संविधान संशोधन का अर्थ

Updated at : 21 Jan 2020 7:11 AM (IST)
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संविधान संशोधन का अर्थ

रामबहादुर राय वरिष्ठ पत्रकार rbrai118@gmail.com आजकल संविधान को लेकर जो बहस चल रही है, उसके गुण-दोष को छोड़ दें, तो एक अच्छी बात यह है कि संविधान की ओर लोगों का ध्यान गया है. इस बहस से एक बात अच्छी निकलकर कर आयेगी कि अब लोग संविधान के बारे में अधिक से अधिक लोग जान […]

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रामबहादुर राय
वरिष्ठ पत्रकार
rbrai118@gmail.com
आजकल संविधान को लेकर जो बहस चल रही है, उसके गुण-दोष को छोड़ दें, तो एक अच्छी बात यह है कि संविधान की ओर लोगों का ध्यान गया है. इस बहस से एक बात अच्छी निकलकर कर आयेगी कि अब लोग संविधान के बारे में अधिक से अधिक लोग जान सकेंगे, साक्षर हो सकेंगे और जागरूक हो सकेंगे. दरअसल, इन चीजों को बहुत अभाव था, और अब भी है. पिछले कई सालों से मेरा प्रयास रहा है कि संविधान के प्रति जागरूकता बढ़े और लोग साक्षर हों.
इसलिए मैंने कई अवसरों पर लेख लिखा है और भाषण भी दिये हैं कि आप अपने संविधान को जानिए. अगर हम एक सर्वेक्षण करें, साधारण लोगों की बात मैं नहीं कर रहा, बल्कि 790 सांसदों के बीच यह सर्वेक्षण करें और पूछा जाये कि क्या आपने संविधान पढ़ा है. यह सवाल पूछने के बाद आपको आश्चर्य होगा कि 790 सांसदों में से शायद ही कोई कहे कि उसने पूरा संविधान पढ़ा है. कुछ ही होंगे, जिन्होंने संविधान पढ़ा होगा. ऐसे में संविधान को लेकर जागरूकता की जरूरत तो है ही, न सिर्फ सांसदों-नेताओं के लिए, बल्कि हर जन-साधारण के लिए भी.
प्रोफेसर कृष्णनाथ एक पढ़े-लिखे और विद्वान व्यक्ति थे. वह समाजवादी आंदोलन के बड़े नेताओं में गिने जाते थे. कई साल पहले एक बार मैं कृष्णनाथ जी से मिलने गया और उनका एक लंबा इंटरव्यू किया. उस इंटरव्यू में मैंने एक सवाल पूछा था कि संविधान सभा में समाजवादी क्यों नहीं गये?
इसका उत्तर उन्होंने दिया, लेकिन उत्तर के आखिर में उन्हें एक मजेदार बात कही. उन्हाेंने कहा कि संविधान को ज्यादातर लोगों ने खूंटी पर टांग दिया है यानी ऐसा मान लिया गया है कि संविधान कोई धरोहर वाली वस्तु है, जिसे सुरक्षित रख दिया गया है. आज हमारे समाज में यही स्थिति है. अब जब जागरूकता बढ़ेगी, तो लोग संविधान को अपनी-अपनी खूंटी से उतारेंगे और फिर उसे उलटना-पलटना शुरू करेंगे.
बहस के दौरान अक्सर यह सवाल उठता है कि संविधान के साथ छेड़छाड़ सबसे ज्यादा किसने किया. संविधान में, प्रस्तावित और हो चुके, कुल 128 संशोधन हैं. पहला संशोधन पहली निर्वाचित लोकसभा से पहले यानी 1950 का है. संशोधन होना संविधान की जीवंतता का प्रमाण है.
हमारा संविधान इतना लचीला है और हमारे संविधान निर्माताओं ने यही सोचकर इसे लचीला बनाया, ताकि समय के हिसाब से इसमें संशोधन हो सके. संविधान सभा में 22 जनवरी, 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव की बहस का जब समापन किया, तो उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण बात कही- ‘यह संविधान हम अपनी पीढ़ी के लिए बना रहे हैं. आनेवाले पीढ़ियों को यह अधिकार होगा कि वे इसमें जैसा उचित समझें, वैसा संशोधन करें.’ आज नेहरू की यह बात प्रासंगिक है. दुनिया के किसी भी देश का संविधान भारत के संविधान जितना लचीला नहीं है.
संविधान की किसी धारा में संशोधन या उससे छेड़छाड़, इन दोनों के बीच के फर्क को समझने की लोग कोशिश आज नहीं कर रहे हैं. संविधान में संशोधन को भी लोग छेड़छाड़ का आरोप लगा देते हैं. यही वजह है कि आज संविधान को लेकर बात करना जरूरी है. आज जो संविधान हमारे सामने है, वह अपने मूल संविधान (1950 में लागू होने के वक्त का) से बहुत अलग है.
हमारे संविधान को तीन ताकतों ने समय-समय पर बदला है, छेड़छाड़ नहीं किया है. पहली ताकत संसद ने संविधान को बदला है. दूसरी ताकत है सुप्रीम कोर्ट है, जिसकी संवैधानिक बेंच में तीन बड़ी पोथियां हैं, जिसमें यह दर्ज है कि संवैधानिक बेंच ने संशोधन से संबंधित कितने फैसले लिये.
तीसरी ताकत भारत के नागरिक हैं, जिन्होंने जनहित याचिकाओं के जरिये जो सवाल उठाये, उससे भी संविधान परिवर्तित होता गया. इस तरह मूल संविधान में भारी बदलाव आ गया है. लेकिन, आज यह बात लोगों को जाननी चाहिए कि संविधान के साथ सबसे बड़ी छेड़छाड़, सबसे बड़ा गुनाह, सबसे बड़ा हमला कब हुआ और किसने किया. वर्ष 1971 से 1977 के दौरान इंदिरा गांधी के कार्यकाल में कांग्रेस की सरकार रूस के पैटर्न पर पूरी राज्य-व्यवस्था को खड़ा करना चाहती थी.
इसलिए संविधान में जहां-जहां उनको अड़चनें आ रही थीं, उनको दूर करने के लिए सरदार स्वर्ण सिंह कमेटी बनी और उस कमेटी ने एक सिफारिश की, जिसके आधार पर संविधान में 42वां संशोधन हुआ. गौरतलब है कि 42वां संशोधन संविधान के मूल के दो-तिहाई हिस्से को बदल देता है. उसी कार्यकाल में, उसी दौर में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने जबलपुर के शुक्ला मामले में दिये अपने एक फैसले में जीने के अधिकार को भी छीन लिया. संविधान के साथ इससे बड़ी छेड़छाड़ कभी हुई ही नहीं.
नरेंद्र मोदी की सरकार भारत की पहली सरकार है, जिसने संविधान की रक्षा का शपथ लिया है. मोदी सरकार ने ही संविधान दिवस को एक उत्सव के रूप में मनाने का सिलसिला शुरू किया. ऐसे में आज मोदी सरकार पर संविधान के साथ छेड़छाड़ का जो आरोप है, वह राजनीतिक आरोप भर है, जो सिर्फ मुसलमानों को भड़काने के लिए है.
मुझे मोदी सरकार के साथ ही पिछली सरकारों से भी शिकायत है कि 42वें संशोधन में जिस संविधान के दो-तिहाई हिस्से को बदल दिया गया और जब जनता पार्टी की सरकार आयी, तब 45वें संविधान संशोधन से कुछ चीजों को सुधारा, लेकिन कांग्रेस द्वारा किये गये छेड़छाड़ को पूरी तरह से ठीक नहीं किया गया.
उसमें सबसे प्रमुख बात यह है कि इंदिरा गांधी ने संविधान की प्रस्तावना में बदलाव किया और उसमें दो शब्द ‘सेक्युलरिज्म’ और ‘सोशलिज्म’ जोड़ दिया. सवाल है कि क्या हमारे संविधान निर्माता सांप्रदायिक थे, जो उन्होंने संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलरिज्म शब्द नहीं रखा? आज संविधान की बहस में यह सवाल पूछा जाना चाहिए. इसलिए मोदी सरकार से मेरी शिकायत है कि उसने संविधान की मूल प्रस्तावना को वापस लाने की कोशिश नहीं की.
आज सीएए पर बहस में यह कहा जा रहा है कि संविधान खतरे में है. ऐसी बहस ही निराधार है. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि सीएए नागरिकता देने का कानून है, नागरिकता छीनने का नहीं. इस बात को मैं सही मानता हूं. आज जो बौद्धिक कवायद चल रही है कि संविधान के साथ छेड़छाड़ हो रहा है, वह आम जनता को गुमराह करने के लिए किया जा रहा है कि सीएए से मुसलमानों की नागरिकता चली जायेगी. यह निराधार बात है.
यह लेखक के निजी विचार हैं
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)
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