प्रधानमंत्री का हस्तक्षेप

Updated at : 06 Jan 2020 6:38 AM (IST)
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प्रधानमंत्री का हस्तक्षेप

कमजोर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश में सरकार कई सुधारों की घोषणा कर चुकी है और आगामी दिनों में कुछ और कदम उठाये जाने की उम्मीद है. अगले वित्त वर्ष का बजट भी फरवरी में पेश होगा, जिसमें अनेक ठोस नीतिगत पहलें की जा सकती हैं. इस सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने […]

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कमजोर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश में सरकार कई सुधारों की घोषणा कर चुकी है और आगामी दिनों में कुछ और कदम उठाये जाने की उम्मीद है. अगले वित्त वर्ष का बजट भी फरवरी में पेश होगा, जिसमें अनेक ठोस नीतिगत पहलें की जा सकती हैं. इस सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीधा हस्तक्षेप किया है. इससे इंगित होता है कि आर्थिकी की गति तेज करना सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता है.

खबरों के मुताबिक, प्रधानमंत्री ने पिछले सप्ताह दो दिन की विशेष बैठक में अर्थव्यवस्था की समीक्षा की है. अनेक मंत्रियों और संबद्ध सचिवों से उन्होंने यह भी जानकारी हासिल की है कि कौन-सी नीतियां कारगर हैं और कौन-सी नहीं. इस बैठक में अगले पांच सालों की रूप-रेखा पर भी विचार किया गया है. अगले कुछ दिनों में प्रधानमंत्री मोदी उद्योग जगत के महत्वपूर्ण लोगों से भी चर्चा कर अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति और वृद्धि दर तेज करने के लिए जरूरी उपायों पर उनकी राय जानने की कोशिश करेंगे. माना जा रहा है कि इस पूरी प्रक्रिया से निकले खास बिंदुओं को बजट में शामिल किया जा सकता है. सरकार ने 2024 तक अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है.

इसे पूरा करने के लिए न केवल बढ़ोतरी में गिरावट को रोकना होगा, बल्कि इसमें तेजी लाने की दरकार भी है. लगभग सभी अनुमानों में बताया जा रहा है कि चालू वित्त वर्ष में वृद्धि दर अधिक-से-अधिक पांच फीसदी के आसपास रहेगी, जबकि आर्थिक समीक्षा में इसके सात फीसदी रहने की उम्मीद जतायी गयी थी. जुलाई-सितंबर तिमाही में यह दर 4.5 फीसदी हो गयी थी, जो सात सालों में सबसे कम है. निवेश, मांग, बचत और निर्यात में कमी ने उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव डाला है.

सरकार के सामने भी विभिन्न योजनाओं में खर्च के लिए धन जुटाने की बड़ी चुनौती है. राजस्व और खर्च के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है और वित्तीय घाटा बढ़ता जा रहा है. कर-संग्रहण भी निर्धारित लक्ष्य से कम रहने की आशंका है. ऐसे में सरकार को अधिक कर्ज लेना पड़ सकता है. प्रधानमंत्री ने कर अधिकारियों से लक्ष्य पर ध्यान देने का आग्रह तो किया है, लेकिन इसे पूरा करना बहुत मुश्किल है. खर्च में कटौती के हालिया प्रयासों से वित्तीय घाटे में कुछ कमी तो की जा सकती है, पर इसका असर अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा कर्ज लेना भी चिंता का कारण है, जो बजट के बही-खाते में नहीं दिखाया जाता. इस स्थिति में नये उद्यमों व परियोजनाओं के लिए भी गुंजाइश कम है. ऐसी अर्थव्यवस्था में रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा कर पाना भी संभव नहीं है. मुद्रास्फीति, विशेषकर खाद्य मुद्रास्फीति, बढ़ने से भी लोगों पर बोझ बढ़ा है. इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री मोदी का हस्तक्षेप बहुत जरूरी पहल है और इससे संबद्ध मंत्रालयों, संस्थाओं और उद्योग जगत के बीच बेहतर तालमेल संभव हो सकेगा.

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