मर्यादा बनी रहे
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :29 Jan 2020 7:17 AM (IST)
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लोकतंत्र नियमों और मूल्यों के एक समुच्च्य का नाम है. राजनीतिक दलों व नेताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे निर्धारित नियमों का पालन करेंगे तथा मूल्यों के अनुरूप व्यवहार करेंगे. इसी आधार पर लोकतंत्र की गुणवत्ता की परख होती है. गणतंत्र के रूप में सात दशकों की यात्रा में भारतीय लोकतंत्र और […]
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लोकतंत्र नियमों और मूल्यों के एक समुच्च्य का नाम है. राजनीतिक दलों व नेताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे निर्धारित नियमों का पालन करेंगे तथा मूल्यों के अनुरूप व्यवहार करेंगे. इसी आधार पर लोकतंत्र की गुणवत्ता की परख होती है.
गणतंत्र के रूप में सात दशकों की यात्रा में भारतीय लोकतंत्र और संबद्ध संस्थान उत्तरोत्तर शक्तिशाली हुए हैं. परंतु, यह भी एक कटु सत्य है कि यह यात्रा अनेक दोषों से दागदार भी रही है. ऐसा ही एक चिंताजनक दोष कई नेताओं और जन-प्रतिनिधियों द्वारा भाषा की मर्यादा का उल्लंघन करना है. इस प्रवृत्ति का एक ताजा उदाहरण एक केंद्रीय मंत्री का आपत्तिजनक बयान है.
सार्वजनिक जीवन में नेताओं के आचरण और भाषा से न केवल उनके समर्थक प्रभावित होते हैं, बल्कि जनता पर भी असर पड़ता है. हमारी राजनीति पहले से ही भ्रष्टाचार, धन-बल और हिंसा से ग्रस्त है. यदि उसमें भाषा की अभद्रता भी बढ़ती गयी, तो संवाद और विमर्श की संभावना भी कमतर होती जायेगी. दुर्भाग्य से लगभग सभी दलों के अनेक नेताओं में यह अवगुण है और वे दल ऐसे नेताओं पर अंकुश लगाने में असफल रहे हैं. केंद्र और राज्यों में कमोबेश हर राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दल की सरकारें रही हैं.
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ताधारी और विपक्षी दलों से यही अपेक्षा की जाती है कि बहस-मुबाहिसे के जरिये वे जन-कल्याण व देश के हित में सक्रिय होंगे. ऐसे में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध भाषा के स्तर पर अपमानजनक व्यवहार होता रहा, धमकी दी जाती रही और अनाप-शनाप आरोप लगाये जाते रहे, तो इससे राजनीतिक व सामाजिक वातावरण भी बिगड़ेगा तथा विकास व समृद्धि के लक्ष्य भी पूरे नहीं किये जा सकेंगे.
इससे लोकतंत्र ही संकटग्रस्त हो जायेगा. बहस तो नीतियों व कार्यक्रमों पर होनी चाहिए, ताकि उन्हें बेहतर बनाने की गुंजाइश पैदा हो. आरोप-प्रत्यारोप में व्यक्तिगत लांछन व टीका-टिप्पणी से परहेज किया जाना चाहिए. हमारा देश एक युवा देश है, जहां लगभग आधी आबादी की आयु 25 साल से कम है. देश को आगे ले जाने में इन युवाओं की महती भूमिका है, किंतु नेताओं का व्यवहार इन्हें दिग्भ्रमित कर सकता है और उनमें हिंसा व अविश्वास की भावना पनप सकती है.
सोशल मीडिया पर आक्रामक और अभद्र भाषा का चलन बढ़ता जा रहा है. सार्वजनिक जीवन लोक सेवा का माध्यम है. उसमें शुचिता व मर्यादा का उदाहरण स्थापित करना राजनेताओं का उत्तरदायित्व है, क्योंकि देश को नेतृत्व देना उनका ही कर्तव्य है. उन्हें तो समाज में शांति का माहौल बनाने तथा विरोधियों के पक्ष को समझने को प्राथमिकता देनी चाहिए.
ऐसा नहीं है कि राजनीति में आज ही पक्ष और विपक्ष का विभाजन हुआ है. स्वतंत्रता से पहले और बाद में अनेक दशकों तक वैचारिकी और नीतियों को लेकर तीखी बहसें होती रही थीं, पर असहमति कभी भी अभद्रता और घृणा में नहीं बदली. वे उदाहरण आज बहुत प्रासंगिक हैं और हमारे नेताओं को इतिहास से सीख लेने की जरूरत है.
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