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राजनीति में दो टर्निंग प्वाइंट्स

Updated at : 18 Nov 2019 6:10 AM (IST)
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राजनीति में दो टर्निंग प्वाइंट्स

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार ravibhushan1408@gmail.com भारतीय राजनीति में वर्ष 1989 का विशेष महत्व है. तीस वर्ष पहले के उस वर्ष-विशेष की याद आज की राजनीति की एक वस्तुपरक समझ की दृष्टि से विशेष आवश्यक है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौ नवंबर, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद नौ नवंबर के महत्व को अपने राष्ट्रीय […]

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रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
ravibhushan1408@gmail.com
भारतीय राजनीति में वर्ष 1989 का विशेष महत्व है. तीस वर्ष पहले के उस वर्ष-विशेष की याद आज की राजनीति की एक वस्तुपरक समझ की दृष्टि से विशेष आवश्यक है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौ नवंबर, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद नौ नवंबर के महत्व को अपने राष्ट्रीय संदेश में विशेष स्थान दिया था. अपने संदेश में उन्होंने इसी तारीख को बर्लिन की दीवार गिरने की बात कही थी और करतारपुर गलियारे के खुलने की ओर ध्यान दिलाया था. नौ नवंबर, 1989 की कुछ और घटनाएं हैं, पर उस वर्ष पर एक सरसरी दृष्टि डाली जाए, जिसका 2019 की भारतीय राजनीति से विशेष संबंध है.
वर्ष 1989 में नौवीं लोकसभा का चुनाव 22 नवंबर और 26 नवंबर को दो चरणों में संपन्न हुआ था. यह वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक हेडगेवार का जन्मशती वर्ष था. अटल बिहारी वाजपेयी ने नयी दिल्ली में आयोजित हेडगेवार जन्मशती रैली में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद को एक ‘चुनावी मुद्दा’ बताया था.
दो महीने बाद 11 जून, 1989 को भाजपा की त्रैमासिक राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में संपन्न हुई थी. इस बैठक में भाजपा ने अपने एजेंडे में राम मंदिर की मांग रखी. इसने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और सरदार वल्लभ भाई पटेल की भूमिका को याद किया. यहीं से नेहरू के स्थान पर पटेल को ‘सच्चे राष्ट्रवादी’ के रूप में पेश किया गया.
पालमपुर अधिवेशन के बाद राम जन्मभूमि आंदोलन केवल मस्जिद के स्थान पर मंदिर का न रहा. पालमपुर बैठक के बाद ही एक जुलाई, 1989 को देवकीनंदन अग्रवाल ने अदालत में सूट नंबर पांच दायर किया, जिसमें विक्रमादित्य के जमाने में अयोध्या में राम मंदिर की बात कही गयी थी और समूची विवादास्पद भूमि को राम मंदिर निर्माण हेतु देने का भी अनुरोध था. इसके कुछ समय बाद 10 जुलाई, 1989 को इलाहाबाद हाइकोर्ट ने सभी लंबित मामलों को, जो विवादास्पद ढांचे से संबंधित थे, जिला न्यायालय से अपने पास स्थानांतरित किया.
इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 14 अगस्त, 1989 को विवादित जमीन पर यथास्थिति कायम रखने का निर्देश दिया. यह वर्ष लोकसभा का चुनावी वर्ष था. इसी वर्ष 31 जनवरी को ‘ऑल इंडिया बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी’ ने ‘हिफाजती दस्ता’ के गठन की बात की थी और इसी वर्ष इलाहाबाद में कुंभ मेला लगा था.
विहिप का संत सम्मेलन एक फरवरी को समाप्त हुआ था और इसके दो नेताओं ने देवत्थान एकादशी के दिन मंदिर की नींव रखने की घोषणा भी की. उसने जन समर्थन के लिए दो अभियान- शिलापूजन और शिलायात्रा- की घोषणा की. पहली बार 1989 में ही शिवसेना ने भाजपा से गठबंधन किया था. कांग्रेस बुरी तरह ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ के आरोप में फंस चुकी थी और विश्वनाथ प्रताप सिंह उस पर बोफोर्स के गोले दाग रहे थे.
नौवीं लोकसभा चुनाव (नवंबर, 1989) के पहले विहिप ने मंदिर-निर्माण के लिए अपना आंदोलन तीव्र कर दिया था. नौ नवंबर, 1989 को विहिप ने बिहार के सुपौल जिला के पैंतीस वर्षीय विहिप दलित कार्यकर्ता कामेश्वर चौपाल से अयोध्या राम मंदिर शिलान्यास की पहली ईंट रखवायी, वे बाद में भाजपा से बिहार विधानसभा परिषद् के सदस्य बने. नौ नवंबर, 1989 को मुहूर्त देखा गया था. उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी शिलान्यास कार्यक्रम से सहमत नहीं थे, पर राजीव गांधी का इसे समर्थन था. इलाहाबाद हाइकोर्ट का यथास्थिति कायम रखने का निर्देश धरा का धरा रह गया. चुनाव होने में अभी देर थी और 22 नवंबर के पहले सारा दृश्य बदल दिया गया था.
इसी वर्ष शिलान्यास समारोह के बाद विहिप नेता अशोक सिंघल ने कहा था कि यह नये मंदिर की आधारशिला रखने का सामान्य समारोह नहीं है. हमलोगों ने हिंदू राष्ट्र की आधारशिला का पत्थर रखा है. पालमपुर प्रस्ताव भाजपा का ‘टर्निंग प्वाइंट’ था और 1989 भारतीय राजनीति का ‘टर्निंग प्वाइंट’ था. इस वर्ष संघ परिवार ने सफलतापूर्वक अयोध्या विवाद या राम जन्मभूमि आंदोलन को देश की राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया. राजीव गांधी ने चुनाव की शुरुआत फैजाबाद से की थी.
नौवीं लोकसभा के चुनाव (नवंबर, 1989) में भाजपा की सीटें दो से बढ़ कर 85 हो गयी. उसे 83 सीटों का इजाफा हुआ और कांग्रेस को 207 सीटों का नुकसान हुआ. इस चुनाव के पूर्व राजीव सरकार के विरोध के लिए जन मोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस (एस) के विलय के बाद जनता दल का गठन हुआ था. बाद में जनता दल से मिल कर द्रमुक, तेदेपा और अन्य कई क्षेत्रीय दलों ने ‘नेशनल फ्रंट’ की स्थापना की. भाकपा और माकपा के साथ मिल कर 1989 का चुनाव लड़ा गया था.
वीपी सिंह की सरकार बनी. यह मात्र संयोग है कि नौ नवंबर, 1989 को राम मंदिर का शिलान्यास हुआ और तीस वर्ष बाद नौ नवंबर, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय का फैसला रामलला के पक्ष में गया. क्या आज के भारत का 1989 से कोई संबंध नहीं है? सत्रहवीं लोकसभा में भाजपा की सीटें बढ़ी हैं और वोट प्रतिशत भी बढ़ा है. वर्ष 1989 में ‘हिंदू राष्ट्र’ की बात विहिप ने की थी और अब 2019 में इसकी बात संघ प्रमुख मोहन भागवत कर रहे हैं.
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