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जयललिता को नहीं दी मोहलत

Updated at : 16 Nov 2014 5:44 AM (IST)
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जयललिता को नहीं दी मोहलत

दागी नेताओं के लिए खौफ बन गये न्यायाधीश जस्टिस जॉन माइकल डी कुन्हा इस देश में अदालत के चक्कर इतने लंबे होते हैं कि फैसला आने में दशकों बीत जाते हैं. झोल-झाल करनेवाले राजनेताओं के लिए तो यह व्यवस्था किसी वरदान से कम नहीं है. अदालत में मामले चलते रहते हैं और उनका कैरियर चमकता […]

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दागी नेताओं के लिए खौफ बन गये न्यायाधीश
जस्टिस जॉन माइकल डी कुन्हा
इस देश में अदालत के चक्कर इतने लंबे होते हैं कि फैसला आने में दशकों बीत जाते हैं. झोल-झाल करनेवाले राजनेताओं के लिए तो यह व्यवस्था किसी वरदान से कम नहीं है. अदालत में मामले चलते रहते हैं और उनका कैरियर चमकता रहता है.
लेकिन आज से शुरू हो रही इस श्रृंखला में आइए पढ़ें कुछ ऐसे न्यायाधीशों के बारे में, जिन्होंने कई कद्दावर नेताओं को जेल में डाल कर इस धारणा को तोड़ने की शुरुआत की है कि इस देश में नेताओं का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता.
जयंत श्रीराम
कहते हैं कि इसी साल 26 सितंबर को जब तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे जयललिता बेंगलुरु में केंद्रीय कारागर पाराप्पना अग्रहारा में बनायी गयी विशेष अदालत में पहुंचीं, तो पार्टी के लोगों से कहा कि वे कुछ घंटे में लौट आयेंगी. 18 साल तक चले मुकदमे के दौरान उनकी टीम उन्हें लगातार यह आश्वासन देती रही कि कानूनी कार्रवाई को और लंबे समय तक टाला जा सकता है. लेकिन एक घंटे बाद ही वे पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन चुकी थीं, जिन्हें पद पर बने रहते हुए जेल की सजा हुई थी.
जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला सन् 2003 में कर्नाटक स्थानांतरित हुआ था. कर्नाटक में इस मामले की सुनवाई करने वाले जस्टिस डी कुन्हा तीसरे जज थे. हालांकि अभियुक्त और गवाहों के बयान आदि रिकॉर्ड करने की महत्वपूर्ण प्रक्रि या अब तक पूरी हो चुकी थी, फिर भी इस मुकदमे को करीब से देख रहे वकीलों का मानना है कि नवंबर, 2013 में डी कुन्हा का जुड़ना इस मुकदमे में आया सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था.
एक वकील कहते हैं, जब कोई मुकदमा 18 साल से खिंच रहा हो और कई बार स्थगनादेश जारी हो चुके हों तो काबिल-से-काबिल न्यायाधीश के लिए भी तारतम्य बिठाये रखना मुश्किल होता है. लेकिन फिर भी डी कुन्हा ने काफी सख्ती से काम लिया. उन्होंने एक साल के भीतर बचाव पक्ष के सभी गवाहों के बयान लिये और उन्हें मुकदमे को लंबा खींचने और तथ्यों को छिपाने के लिए फटकार भी लगायी.
दो घटनाएं इस बात की गवाह हैं. जब नये सरकारी वकील जी भवानी दो मौकों पर कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए, तो डी कुन्हा ने उन पर 60,000 रुपये का जुर्माना लगा दिया. भवानी को हर सुनवाई के एवज में सरकार से इतनी ही रकम मिलती थी. कहने की जरूरत नहीं कि उसके बाद से हर सुनवाई पर भवानी कोर्ट में मौजूद थे.
1996 में एक छापे के बाद जयललिता के घर से बरामद कीमती चीजों का निरीक्षण करने डी कुन्हा चेन्नई गये. 800 किलो चांदी, 28 किलो सोना, 750 जोड़ी जूते, 10 हजार 500 साड़ियां और 91 घड़ियां चेन्नई में आरबीआइ के कमरे में रखी थीं. निरीक्षण के बाद डी कुन्हा ने सामान बेंगलुरु स्थानांतरित करने का आदेश दे दिया.
नेताओं के साथ सख्ती बरतने का डी कुन्हा का पुराना रिकॉर्ड है. 1994 में प्रतिबंध के बावजूद उमा भारती ने स्वतंत्रता दिवस पर ईदगाह मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिश की थी, जिसके बाद हुई पुलिस फायरिंग में छह लोग मारे गये थे. हुबली की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने 2002 से 2004 के बीच मध्य प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती के खिलाफ 18 गैर-जमानती अरेस्ट वारंट जारी किये. उन्होंने सबकी अनदेखी कर दी.
कोर्ट ने आखिरी वारंट तीन अगस्त, 2004 को जारी किया था. इसके बाद उमा भारती डी कुन्हा की अदालत में पेश हुईं, जो उस समय हुबली के डिस्ट्रिक्ट जज थे. डी कुन्हा ने उमा भारती की याचिका खारिज कर दी और उनकी राजनीति की दिशा ही बदल गयी.
2002 में बतौर जिला जज डी कुन्हा न्यायपालिका में शामिल हुए और फिर बेल्लारी, धारवाड़ और बेंगलुरु ग्रामीण की अदालतों में अपनी सेवाएं दीं. जयललिता के मुकदमे में नियुक्ति से पहले वे कनार्टक हाइकोर्ट में बतौर रजिस्ट्रार (विजिलेंस) काम कर रहे थे. इस मामले से जुड़े हुए एक वकील कहते हैं कि डी कुन्हा की नियुक्ति कर्नाटक हाइकोर्ट का महत्वपूर्ण कदम था. यह शुरू से ही स्पष्ट था कि उन्हें किसी तरह प्रभावित नहीं किया जा सकता.
(साभार : इंडिया टुडे)
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