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जमा-पूंजी की सुरक्षा

Updated at : 12 Nov 2019 7:44 AM (IST)
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जमा-पूंजी की सुरक्षा

अधिकतर खाताधारक ब्याज या मुनाफा कमाने के लिए बैंकों में अपनी कमाई नहीं रखते हैं. वे पैसे के सुरक्षित रहने के भरोसे और जरूरत पड़ने पर उसे आसानी से निकालने की सुविधा की वजह से ऐसा करते हैं. कुछ समय पहले पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक के कुप्रबंधन से पैदा हुई स्थिति से इस भरोसे […]

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अधिकतर खाताधारक ब्याज या मुनाफा कमाने के लिए बैंकों में अपनी कमाई नहीं रखते हैं. वे पैसे के सुरक्षित रहने के भरोसे और जरूरत पड़ने पर उसे आसानी से निकालने की सुविधा की वजह से ऐसा करते हैं.

कुछ समय पहले पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक के कुप्रबंधन से पैदा हुई स्थिति से इस भरोसे को धक्का लगा है. इस बैंक ने मनमाने ढंग से बड़ी कंपनियों को कर्ज देकर अपनी वित्तीय सेहत को तबाह कर लिया और इसकी मार खाताधारकों को झेलनी पड़ रही है.

अनेक बैंकों पर बांटे गये कर्जों और बची हुई पूंजी के बारे में रिजर्व बैंक को सही स्थिति की जानकारी नहीं देने के आरोप भी हैं. फंसे हुए कर्जों, लापरवाही और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कुछ सालों से सरकार और रिजर्व बैंक ने अनेक कदम उठाये हैं. सूत्रों के अनुसार, इस कड़ी में अब बीमित राशि को बढ़ाने और सहकारी बैंकों को पूरी तरह रिजर्व बैंक के नियंत्रण में लाने पर चर्चा हो रही है.

मौजूदा नियमों के तहत खाते में जमा राशि में से एक लाख रुपये का बीमा होता है. जब कोई बैंक दिवालिया हो जाता है, तो यह रकम खाताधारक को लौटा दी जाती है. यह सीमा ढाई दशक से भी पहले 1993 में तय की गयी थी. इस अवधि में बैंकों, बीमा निगम और खाताधारकों की स्थिति में कई बदलाव आये हैं, जिनके मद्देनजर इस राशि को दुगुना किया जा सकता है. रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल बीमा के दायरे में 33.70 लाख करोड़ रुपये थे, जबकि कुल जमा राशि 120 लाख करोड़ से अधिक थी. कुल जमा राशि पर प्रीमियम जमा करने के नियम को बदला जा सकता है.

अभी करीब 50 फीसदी जमाकर्ता एक लाख रुपये के बीमा नियम के तहत आते हैं. यदि इसे दोगुना कर दिया जाता है, यह दायरा 75 फीसदी हो सकता है. ऐसा करने के अन्य उचित आधार भी हैं. रिजर्व बैंक की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 में कुल जमा राशि में बीमित धन का हिस्सा 28 फीसदी था, जबकि अस्सी के दशक के शुरू में यह अनुपात 75 फीसदी तक था.

बीमा की सीमा बढ़ाने के पक्ष में एक तर्क यह भी है कि इसका निर्धारण रुपये की कीमत के हिसाब से हो. माना जा रहा है कि सरकार बुजुर्गों और सेवानिवृत्त लोगों के लिए विशेष प्रावधान कर सकती है क्योंकि इनमें से ज्यादातर बचत और ब्याज पर निर्भर होते हैं. वर्तमान व्यवस्था में बदलाव के क्रम में छोटे खाताधारकों और ग्रामीण आबादी के हितों की रक्षा के लिए भी उपाय होने चाहिए.

उम्मीद है कि जल्दी ही इस संबंध में वित्त मंत्रालय और संबद्ध संस्थाओं द्वारा समुचित निर्णय ले लिया जायेगा, ताकि बैंकिंग प्रणाली पर लोगों का भरोसा बना रहे. यह भरोसा अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए जरूरी है. इसके साथ बैंकों पर रिजर्व बैंक के कड़े नियंत्रण को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए, क्योंकि समस्याओं की जड़ में प्रबंधन का लचर होना है.

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