साहब हमें तो बस हमदर्दी चाहिए

Published at :01 Apr 2015 4:45 AM (IST)
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साहब हमें तो बस हमदर्दी चाहिए

अजीत पांडेय प्रभात खबर, रांची अमूमन हमारी आदत होती है आदर्शवाद पर भाषण खूब देते हैं, लेकिन खुद करते कुछ नहीं. अपना सारा समय खुद को सही और महान साबित करने में जाया होता है. हम खुद हर किसी से आसमान तक अपेक्षाएं रखते हैं. चाहे नेता हों, जनप्रतिनिधि हों, दोस्त-मित्र हों, सहकर्मी हों या […]

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अजीत पांडेय

प्रभात खबर, रांची

अमूमन हमारी आदत होती है आदर्शवाद पर भाषण खूब देते हैं, लेकिन खुद करते कुछ नहीं. अपना सारा समय खुद को सही और महान साबित करने में जाया होता है. हम खुद हर किसी से आसमान तक अपेक्षाएं रखते हैं. चाहे नेता हों, जनप्रतिनिधि हों, दोस्त-मित्र हों, सहकर्मी हों या बॉस, परिजन हों, पत्नी हो या फिर संतान.

सबसे हमारी बस यही शिकायत रहती है कि सामनेवाला हमारी बात नहीं सुन रहा. दूसरों से दुखड़ा रोओ और फिर अपने लिए सहानुभूति इकट्ठा करो. खैर, यह तो रही निजी जिंदगी की बात. इससे सभी लोग दो-चार होते रहते हैं. राजनीति भी इससे कुछ अलग नहीं है. नेता सीधे जवाबदेही से बचते रहते हैं. सवाल उठे तो उसे दूसरों पर उछाल दो. नहीं तो सवाल के बदले सवाल दाग दो.

बस जवाब नहीं देना. फिर भी सवाल उठे तो नाराज हो कर मुद्दे से ध्यान भटका दो. साहब, हमें तो केवल हमदर्दी चाहिए. चाहे दोस्तों के सामने दुखड़ा रोयें. नेता जनता के सामने. मुङो तो यही लगता है. कोई कुछ भी करके दूसरों के मन में अपने लिए हमदर्दी या सहानुभूति पैदा करने की कोशिश में जुटा है. वह अगर ऐसा कर लेता है, तो वह सफल है.

कुल मिलाकर भावना या ‘इमोशन’ का खेल है सारा. जनाब क्या नहीं हो सकता है इस ‘हमदर्दी’ से. इस सहानुभूति से चुनाव जीतने से लेकर आप गर्लफ्रेंड तक बना सकते हैं. यही नहीं अगर सामनेवाले के मन में आपके लिए हमदर्दी जाग गयी है, तो उससे आप अपनी जिद या अपने मन की बात मनवाने के लिए अच्छी तरह से ब्लैकमेल भी कर सकते हैं. हमदर्दी भी कई टाइप्स की होती है. दुखड़ा रो कर. (बशर्ते वह बनावटी न लगे), किसी के लिए सैक्रीफाइज (कुर्बानी) देकर, दीन-हीन बन कर, चारण बन कर या चापलूसी करके. अगर आप कुर्बानी दे कर हमदर्दी पा चुके हैं तो सामनेवाला मौका आने पर आपको कोई बड़ा पद-लाभ देकर जरूर उपकृत करेगा. राजनीति में अकसर यह होता है.

गंठबंधन की राजनीति में अगर लोकसभा या विधानसभा की फंसी किसी सीट से अपना दावा खत्म करते हैं पार्टी अध्यक्ष की नजर में ऊंचे उठ जायेंगे. उसके हाथ में जो भी होगा समय आने पर जरूर देगा. कुछ नहीं किया तो संगठन में कोई बड़ा पद दे देगा. उससे नहीं हुआ तो समय आने पर उच्च सदन में भेज देगा. केंद्र में सत्तारूढ़ है तो मंत्री बनवा देगा.

नहीं तो निगम या परिषद की अध्यक्षी तो कहीं गयी नहीं है. लेकिन अगर आप बागी हो गये. तो फिर पार्टी से बाहर का रास्ता तय है. इसलिए निष्ठा तो बड़ी चीज है. जनश्रुतियां हैं कि पार्टी और एक परिवार की सेवा करके एक महिला गवर्नर से प्रेसिडेंट तक हो गयीं. यही चीज सब जगह कारगर है. बस, कौन कब किस तरह कैसे इसका इस्तेमाल कर लेता है और आगे बढ़ जाता है. हां, इसमें समय का फैक्टर जरूर महत्वपूर्ण है.

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