भारतीय बाजार पर हावी चीनी पटाखे

Published at :22 Oct 2014 1:52 AM (IST)
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भारतीय बाजार पर हावी चीनी पटाखे

चीन ने अनुसंधान और प्रशिक्षण के बल पर कई आकर्षक प्रयोग कर नये-नये पटाखे बाजार में उतारे हैं. उसे चुनौती देने के लिए हमें भी अनुसंधान पर ध्यान देना होगा. पटाखों पर टैक्स की दर कम कर सरकार इसके जरिये अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा कमा सकती है. दिवाली सिर पर है फिर भी देशी […]

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चीन ने अनुसंधान और प्रशिक्षण के बल पर कई आकर्षक प्रयोग कर नये-नये पटाखे बाजार में उतारे हैं. उसे चुनौती देने के लिए हमें भी अनुसंधान पर ध्यान देना होगा. पटाखों पर टैक्स की दर कम कर सरकार इसके जरिये अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा कमा सकती है.

दिवाली सिर पर है फिर भी देशी पटाखा निर्माताओं में मायूसी छायी हुई है. चीन से आयातित सस्ते पटाखों ने उनके चेहरे का रंग उड़ा रखा है. इस साल बाजार में भारतीय पटाखों की मांग 30-35 प्रतिशत कम है, जिसका असर धंधे से जुड़े लाखों लोगों पर पड़ना लाजमी है. चीन से गैरकानूनी ढंग से पटाखे आयात करनेवाले व्यापारियों को वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमन कड़ी चेतावनी दे चुकी हैं, लेकिन मंत्री महोदया की बात बेअसर रही है. कुछ बरस पहले चीनी पटाखे भारतीय बाजार में दबे पांव आये थे. अब पैर जमा लिये हैं.

साल भर में बननेवाले 90 फीसदी पटाखों की खपत अकेले दिवाली के दिन हो जाती है. सीजन में मंदी का मतलब है गहरी चोट. प्रदूषण के प्रति जनचेतना जगने से पटाखों की खपत में कमी आयी है. इसके बावजूद सीजन में साढ़े चार से पांच हजार करोड़ रुपये के पटाखे बिक जाते हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत देश में किसी भी तरह के विस्फोटक के आयात पर रोक लगी हुई है, फिर भी हिंदुस्तान में हर साल दो सौ से तीन सौ करोड़ रुपये के चीनी पटाखे बिकते हैं. ये कैसे आते हैं, आला अधिकारियों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है.

देश में बिकनेवाले 90 प्रतिशत पटाखे और 75 फीसदी माचिस तमिलनाडु के शहर शिवकाशी की देन हैं. शिवकाशी के हर गली-मोहल्ले में पटाखे और माचिस बनाने का काम होता है. साल में आठ-नौ महीने यहां पटाखे बनाने का कारोबार जोर-शोर से होता है. लगभग चार लाख लोग इस कारोबार से जुड़े हैं, जिसमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं. बाल श्रम निषेध कानून लागू हुए डेढ़ दशक से ज्यादा बीत चुका है, लेकिन शिवकाशी में अभी भी हजारों मासूम बच्चे इस खतरनाक काम में खट रहे हैं. दिन में 12 से 15 घंटे मेहनत करने के बाद इन बच्चों को 90 से 150 रुपये के बीच दिहाड़ी मिलती है. लगता है नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी की शिवकाशी पर नजर नहीं पड़ पायी है.

इंडियन एक्सप्लोसिव एक्ट-1940 के अनुसार, पटाखा बनाने के लिए लाइसेंस लेना जरूरी है. हमारे देश में पटाखा बनानेवाली लगभग आधी फैक्ट्रियां बिना लाइसेंस के चल रही हैं. प्रशासन ने 2012-13 में शिवकाशी में छापा मार कर बिना लाइसेंस की 80 फैक्ट्रियां सील की थीं, जिससे लगभग 20 हजार लोग बेरोजगार हो गये थे. शिवकाशी के निकटवर्ती दर्जनों गांवों में भी वर्षो से अवैध पटाखा निर्माण कार्य एक कुटीर उद्योग की तरह चल रहा है. वर्ष 2012 में एक बड़े हादसे में यहां 35 लोग मारे गये थे. इसके बाद कुछ समय के लिए सब नियम से चला. अब गाड़ी फिर पुराने ढर्रें पर आ गयी है. प्रशासन भी आंखें मूंदे हुए है.

आज देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी पटाखा बनाने का धंधा तेजी से पनप रहा है. लाइसेंस लेकर नियमानुसार पटाखा फैक्ट्री खड़ी करने में तमाम तरह के झंझट हैं, इसलिए इसके अवैध कारोबार की हिस्सेदारी बढ़ रही है. हमारे देश में लगभग तीन सौ किस्म के पटाखे बनते हैं, जिनके निर्माण में कई खतरनाक रसायन इस्तेमाल होते हैं. इस धंधे से जुड़े गरीब-कामगार संभावित खतरों से बेखबर हैं. इसका नतीजा यह है कि पटाखे बनानेवाले 90 प्रतिशत श्रमिक टीबी जैसी जानलेवा बीमारी से पीड़ित हैं और उनके मुकम्मल इलाज का भी कोई इंतजाम नहीं है.

पटाखा बाजार में कीमतों का गणित भी है. ब्रांडेड व वैध और अवैध पटाखों के मूल्य में भारी अंतर है. आयातित चीनी पटाखों की टक्कर देश में गैरकानूनी ढंग से बन रहे पटाखों से है. ब्रांडेड माल महानगरों और बड़े शहरों के संपन्न तबके की पसंद है, इसलिए उसका बाजार अभी बेअसर है. बिना लाइसेंस वाली फैक्ट्रियों में बने पटाखे छोटे नगरों, कस्बों और गांवों में खपते हैं. पटाखा सप्लाई चेन लंबी होने से फैक्ट्री से निकल कर उपभोक्ता के हाथ में पहुंचने तक उसकी कीमत कई गुना बढ़ जाती है. मोटा मुनाफा कमाने के लालच में बड़े सप्लायर निर्माताओं पर एमआरपी से चार-पांच गुना ज्यादा मूल्य रखने का दबाव डालते हैं. इस परेशानी से बचने के लिए कई ब्रांडेड कंपनियों ने बाजार में अपनी दुकान खोल दी हैं. इन दुकानों पर आधे दाम में माल मिल जाता है.

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में पटाखों का बड़ा बाजार है. चीन हर साल सात अरब डॉलर के पटाखे निर्यात् करता है, लेकिन भारत सरकार ने पटाखा निर्यात् पर अनेक बंदिशें लगा रखी हैं. इसलिए हम घरेलू उत्पादन का महज पांच फीसदी हिस्सा ही निर्यात् कर पाते हैं. पटाखा निर्माण में इस्तेमाल होनेवाले कुछ रसायनों की खरीद पर रोक है, इसी वजह से भारत में परंपरागत पटाखे बनते हैं. चीन ने अनुसंधान और प्रशिक्षण के बल पर कई आकर्षक प्रयोग किये हैं. नये-नये पटाखे बाजार में उतारे हैं. उसे चुनौती देने के लिए हमें भी अनुसंधान पर ध्यान देना होगा. पटाखों पर लागू करों की दर कम कर सरकार इस कारोबार के जरिये अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा कमा सकती है.

धर्मेद्रपाल सिंह

वरिष्ठ पत्रकार

dps6155@gmail.com

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