वैचारिक अति के दो छोर

Published at :12 Nov 2014 12:54 AM (IST)
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वैचारिक अति के दो छोर

पंडित जवाहरलाल नेहरू शायद वैचारिक अति के एक छोर के प्रतिनिधि हैं, क्योंकि वे किसी भी प्राचीन चीज को ‘अतीत का भग्नावशेष’ मानते थे. हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री के साथ वैचारिक अति का पेंडुलम अपने दूसरे छोर पर जा पहुंचा है. अब यह कहने का वक्त आ चुका है कि सत्य की मौजूदगी अति के दोनों […]

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पंडित जवाहरलाल नेहरू शायद वैचारिक अति के एक छोर के प्रतिनिधि हैं, क्योंकि वे किसी भी प्राचीन चीज को ‘अतीत का भग्नावशेष’ मानते थे. हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री के साथ वैचारिक अति का पेंडुलम अपने दूसरे छोर पर जा पहुंचा है. अब यह कहने का वक्त आ चुका है कि सत्य की मौजूदगी अति के दोनों छोरों के मध्य में है, उस प्रबुद्ध और युक्तिसंगत मानवतावाद में, जो हमारे अतीत का गुणग्राही तो है, लेकिन जो आधुनिक और प्रगतिशील भारत की अनिवार्यताओं को कम करके नहीं आंकता.
इस साल रविवार, 25 अक्तूबर के दिन प्रधानमंत्री रिलायंस के नये अस्पताल के उद्घाटन के लिए मुंबई में थे. वहां चिकित्सा-विज्ञान के माहिर डॉक्टरों का जमावड़ा था. अभिताभ बच्चन, सचिन तेंडुलकर, सुनील गावस्कर और स्वयं मुकेश अंबानी जैसी चर्चित हस्तियां भी मंच पर विराजमान थीं. प्रधानमंत्री ने अपनी सुपरिचित वाक्पटुता के साथ आज के समय में चिकित्सा विज्ञान की जरूरत और भारत में बेहतरीन वैज्ञानिक चिकित्सा-कर्म की प्रासंगिकता की बात कही. इसके बाद, अचानक बात को घुमाते हुए उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में ये सारी चीजें भारत पहले ही हासिल कर चुका था. महाभारत वर्णित कुंतीपुत्र कर्ण के जन्म की कथा से पता चलता है कि भारत में आनुवांशिकी विज्ञान खूब विकसित हो चुका था. इसी तरह गणोश की कथा से पता चलता है कि उस वक्त प्लास्टिक सर्जरी का विज्ञान अपने चरमोत्कर्ष पर था, वरना हाथी के सिर को मनुष्य की देह पर कैसे जोड़ा जा सकता था?
मेरे मन में कई दफे यह ख्याल आया है कि श्रोता के रूप में मौजूद चिकित्सा-विज्ञानियों और डॉक्टरों पर इस उल्लेखनीय बात का क्या असर हुआ होगा. क्या उन लोगों के मन में यह ख्याल आया होगा कि प्रधानमंत्री अपनी बात में तनिक हास्य का पुट दे रहे हैं? संदेह का लाभ देते हुए, यह भी सोच सकते हैं कि शायद उन लोगों ने सोचा होगा कि प्रधानमंत्री पुराण-कथाओं के हवाले से ‘उपलब्धियों’ का जिक्र करके हमलोगों को प्रेरणा देना चाहते हैं. या फिर संभव है, कुछ लोगों ने सोचा हो कि राजनेता के भाषण में अधिकाई से भरे ऐसे दिलचस्प वाक्य आते ही हैं, सो उसे ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है. लेकिन, सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री वही कह रहे थे, जिस पर सचमुच उनका विश्वास है.
प्राचीन भारत की उपलब्धियों का गौरव बखान करने में कुछ भी गलत नहीं है. इतिहास ऐसी उपलब्धियों के सत्यापन के साक्ष्य देता है और ये उपलब्धियां सचमुच उत्कृष्टता का नमूना हैं. गणित और खगोल विज्ञान में आर्यभट्ट का योगदान अतुलनीय है; पाणिनी निस्संदेह विश्व के अब तक सर्वाधिक अग्रणी वैयाकरण हैं; कालिदास या तिरुवल्लुर समान रूप से प्रतिभाशाली अपने समकालीनों के बीच साहित्यिक सर्वोत्कृष्टता के प्रतिनिधि व्यक्तित्व हैं; कौटिल्य का अर्थशास्त्र राजनय का विश्व का पहला समग्र ग्रंथ है; शून्य की अवधारणा प्राचीन भारत की एक नायाब देन है; भरतमुनि का नाट्यशास्त्र सौंदर्यशास्त्रीय विवेचना का विश्व का पहला ग्रंथ है; उपनिषदों को पढ़ने से पता चलता है कि दुनिया में शायद ही किसी और जगह दार्शनिक चिंतन ने ऐसी ऊंचाइयों को छुआ है. चिकित्सा का क्षेत्र एक अलग विज्ञान के रूप में विकसित हुआ, यह भी अपने आप में अत्यंत उल्लेखनीय तथ्य है.

लेकिन, प्राचीन भारत की उपलब्धियों को रेखांकित करना एक बात है और सीमा लांघ कर पुराणकथा के भीतर प्रवेश करते हुए यह दावा करना एकदम ही अलग बात, कि पुराणकथाओं में कही गयी बातें शब्द के सटीक अर्थो में बीते जमाने के यथार्थ की यथातथ्य झलक प्रस्तुत करती हैं. अंधविश्वास और युक्तिसंगत ऐतिहासिक मूल्यांकन के बीच अंतर होता है. पुराणकथा अपने सर्वोत्तम अर्थो में एक रूपक है. इसमें एक व्यापक प्रतीकार्थ अथवा किसी अनुमान के संकेत के लिए सचेत रूप से फंतासी का उपयोग किया जाता है. इसके अर्थ को शब्दश: ग्रहण नहीं किया जा सकता. घायल लक्ष्मण के उपचार के लिए हनुमान पहाड़ उठा लाये. यह कथा हनुमान की महान निष्ठा के बारे में बताती है. इस कथा का आशय यह नहीं कि प्राचीन काल में वानर हवा में उड़ते हुए अपने हाथ में पूरा पहाड़ उठा कर लाया करते थे. रामायण का पुष्पक विमान वीरों की ताकत और कौशल को सूचित करता है. पुष्पक विमान का आशय यह नहीं कि कोई उसके आधार पर यह साबित करे कि हमारे यहां जेट विमान का आविष्कार सुदूर अतीत ही में कर लिया गया था. हमारे दो महाकाव्य रामायण और महाभारत गहन ज्ञान के भंडार हैं. इन ग्रंथों में समाये अद्भुत कल्पनाशील पौराणिक कथाओं को कोई शब्दश: ग्रहण करे और उनकी व्याख्या वैज्ञानिक तथ्य मान कर करे, तो इसे अर्थ का अनर्थ करना ही कहा जायेगा, क्योंकि इन ग्रंथों को लिखनेवाले का अभिप्रेत यह था ही नहीं.
मुङो जान पड़ता है कि प्रधानमंत्री ने जिन बातों का उद्धरण दिया, वह गुजरात में पाठ्यपुस्तक के रूप में स्वीकृत दीनानाथ बत्र की उस पुस्तक में होगी, जिसकी भूमिका गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए स्वयं उन्होंने (नरेंद्र मोदी) लिखी थी. अगर बात ऐसी ही है, तो फिर हमें खुद से सवाल पूछना चाहिए कि हमलोग अपने बच्चों को किस किस्म का इतिहास पढ़ा रहे हैं? आरएसएस के भीतर एक मजबूत धड़ा उन लोगों का है जो सचमुच मानता है कि प्राचीन हिंदू अतीत की सारी उपलब्धियों की खान है. उसमें भूत, वर्तमान और यहां तक कि भविष्य की भी सारी उपलब्धियां मौजूद हैं. ऐसी विचार-दृष्टि का खतरा यह है कि इसमें अतीत की वैध सराहना और वैज्ञानिक तथा युक्तिसंगत मनोभाव के बीच का जरूरी अंतर धुंधला पड़ जाता है. यह विचार-दृष्टि भारतीय ऐतिहासिक आख्यान का बोध विकृत करती है. बीते लोकसभा चुनाव का भाजपा का घोषणापत्र इतिहास के साथ छेड़छाड़ का एक अच्छा उदाहरण है. घोषणापत्र की भूमिका में हमारी ऐतिहासिक उपलब्धियों का बखान किया गया है. यह बखान 10वीं सदी तक आते-आते रुक जाता है. जिन लोगों ने इस घोषणापत्र को तैयार किया है, उनके लिए भारत के इतिहास का आदि-अंत वहीं तक है, जहां तक वह विशिष्ट रूप से ‘हिंदू’ है. 10वीं सदी के बाद की सदियों की कोई भी उपलब्धि उन्हें उल्लेखनीय नहीं लगती, चाहे वह ताजमहल हो या फिर भक्ति और सूफी संप्रदाय की भावभरी कविता या फिर आज की हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति.
हमारे संविधान का अनुच्छेद 51 ए (एच) कहता है, प्रत्येक नागरिक का प्राथमिक कर्त्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक तेवर, मानवतावाद तथा अन्वेषण और सुधार की भावना विकसित करे. मेरे ख्याल से, अति आधुनिक रिलायंस अस्पताल के उद्घाटन के समय प्रधानमंत्री मोदी ने जो बातें कही, वे बातें संविधान वर्णित नागरिक के कर्त्तव्य संबंधी निर्देश के विपरीत हैं. हमारे प्रथम प्रधानमंत्री, जवाहरलाल नेहरू शायद वैचारिक अति के एक छोर के प्रतिनिधि हैं, क्योंकि वे किसी भी प्राचीन चीज को ‘अतीत का भग्नावशेष’ मानते थे. हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री के साथ वैचारिक अति का पेंडुलम अपने दूसरे छोर पर जा पहुंचा है. अब यह कहने का वक्त आ चुका है कि सत्य की मौजूदगी अति के दोनों छोरों के मध्य में है, उस प्रबुद्ध और युक्तिसंगत मानवतावाद में, जो हमारे अतीत का गुणग्राही तो है, लेकिन जो आधुनिक और प्रगतिशील भारत की अनिवार्यताओं को कम करके नहीं आंकता.
(अनुवाद : अरविंद कुमार यादव)
पवन के वर्मा
सांसद एवं पूर्व प्रशासक
pavankvarma1953@gmail.com
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