार उजागर करती रही है.

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women reservation : महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक का शुक्रवार को लोकसभा में गिर जाना एक बड़ी राजनीतिक घटना है. पिछले लगभग बारह साल में यह पहली बार है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की तरफ से पेश किया गया कोई संविधान संशोधन विधेयक संसद में गिर गया हो. जाहिर है, इस बिल का पास न हो पाना सरकार के लिए बड़ा झटका है. हमने अभी तक देखा है कि यह सरकार बड़े नपे-तुले ढंग से अपने अभियानों को अंजाम देती रही है.

लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा की निरंतर जीत का कारण भी उसकी सटीक रणनीति रही है. अब तक अपने सभी महत्वाकांक्षी अभियानों को सफलता से अंजाम देकर वह विपक्ष की विफलता को भी बार-बार उजागर करती रही है. लेकिन लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक 68 मतों से गिर गया. बिल के समर्थन में 298 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में 230 मत पड़े. लोकसभा में इतने मतों का फर्क बहुत अधिक होता है. हालांकि संसद में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए दो तिहाई बहुमत जुटाना सरकार के लिए बहुत आसान नहीं था.

इसके बावजूद उसने संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने की कोशिश की. यह अलग बात है कि दो दिनों तक चली लंबी बहस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपीलों के बावजूद सरकार इसे पारित कराने के लिए आवश्यक आंकड़ों का जुगाड़ नहीं कर पायी. बेशक विपक्ष इसे पारित न कराने पर अड़ा हुआ था, लेकिन सदन में बिल पारित कराने की जिम्मेदारी तो सरकार की ही होती है.


जहां तक विपक्ष की बात है, तो उसने 2023 में महिला आरक्षण विधेयक को समर्थन दिया था. लेकिन इस बार सरकार ने महिला आरक्षण को परिसीमन से जिस तरह जोड़ दिया, विपक्ष उससे असहमत था. बहस के दौरान विपक्षी नेताओं ने कहा भी कि वे महिला आरक्षण के विरोधी नहीं हैं और 2023 में उन्होंने इसका समर्थन किया ही था. दरअसल परिसीमन के जरिये लोकसभा क्षेत्रों को फिर से निर्धारित किया जाना है, और गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को बताया था कि परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटें बढ़कर 816 हो जाएंगी और इनमें सभी राज्यों की सीटों में 50 फीसदी की वृद्धि होगी.

लेकिन विपक्ष की आशंका थी कि भाजपा ने असम और जम्मू-कश्मीर में परिसीमन के जरिये जो बदलाव किया, वही बदलाव वह पूरे देश में इसके जरिये करना चाहती है, जिससे देश पर भाजपा के स्थायी कब्जे की आशंका पैदा होगी. विपक्ष का यह भी मानना था कि परिसीमन के जरिये उत्तर भारत की राजनीतिक ताकत और बढ़ती, जिससे भाजपा के और मजबूती से उभर कर आने की संभावना मजबूत होती. दक्षिण के राज्य परिसीमन के मामले में पहले से ही सशंकित हैं. कांग्रेस भी कमोबेश अब दक्षिण की पार्टी ही रह गयी है, क्योंकि वहां के दो राज्यों-कर्नाटक और तेलंगाना में उसकी सरकार है, इसलिए वह भी इसके खिलाफ खड़ी हो गयी.


संविधान संशोधन विधेयक को गिराने में कांग्रेस की बड़ी भूमिका रही, जिसने इंडिया के अपने गठबंधन सहयोगियों को इस मुद्दे पर एकजुट किया. इस मुद्दे पर कांग्रेस के अलावा तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक ने विपक्षी तालमेल का परिचय दिया, तो अखिलेश यादव ने संसद में मोर्चा संभाला. विपक्ष ने सरकार पर यह आरोप लगाया कि महिला आरक्षण को तुरंत लागू करने के बजाय वह इसे भविष्य की अनिश्चितता में डाल रही है. पिछले बारह साल में पहली बार विपक्ष ने इतनी सटीक रणनीति के साथ सरकार को घेरा और एक सुर में परिसीमन को चुनावी नक्शा बदलने की साजिश बताकर वोटिंग में सरकार को पछाड़ दिया.

यह विपक्षी एकजुटता अगर बरकरार रही, तो आने वाले दिनों में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है. संविधान संशोधन विधेयक का पारित न हो पाना भले ही सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक झटका हो, लेकिन इसका असर आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति और दूसरे राजनीतिक दलों पर पड़ने वाला है. परिसीमन से उत्तर बनाम दक्षिण की लड़ाई जोर पकड़ चुकी थी, भले ही भाजपा ने लगातार इसका खंडन किया.

अब दिल्ली बनाम दक्षिण की यह लड़ाई और तेज होगी. यह अनायास नहीं है कि संविधान संशोधन विधेयक गिरने के तुरंत बाद स्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु ने दिल्ली को हरा दिया है. और दिल्ली बनाम दक्षिण की इस लड़ाई में क्षेत्रीय उपराष्ट्रीयता को लाभ होगा. यानी आने वाले दिनों में तमिल गौरव, बांग्ला गौरव आदि मुद्दे प्रखरता से सामने आ सकते हैं. इस विधेयक को पारित न होने देने को दक्षिण भारत अपनी जीत भले ही बता रहा हो, लेकिन भविष्य में जनगणना के आधार पर जब भी परिसीमन होगा, तब दक्षिणी राज्यों को उसका नुकसान होना तय है.

इसका कारण यह है कि 2011 की जनगणना के आधार पर भाजपा दक्षिणी राज्यों में 50 फीसदी सीटों में वृद्धि की गारंटी दे रही थी, हालांकि यह गारंटी लिखित नहीं, बल्कि मौखिक ही थी. लेकिन 2026-27 या उसके बाद की जनगणना के आधार पर अगर परिसामन होगा, तो दक्षिणी राज्यों की सीटें बहुत कम हो जायेंगी, क्योंकि दक्षिणी राज्यों की आबादी में काफी कमी आयी है. इसीलिए दक्षिण की मांग है कि परिसीमन का आधार सिर्फ जनसंख्या नहीं, बल्कि उसमें राज्यों के आर्थिक प्रदर्शन को भी शामिल करना चाहिए. पर इतना तो तय है कि परिसीमन का मुद्दा भविष्य में दक्षिण के राज्यों को परेशान करता रहेगा.


संविधान संशोधन विधेयक पारित हो जाने पर निश्चित रूप से भाजपा को उसका चुनावी लाभ मिलता. लेकिन चूंकि ऐसा नहीं हुआ है, ऐसे में, अब भाजपा चुनावों में महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा जोर-शोर से उठायेगी. पिछले कुछ वर्षों में भाजपा की चुनावी जीतों में महिला वोटरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, चाहे वह महाराष्ट्र हो, दिल्ली हो या फिर बिहार. हालांकि महिला आरक्षण का मुद्दा उठाने से ही देशभर की महिला वोटरों का समर्थन उन्हें मिलेगा ही, इसकी गारंटी नहीं है.

आज की महिला वोटर बेहद स्मार्ट हैं और जब तक उन्हें कुछ ठोस नहीं मिलता, तब तक वे किसी के समर्थन में नहीं आ जातीं. हां, उत्तर भारत की महिला वोटर भाजपा के पक्ष में जरूर गोलबंद हो सकती हैं. संविधान संशोधन विधेयक के गिरने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि महिला आरक्षण लटक गया है, और मुझे तो लंबे समय तक इसके लागू होने की संभावना नहीं दिखती. यह इसका सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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नीरजा चौधरी

लेखक के बारे में

By नीरजा चौधरी

नीरजा चौधरी is a contributor at Prabhat Khabar.

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