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आज विश्व के ज्यादातर लोगों को दो समय भोजन एवं सोने के लिए स्थान उपलब्ध है. इससे आयु में वृद्धि हुई है. यह वृद्धि उन परिवारों या क्षेत्रों में भी देखी जा रही है, जो आयुर्वेद पर निर्भर हैं. अत: इस वृद्धि का श्रेय केवल एलोपैथी को देना अनुचित है. केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य […]

आज विश्व के ज्यादातर लोगों को दो समय भोजन एवं सोने के लिए स्थान उपलब्ध है. इससे आयु में वृद्धि हुई है. यह वृद्धि उन परिवारों या क्षेत्रों में भी देखी जा रही है, जो आयुर्वेद पर निर्भर हैं. अत: इस वृद्धि का श्रेय केवल एलोपैथी को देना अनुचित है.

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का मसौदा सार्वजनिक किया है. इसमें आयुर्वेदिक, योग, यूनानी, सिद्ध एवं होम्योपैथी पद्धतियों को बढ़ावा देने की बात कही गयी है. यह स्वागतयोग्य है. इन पद्धतियों को सम्मिलित रूप से आयुष कहते हैं. नीति में संकल्प लिया गया है कि आयुष पद्धतियों के दायरे में नयी दवाओं की खोज को बढ़ावा दिया जायेगा. ध्यान रहे कि एलोपैथी में नयी दवाओं का आविष्कार धीमा पड़ रहा है. इस गैप का लाभ उठाना चाहिए. कुछ रोग हैं जिनमें आयुर्वेद सफल है, जैसे उदर रोग. दूसरे रोग हैं जिनमें एलोपेथी सफल है, जैसे संक्रामक रोग या सजर्री. इनके बीच एक बड़ा दायरा है, जहां दोनों पद्धतियों के प्रभावी होने का तुलनात्मक अध्ययन जरूरी है. इससे नयी दवाओं एवं उपचार पद्धतियों का आविष्कार हो सकेगा.

पॉलिसी में आयुष दवाओं के स्टैंडर्ड निधारित करने और टेस्टिंग प्रयोगशालाएं बनाने की बात कही गयी है. यह विचार भी सही दिशा में है, लेकिन सावधानी की जरूरत है. इस दिशा में एम्स की तर्ज पर आयुर्वेदिक अस्पताल स्थापित करने चाहिए. अब तक हम आयुर्वेद का समावेश एलोपैथी में करते आये हैं. अब हमारा प्रयास होना चाहिए कि ऐलोपैथी का आयुर्वेद के विस्तृत घेरे में समावेश किया जाये. आयुर्वेद का उद्देश्य केवल रोग का उपचार नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवनशैली का सुधार है. जैसे कोई व्यक्ति देर से उठता है, व्यायाम नहीं करता है, स्वभाव से झूठ बोलता है, गरिष्ठ भोजन करता है, तो उसका बीपी बढ़ जाता है. ऐसे में आयुर्वेदाचार्य उसे सलाह देंगे कि सायंकाल हलका भोजन करे, सुबह जल्दी उठे, सैर करे, योगासन करे, प्राणायाम करे. इससे उसका अंत:करण स्वच्छ हो जायेगा, वह स्वस्थ रहेगा. औषधि की उपयोगिता केवल तात्कालिक राहत पहुंचाने की होती है. ऐलोपैथिक डॉक्टर इन प्रपंचों के सुधार के स्थान पर बीपी की गोली दे देगा और व्यक्ति को राहत भी मिलेगी. परंतु उसकी जीवनशैली पूर्ववत् बनी रहेगी.

आयुष तथा एलोपैथी पद्धतियों के वैज्ञानिक आधार भिन्न हैं. आयुर्वेद का ध्यान शरीर के आकार या एनाटॉमी पर कम और उसकी गति पर ज्यादा रहता है. वात, पित्त और कफ के संतुलन को प्रमुख माना जाता है. ये शरीर की गति से संबंधित हैं. इनमें संतुलन रहेगा, तो धमनियां ब्लॉक नही होंगी. इसके विपरीत एलोपैथी का ध्यान सिर्फ शरीर पर रहता है. जैसे हृदय की धमनियों में ब्लॉकेज है, तो सीधे इसका उपचार कर दिया जाता है. इन विकारों के उत्पन्न होने के कारणों पर ध्यान नहीं दिया जाता है. इसलिए कुछ समय बाद समस्या पुन: प्रकट हो जाती है. आयुर्वेद में प्रोसेस पर ध्यान दिया जाता है न कि एनाटॉमी पर. ऐसे में आनेवाले समय में हमें ऐलोपैथी से आयुर्वेद की ओर बढ़ने की जरूरत होगी.

दोनों पद्धतियों के बीच यह अंतर जीवन के उद्देश्य से भी जुड़ा हुआ है. भारतीय संस्कृति में जीवन का उद्देश्य आंतरिक सुख है. चूंकि आंतरिक सुख उसी को प्राप्त होता है, जिसका अंत:करण शुद्ध रहता है. इसलिए आयुर्वेद में जीवनशैली पर ध्यान रहता है. जीवनशैली में सुधार से व्यक्ति का अंत:करण जागृत हो जाता है और वह सुखी हो जाता है. तुलना में पश्चिमी सभ्यता का उद्देश्य भौतिक जीवन-स्तर में सुधार मात्र है. एलोपैथी की सफलता का मापदंड है कि व्यक्ति ने कितना भोग किया. इसके विपरीत आयुर्वेद की सफलता उसे भोग से निवृत्ति दिला कर आंतरिक सुख की ओर ले जाने में मापी जाती है.

निश्चित ही पेनसिलिन जैसी दवाओं के अविष्कार से कई रोगों पर काबू पाया जा सका ह, लेकिन इसमें औद्योगिक क्रांति का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है. आज विश्व के ज्यादातर लोगों को दो समय भोजन एवं सोने के लिए स्थान उपलब्ध है. इससे आयु में वृद्धि हुई है. यह वृद्धि उन परिवारों या क्षेत्रों में भी देखी जा रही है, जो आयुर्वेद पर निर्भर हैं. अत: इस वृद्धि का श्रेय केवल एलोपैथी को देना अनुचित है. इसके अतिरिक्त रोगों का वेग बढ़ता जा रहा है और एड्स तथा इबोला जैसे नये रोग भी तेजी से पैदा हो रहे हैं. कारण, केवल एनाटॉमी ठीक करने से टिकाऊ उपचार नहीं होता है. अत: पेनसिलिन जैसी दवाओं के महान योगदान को स्वीकार करते हुए एलोपैथी के टिकाऊपन पर संदेह बना रहता है.

सरकार को चाहिए कि विभिन्न मंत्रलयों से समन्वय करे. जैसे सूचना एवं प्रसार मंत्रलय के साथ विज्ञापन नीति बनायी जाये. जनता को समझाया जाये कि रोग शरीर की एनाटॉमी में अवश्य होता है, परंतु उसका कारण जीवनशैली, विचारधारा तथा भोजन होता है. खेल एवं युवा मंत्रलय से योग को खेलकूद की प्रतियोगिताओं में शामिल कराया जाये. शिक्षा मंत्रलय के माध्यम से हाइ स्कूल के पाठ्यक्रम में एलोपैथी तथा आयुर्वेद के सिद्धांतों के अंतर को पढ़ाया जाये. पर्यटन मंत्रलय से होटलों के वास्तु विज्ञान की नीति को बनायी जाये. सरकार तब ही सफल होगी, जब स्वास्थ्य को संपूर्ण जीवनशैली के साथ जोड़ा जायेगा.

डॉ भरत झुनझुनवाला

साथ में नरेंद्र मेहरोत्र

अर्थशास्त्री

bharatjj@gmail.com

Prabhat Khabar Digital Desk
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