अमेरिकी विदेश मंत्री के बयान के निहितार्थ

पेशावर हमले के बाद स्पष्ट हो गया था कि ‘अच्छा और बुरा तालिबान’ के बीच फर्क करने की पाक सेना और सरकार की नीति आत्मघाती साबित हो रही है. हमले के बाद पाक प्रधानमंत्री ने कहा था कि अब हर किस्म के आतंकवाद को पाकिस्तान अपना शत्रु मानेगा. लेकिन, उस वक्त हाफिज सईद जैसे धार्मिक […]
राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश मामलों में शरीफ के सलाहकार सरताज अजीज के साथ साङो प्रेस कॉन्फ्रेंस में केरी ने कहा है, ‘पाकिस्तान की धरती पर सक्रिय आतंकी समूह पाकिस्तान सहित पड़ोसी देशों के लिए भी खतरा बने हुए हैं. इन आतंकियों से अमेरिका को भी खतरा है. इसलिए पाकिस्तान को अपनी धरती पर सक्रिय हर आतंकी संगठन पर हमलावर होना होगा.’ पाकिस्तान के लिए केरी की सलाह पर अमल करने के सिवा और कोई चारा नहीं बचा है. अफगानिस्तान में अमेरिकी अगुवाई में नाटो सेनाओं की मौजूदगी को मदद देने, साजो-सामान पहुंचाने तथा आवागमन के लिए अपनी धरती मुहैया कराने के एवज में पाकिस्तान को 2002 के बाद से अमेरिका से बड़ी रकम मिलती रही है.
अफगानिस्तान से नाटो सेनाओं की वापसी के बाद यह मदद बंद होना तय है. अफगानिस्तान में शांति स्थापना की एक अमेरिकी नीति यह भी रही कि तालिबान के जो हिस्से हथियार छोड़ने को राजी हैं, उन्हें सीमित हिस्सों में सत्ता सौंपी जाये. अफगानी आतंकवादियों के प्रति अमेरिका के इसी दोहरे रवैये का इस्तेमाल पाकिस्तान ने अपनी धरती पर सक्रिय आतंकी धड़ों में से कुछ को अच्छा और कुछ को बुरा बताने में किया. ‘अच्छा तालिबान’ की संज्ञा उन्हें दी गयी, जिन्हें पाकिस्तानी हितों को बढ़ावा देने में इस्तेमाल किया जा सके. लेकिन, जॉन केरी के बयान से आतंकवाद को लेकर भारत के पक्ष को मजबूती मिली है. भले सरताज अजीज आतंकवाद पर भारत के साथ साझा मोर्चा के लिए इच्छुक नहीं हैं, पर पाकिस्तान के लिए अब यह कहना मुश्किल होगा कि भारत में आतंकी गतिविधि को अंजाम देनेवालों पर उसका नियंत्रण नहीं है.
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