मैन्यूफैक्चरिंग नहीं, सेवा क्षेत्र बढ़ायें

यदि देश को मैन्यूफैरिंग हब बनाना ही है, तो इसके लिए विदेशी निवेशों को गुहार लगाने की क्या जरूरत है? क्या हमारे उद्यमी यह कार्य नहीं कर सकते हैं? विदेशी कंपनियों को वहीं बुलाना चाहिए, जहां विशेष तकनीक हासिल करनी हो. अर्थव्यवस्था को मुख्य रूप से तीन क्षेत्र में विभाजित किया जाता है- कृषि, मैन्यूफैरिंग […]
यदि देश को मैन्यूफैरिंग हब बनाना ही है, तो इसके लिए विदेशी निवेशों को गुहार लगाने की क्या जरूरत है? क्या हमारे उद्यमी यह कार्य नहीं कर सकते हैं? विदेशी कंपनियों को वहीं बुलाना चाहिए, जहां विशेष तकनीक हासिल करनी हो.
अर्थव्यवस्था को मुख्य रूप से तीन क्षेत्र में विभाजित किया जाता है- कृषि, मैन्यूफैरिंग और सेवा. मैन्यूफैरिंग में भौतिक माल का उत्पादन गिना जाता है-जैसे पंखा, कंप्यूटर अथवा कपड़े का. सेवा क्षेत्र में टेलीविजन प्रोग्राम, डॉक्टर, पर्यटन आदि गिने जाते हैं.
डॉक्टर द्वारा दी गयी सलाह ‘सेवा’ में गिनी जाती है, जबकि दुकानदार द्वारा बेची गयी दवा ‘मैन्यूफैरिंग में, और दवा बनाने के लिए उत्पादित जड़ी-बूटियां कृषि क्षेत्र में. वित्तीय वर्ष 2014-15 की पहली तिमाही में मैन्यूफैरिंग क्षेत्र में विकास दर 1 प्रतिशत से कम रही है, जबकि संपूर्ण अर्थव्यवस्था की विकास दर 5.7 प्रतिशत रही है. कृषि की हालत वर्षो से ठंडी है. मैन्यूफैक्चरिंग भी ढीला है. निष्कर्ष निकलता है कि विकास का स्नेत सेवा क्षेत्र है.
प्रश्न है कि आगे की रणनीति के लिए हम किस क्षेत्र को अर्थव्यवस्था का इंजन बनाएं. अर्थव्यवस्था में कृषि का हिस्सा अपने यहां लगातार घटता जा रहा है. इसलिए कृषि को विकास का इंजन बनाना दूभर होगा. यहां समस्या है कि एक सीमा के बाद मनुष्य माल की खपत नहीं कर पाता है.
जैसे आप दो की जगह दस रोटी की खपत शायद कर सकें, लेकिन 100 रोटी की खपत करना असंभव है. वहीं सेवाओं की खपत ज्यादा हो सकती है. जैसे मोबाइल फोन में आप हर घंटे नया गेम लोड कर सकते हैं. नागरिकों की आय में वृद्घि के साथ-साथ माल की खपत में वृद्घि कम और सेवाओं की खपत उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है. इसलिए अमीर देशों में अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का हिस्सा 80 से 90 प्रतिशत होता है.
हम भी इसी दिशा में चल पड़े हैं. 1991 में अपने देश में मैन्यूफैरिंग और सेवाओं का हिस्सा 24-24 प्रतिशत था. 1991 से 2013 तक मैन्यूफैरिंग का हिस्सा 24 प्रतिशत पर ही टिका रहा है, जबकि सेवा क्षेत्र का हिस्सा 47 प्रतिशत पर पहुंच गया है. इसका अर्थ यह नहीं कि मैन्यूफैरिंग में वृद्घि नहीं हो रही है. नये कारखाने स्थापित हो रहे हैं, परंतु देश की अर्थव्यवस्था में यदि 7 प्रतिशत की वृद्घि हर वर्ष हो रही है तो मैन्यूफैरिंग में भी 7 प्रतिशत की ही होने से इसका हिस्सा स्थिर है.
सेवा क्षेत्र में वृद्घि अर्थव्यवस्था की चाल से दोगुनी गति से होने से इस क्षेत्र का हिस्सा बढ़ रहा है. तदानुसार सेवा का हिस्सा बढ़ रहा है और कृषि का हिस्सा घट रहा है. संपूर्ण विश्व अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र में तीव्र विकास हो रहा है, जबकि मैन्यूफैरिंग मे ठहराव आ रहा है. अत: हमें मैन्यूफैरिंग के उगते सूरज को पकड़ना चाहिए.
दूसरी समस्या प्रतिस्पर्धा की है. वर्तमान में चीन का माल सस्ता पड़ रहा है. वहां उद्योगों से पर्यावरण का मूल्य वसूल नहीं किया जा रहा है.
भारत को मैन्यूफैरिंग हब बनाने के लिए जरूरी होगा कि हम चीन की बराबरी में सस्ता माल बनाएं, जिसके लिए हमें अपने पर्यावरण को नष्ट करना होगा. तीसरी समस्या रोजगार की क्वॉलिटी की है. मैन्यूफैरिंग में 80 प्रतिशत रोजगार क्लास 4 के होते हैं, जबकि आइटी कंपनी में 80 प्रतिशत इंजीनियरों के. मैन्यूफैरिंग को बढ़ावा देकर हम देशवासियों को क्लास 4 के रोजगार ही उपलब्ध करा पायेंगे. इन कारणों से सेवा क्षेत्र को बढ़ावा देना उचित दिखता है. प्रधानमंत्री ने देश के युवाओं के हुनर में सुधार को प्राथमिकता दी है. यह कदम भी सेवा क्षेत्र में मेल खाता है.
प्रधानमंत्री ने मेक इन इंडिया का नारा देकर मैन्यूफैरिंग के विस्तार को विदेशी निवेश को आमंत्रित किया है. यदि देश को मैन्यूफैरिंग हब बनाना ही है, तो इसके लिए विदेशी निवेशों को गुहार लगाने की क्या जरूरत है? क्या हमारे उद्यमी यह कार्य नहीं कर सकते हैं? विदेशी कंपनियों को वहीं बुलाना चाहिए, जहां विशेष तकनीक हासिल करनी हो. हमारी अर्थव्यवस्था का मूल इंजन स्वदेशी निवेश ही होना चाहिए.
सेवा क्षेत्र के विस्तार के लिए दो उदाहरण देना चाहूंगा. दुनिया में एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद की जरूरत लगातार बढ़ती जा रही है. सरकार को चाहिए कि हर जिले में कृषि विज्ञान केंद्र की तरह विदेशी भाषा संस्था स्थापित करे. ऐसा करने से समयक्रम में चीनी भाषा से फ्रेंच में अनुवाद का काम हमें मिल सकता है. जिस ऑपरेशन को अमेरिका में 50 लाख रुपये लगते हैं, वह भारत में काफी कम में कराया जा सकता है. समस्या है कि भारतीय अस्पतालों के द्वारा गड़बड़ी किये जाने पर स्वास्थ पर्यटक के लिए भयंकर संकट पैदा हो जाता है. वह जिला कंज्यूमर फोरम में दस साल तक केस नहीं लड़ सकता है.
अत: सरकार को ‘हेल्थ टूरिज्म पुलिस’ की स्थापना करनी चाहिए, जो ऐसे पर्यटकों की मदद करें. इस प्रकार के कदम उठाने से हमारी अर्थव्यवस्था सेवा क्षेत्र में उत्पन्न होनेवाले नये अवसरों को पकड़ सकेगी और मजबूती से विश्वजय को चल पड़ेगी. देशवासियों को अच्छे रोजगार मिलेंगे और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा. अत: मेक इन इंडिया के स्थान पर मैनेज्ड एंड प्लांड इन इंडिया का नारा दें, तो हम ज्यादा आगे जा सकेंगे.
डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
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