दूसरी हरित क्रांति की अगुवाई का दम

केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह झारखंड आये. अनेक घोषणाएं कीं. इसमें से एक है झारखंड में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र खोलना. इस पर 500 करोड़ की लागत आनेवाली है. इसमें भले ही समय लगे लेकिन इस घोषणा से इतना तय हो गया है कि झारखंड अब कृषि के क्षेत्र में प्राथमिकता सूची में है. […]
केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह झारखंड आये. अनेक घोषणाएं कीं. इसमें से एक है झारखंड में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र खोलना. इस पर 500 करोड़ की लागत आनेवाली है.
इसमें भले ही समय लगे लेकिन इस घोषणा से इतना तय हो गया है कि झारखंड अब कृषि के क्षेत्र में प्राथमिकता सूची में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जानते हैं कि जिस तरीके से आबादी बढ़ी है, कई राज्यों में उस अनुपात में अनाज का उत्पादन नहीं बढ़ा है. ऐसे में आनेवाले दिनों में संकट हो सकता है. इसके लिए एक और हरित क्रांति चाहिए. लेकिन वह क्रांति जैविक खेती के आधार पर हो, ताकि खेतों की उर्वरा शक्ति पर प्रतिकूल असर नहीं पड़े. इसलिए केंद्र चाहता है कि पूर्वी भारत इसकी अगुवाई करे.
इसमें यूपी, बिहार के साथ झारखंड की बड़ी भूमिका होगी. अभी तक माना जाता है कि यहां की अर्थव्यवस्था खनिजों पर ही चलती है. राज्य के 75 प्रतिशत खेतों में सिंचाई की सुविधा नहीं है. इसके बावजूद यहां के किसान अपने बल पर बेहतर खेती कर रहे हैं. अगर उन्हें खेती की सुविधा मिलने लगे, पर्याप्त पानी मिले, बेहतर खाद-बीज मिले तो यही किसान इतिहास रच सकते हैं. केंद्र ने सहयोग का जो आश्वासन दिया है, अगर वह सही है और उस पर काम होता है तो पूर्वी भारत में कृषि उपज में उछाल आ सकता है.
ऐसी स्थिति में यहां के किसानों को, यहां के मजदूरों को दूसरे राज्यों में काम करने के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा. जिनके पास खेत है, उनकी उपज तो बढ़ेगी ही, जिनके पास खेत नहीं हैं या कम हैं, उन्हें भी अपने ही राज्य में रोजगार मिल सकेगा. यह बड़ा परिवर्तन होगा. ऐसे झारखंड सब्जी की खेती में काफी अच्छा कर रहा है. धान में अच्छी स्थिति है. यह सब तब हो रहा है जब यहां की अनेक सिंचाई परियोजनाएं अधूरी हैं, खेतों में पानी का साधन नहीं है. कुआं, तालाब या फिर बारिश के पानी से खेती हो रही है. अगर केंद्र और राज्य सरकार मिल कर झारखंड में भी हरित क्रांति लाने के लिए बेहतर तालमेल से काम करें, तो झारखंड के किसान भी वही करिश्मा कर सकते हैं जो करिश्मा कभी पंजाब-हरियाणा ने किया था. लेकिन इसके लिए अ़ावश्यक है कि इस पर राजनीति न हो. घोषणाएं सिर्फ चुनावी न हों, बल्कि राज्य और देश के हित में हों.
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