निजी स्कूलों पर हो नियंत्रण की पहल
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :16 Mar 2015 1:20 AM (IST)
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बढ़ती महंगाई से परेशान आम लोग केंद्रीय बजट में राहत तलाश रहे थे, जो उन्हें नहीं मिली. अब अगले माह उन लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ने वाला है, जिनके बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं. निजी स्कूलों ने सभी तरह के शुल्क में 25 फीसदी तक बढ़ोतरी की तैयारी कर ली है. किताबें की कीमतों […]
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बढ़ती महंगाई से परेशान आम लोग केंद्रीय बजट में राहत तलाश रहे थे, जो उन्हें नहीं मिली. अब अगले माह उन लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ने वाला है, जिनके बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं. निजी स्कूलों ने सभी तरह के शुल्क में 25 फीसदी तक बढ़ोतरी की तैयारी कर ली है.
किताबें की कीमतों में करीब 20 फीसदी तक की वृद्धि तय है. शिक्षा के निजीकरण और बाजारीकरण के बाद आम लोगों पर हर साल यह आर्थिक बोझ बढ़ना स्वाभाविक है. इसका सबसे ज्यादा असर सीमित आय वाले अभिभावकों की जेब पर पड़ता है. बिहार में करीब 25 हजार छोटे-बड़े निजी स्कूल हैं, लेकिन उन पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. लिहाजा नामांकन, अध्ययन शुल्क, परिवहन व्यवस्था आदि के शुल्क तय करने से लेकर उनमें वृद्धि तक में उनकी मनमानी चलती है.
बच्चों के बेहतर कैरियर का सपना लिये अभिभावक निजी स्कूलों पर भरोसा करते हैं. इसी सपने को भुना कर निजी स्कूलों के संचालक अपनी पूंजी में इजाफा करते रहे हैं. वैसे तो बिहार, झारखंड समेत पूरे देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू है. सीबीएसइ और आइसीएसइ के भी गाइडलाइन हैं, लेकिन वास्तविक रूप से निजी स्कूलों के कार्यकलापों पर इसका कोई प्रभाव नहीं दिखता. यही कारण है कि निजी स्कूल मुनाफा कमाने के बड़े धंधे के रूप में उभर रहे हैं. कभी वे विकास के नाम पर तो कभी पोशाक व पुनर्नामांकन के नाम पर भारी-भरकम शुल्क वसूलते हैं.
सबसे चिंता की बात यह है कि सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर इस बात को लेकर कोई गहन सर्वे या अध्ययन भी नहीं होता कि निजी स्कूल जिस पैमाने पर शुल्क वसूलते हैं, उसके अनुरूप उनकी शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर है भी या नहीं. इस मामले में सरकार और समाज की चुप्पी अंतत: बच्चों के भविष्य के लिए खतरनाक साबित होगी. केंद्र सरकार ने अगले साल तक नयी शिक्षा नीति तैयार करने की घोषणा की है. दावा किया गया है कि नयी शिक्षा नीति आम आदमी की शिक्षा तक आसान और अधिकतम पहुंच सुनिश्चित करेगी. लेकिन, इसकी गारंटी कौन लेगा कि नयी शिक्षा नीति का भी हश्र शिक्षा के अधिकार कानून, 2009 की तरह नहीं होगा? निजी स्कूलों में फीस की संरचना को लेकर पहल तो होनी ही चाहिए.
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