एक अशांत साल की आशंका

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date

आकार पटेल

लेखक एवं स्तंभकार

aakar.patel@gmail.com

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) की अधिसूचना जारी हो चुकी है और वह लागू हो गया है. इसके लेकर हुए राष्ट्रव्यापी विरोध के बावजूद सरकार के दृढ़ रुख में कोई नरमी नहीं आयी है.

यह तथ्य कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसका बचाव कर पाना कठिन हो सकता है और हमारे विदेश मंत्री को अमेरिका में आयोजित एक ऐसी बैठक में शामिल होने से इनकार तक करना पड़ा, जिसमें एक महिला अमेरिकी कांग्रेस सदस्य द्वारा उनकी आलोचना की जानी थी, उसके रवैये में कोई फर्क नहीं ला सका. इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी है, पर पिछले कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट के रुख को देखते हुए वहां से भी किसी राहत की उम्मीद कम ही है.

जेएनयू के मामले में राष्ट्र ने एक युवती और छात्र संघ नेता पर हमले की तस्वीरें देखीं. जहां उसके लिए न्याय की मांग की जा रही थी, वहीं पुलिस ने हमलावरों पर लगभग कोई भी कार्रवाई न करते हुए उल्टे उस युवती को ही गुनाहगार नामित कर दिया है.

पुलिस को प्रशासन से स्वतंत्र माना जाता रहा है, पर व्यवहार में क्या, सिद्धांत रूप में भी यह सच नहीं दिखता. पुलिस वही करेगी, जो सरकार उसे करने को कहेगी. चूंकि दिल्ली पुलिस पर केजरीवाल की दिल्ली सरकार की बजाय मोदी की केंद्रीय सरकार का नियंत्रण होता है, इसलिए इसका अर्थ यह है कि गृह मंत्री अमित शाह की स्वीकृति से ही यह उल्टा न्याय हुआ है.

जब जम्मू और कश्मीर को विभाजित कर वहां की सड़कों पर सुरक्षा बलों की एक बड़ी तादाद तैनात कर दी गयी, तो मैंने एक स्थानीय पत्रकार से पूछा था कि केंद्र सरकार की मंशा क्या है. उनका यह कहना था कि इसमें इसके सिवाय कोई नयी चीज नहीं लग रही कि प्रशासन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का यह निर्देश है कि वह स्थानीय लोगों के साथ ‘बहुत कठोर’ बने. और यही चीज है, जो वास्तव में हुई भी.

राज्य का नेतृत्व बगैर किसी आरोप और अपराध के जेल में है. नागरिकों की आवाजाही, उनके शांतिपूर्ण जमावड़े और संचार साधनों पर प्रतिबंधों के साथ, जैसा इस राज्य में पिछले कई दशकों से चला आ रहा है, उनके घरों के बाहर सुरक्षा बलों की लगातार मौजूदगी की वजह से यहां के नागरिक भी जेल में ही हैं. इन सबके साथ ही, न तो ऐसा कोई आश्वासन दिया गया है अथवा कोई कार्रवाई ही हुई है, जिससे यह भरोसा मिल सके कि कश्मीरियों का भविष्य इससे कुछ अलग होगा.

इन सबसे तो हम यही समझ सकते हैं कि यही वह रीति है, जिस पर चलते हुए नरेंद्र मोदी एवं अमित शाह द्वारा भारतीयों की सबसे बड़ी चिंता के मुद्दों का प्रबंधन किया जाता रहेगा. यदि हम देखें कि नागरिकता के मुद्दे पर मोदी और शाह ने क्या कहा है, तो यह चीज बिल्कुल उजागर हो जाती है. जब उन्होंने यह देख लिया कि इसका विरोध थमने नहीं जा रहा है, तो प्रधान मंत्री मोदी ने यह कहकर उसे शांत करने की कोशिश की कि अभी एक राष्ट्रव्यापी एनआरसी पर विचार नहीं हुआ है.

उन्होंने यह नहीं कहा कि यह लागू नहीं होगा. नतीजतन, चिंतित लोगों को इस बयान से कोई राहत नहीं मिली. पर यह तो तय है कि पीएम इसे छोड़ने नहीं जा रहे, क्योंकि यह सब उनकी सैद्धांतिक आस्था से जन्म ले रहा है, किसी राजनीतिक रणनीति से नहीं. इससे यदि भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को कुछ चोट पहुंच रही है, तो वे उसे भी सहन करने को तैयार हैं, क्योंकि यह उनके आदर्शों को आगे बढ़ाता है.

आगे के पूरे साल के लिए यह सब हमें एक खतरनाक दिशा में ले जा रहा है. पहली अप्रैल से मोदी सरकार राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी (एनपीआर) हेतु सारे विवरण इकट्ठे करने के लिए प्रत्येक घर में कर्मियों को भेजेगी, जो एनपीआर की दिशा में पहला कदम होगा.

जब उनकी नागरिकता तथा आजादी छिनने के खतरे पहले से ही उत्पीड़ित लाखों लोगों के घरों की दहलीज तक पहुंच जायेंगे, तो उसकी प्रतिक्रिया अभी सड़कों पर होते विरोध प्रदर्शनों से ज्यादा मजबूत होगी. और जब उन्हें लगा सदमा साफ होकर दिखने लगेगा, तो दुनिया चुप नहीं बैठेगी. यह संभव है और संभावित भी कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस पद पर दोबारा नहीं आ सकेंगे और इस वर्ष के अंतिम हिस्से में कोई डेमोक्रेट ही अमेरिका का अगला राष्ट्रपति चुना जायेगा. डेमोक्रेट उम्मीदवारों में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जो अपने अल्पसंख्यकों के प्रति क्रूर व्यवहार कर रहे मोदी या भारत के प्रति दोस्ताना रुख रखेगा.

अभी सरकार यह सोच रही है कि जो कुछ भी हो रहा है, वह उसके नियंत्रण में है. उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा दर्जन से भी ज्यादा मुस्लिम विरोधकर्ता मारे गये, जबकि सुप्रीम कोर्ट सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान को लेकर चिंतित है. देश के नागरिकों के अधिकारों से अधिक मोदी उन पर अपनी सरकार के अधिकारों पर जोर दे रहे हैं. और वे यह सब एक ऐसे गुस्से तथा बदले की भावना से कर रहे हैं, जो एक बड़े लोकतंत्र के नेतृत्व के लायक नहीं है और खतरनाक भी है.

उनकी सरकार में उनका कोई विरोध करनेवाला भी नहीं है, जो इन सबसे चिंतित हो. सुप्रीम कोर्ट को भी इन सबको लेकर चिंता की कोई वजह नहीं दिखती. इस तरह, एक ओर जहां इस देश की सरकार अपने सैद्धांतिक एजेंडे को आगे बढ़ाती जा रही है और दूसरी ओर, यहां के नागरिक खुद को बचाने को जो भी कर सकें, कर रहे हैं, तो लगता यही है कि 2020 का यह नया वर्ष भारत के लिए अशांत होने जा रहा है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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