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तेलंगाना का राजनीतिक वंशवाद

Updated at : 11 Sep 2019 6:17 AM (IST)
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तेलंगाना का राजनीतिक वंशवाद

नवीन जोशी वरिष्ठ पत्रकार naveengjoshi@gmail.com बीते रविवार को तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने अपने मंत्रिमंडल में जिन छह नये मंत्रियों को शामिल किया, उनमें उनका बेटा केटी रामाराव और भतीजा टी हरीश राव, ये दोनों ही शामिल हैं. साल 2014 में बने तेलंगाना की पहली सरकार में राजनीतिक वंशवाद का यह नया रूप […]

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नवीन जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
naveengjoshi@gmail.com
बीते रविवार को तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने अपने मंत्रिमंडल में जिन छह नये मंत्रियों को शामिल किया, उनमें उनका बेटा केटी रामाराव और भतीजा टी हरीश राव, ये दोनों ही शामिल हैं.
साल 2014 में बने तेलंगाना की पहली सरकार में राजनीतिक वंशवाद का यह नया रूप उसी साल सामने आ गया था. लेकिन 2018 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद चंद्रशेखर राव ने बेटे और भतीजे दोनों को मंत्रिमंडल से बाहर रखने का साहस दिखाया था. भाजपा की बढ़ती चुनौती का मुकाबला करने के लिए अब उन्हें यही राह सूझी कि बेटे-भतीजे को फिर से मंत्री बना दें.भारतीय राजनीति के लिए परिवारवाद अब कोई चौंकानेवाली बात नहीं रही.
लगभग सभी क्षेत्रीय पार्टियां पारिवारिक दल का रूप लेती जा रही हैं, हालांकि मुख्यमंत्री पिता की सरकार में बेटे-भतीजे के मंत्री बनने का संयोग इससे पहले नहीं बना. हां, 2009 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने अपने तेज-तर्रार और महत्वाकांक्षी बेटे स्टालिन को उप-मुख्यमंत्री बनाया था.
मुख्य बात यह है कि तेलंगाना राष्ट्र समिति के मुखिया और राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव भाजपा के बढ़ते कदमों से हैरान-परेशान हैं. वे किसी भी कीमत पर भाजपा को राज्य में पांव जमाने देना नहीं चाहते, जबकि वह बहुत सघन तरीके से वहां अपनी पैठ बनाने में लगी है. उनका नया कदम इसी रणनीति का हिस्सा है.
भाजपा की अब जिन राज्यों पर निगाह है, उनमें पश्चिम बंगाल और तेलंगाना प्रमुख हैं. बंगाल में वह किस कदर आक्रामक ढंग से अपने पैर जमा रही है, उसका नजारा लोकसभा में दिख चुका. भाजपा ने बंगाल ही नहीं तृणमूल कांग्रेस में भी बड़ी सेंध लगा दी है. ओडिशा भी भाजपा के राडार पर है, लेकिन लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद वह विधानसभा चुनाव में नवीन पटनायक के किले में दरार नहीं डाल सकी थी.
तेलंगाना में भाजपा दो कारणों से अपने लिए बेहतर संभावना देख रही है. एक तो वहां कांग्रेस और तेलुगु देशम दोनों ही बिल्कुल हाशिये पर चले गये हैं. सफाया तो इनका पड़ोसी आंध्र प्रदेश में भी हो गया, लेकिन वहां वाईएसआर कांग्रेस के रूप में बहुत तगड़ा प्रतिद्वंद्वी मौजूद है.
तेलंगाना में कांग्रेस और तेलुगु देशम की जमीन छिन जाने के बाद टीएसआर के मुकाबले भाजपा ही बचती है. लोकसभा चुनाव में भाजपा ने वहां चार सीटें जीतीं, जिनमें से तीन टीएसआर से छीनी थीं.
टीआरएस को घेरने के लिए भाजपा कई मोर्चों पर काम कर रही है. पिछले विधानसभा चुनाव में टीआरएस का कुछ सीटों पर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिसे इत्तहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) से समझौता था. भाजपा इसे मुद्दा बनाकर तेलंगाना में हिंदू ध्रुवीकरण का प्रयास कर रही है. टीआरएस को मुसलमान समर्थक पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिश हो रही है.
भाजपा की इस चाल को नाकामयाब करने के लिए टीआरएस ने तीन तलाक विधेयक पर राज्यसभा से बहिर्गमन करके उसे पास होने देने में मदद की और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करनेवाले विधेयक का समर्थन किया. उसका सहयोगी दल एआईएमआईएम इस कारण उससे बहुत खफा हुआ. उसने टीआरएस को सबक सिखाने की चेतावनी तक दी, लेकिन चंद्रशेखर राव भाजपा को यह अवसर नहीं देना चाहते कि वह उनकी पार्टी को मुस्लिम विरोधी प्रचारित करे.
इस बीच भाजपा ने नया दांव चला. चंद्रशेखर राव ने दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीतने के बाद अपने बेटे और महत्वाकांक्षी भतीजे हरीश राव को पहली बार की तरह मंत्री नहीं बनाया. बेटे को उन्होंने पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर संतुष्ट कर दिया था, लेकिन भतीजा हरीश राव उपेक्षित ही रहा. प्रकट रूप में उसने विरोध नहीं जताया, लेकिन उसकी नाराजगी को भाजपा ने सार्वजनिक करना शुरू किया.
यह प्रचार भी किया कि टीआरएस के कई नेता भाजपा के संपर्क में हैं. यह भाजपा की पुरानी रणनीति है. कई राज्यों में वह इसे आजमा चुकी है. पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री मोदी के यह कहने के बाद कि तृणमूल के चालीस विधायक हमारे संपर्क में हैं, ममता की पार्टी से भाजपा की ओर दल-बदल का सिलसिला शुरू हुआ था. ऐसे बयान के बाद चंद्रशेखर राव के कान खड़े होना स्वाभाविक था.
भाजपा टीआरएस को घेरने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहती. इस बार वह 17 सितंबर को ‘हैदराबाद मुक्ति दिवस’ बड़े पैमाने पर मनाने जा रही है. यह भी प्रचारित कर रही है कि टीआरएस एआईएमआईएम की नाराजगी के डर से हैदराबाद दिवस नहीं मनाती.
उल्लेखनीय है कि भारतीय फौज के हस्तक्षेप के बाद 17 सितंबर, 1948 को हैदराबाद का भारतीय संघ में विलय हो पाया था. आज तक किसी पार्टी ने हैदराबाद मुक्ति दिवस नहीं मनाया. भाजपा ने इसे बड़ा आयोजन बनाने के लिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को हैदराबाद आमंत्रित किया है.
अमित शाह तेलंगाना में बहुत दिलचस्पी ले रहे हैं. उन्होंने हाल में पार्टी का सदस्यता अभियान वहीं से शुरू किया और खुद भी हैदराबाद से सदस्यता ली. पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी 18 सितंबर को हैदराबाद जानेवाले हैं.
पार्टी के राज्य नेता दावा कर रहे हैं कि उस दिन कई टीआरएस नेता भाजपा में शामिल हो जायेंगे. इस तरह घेराबंदी देखकर चंद्रशेखर राव ने मंत्रिमंडल विस्तार करके उन सबको संतुष्ट करना चाहा है, जिन्हें भाजपा अपनी तरफ खींच सकती थी. भतीजे हरीश राव को खुश करना सबसे ज्यादा जरूरी था. इस कोशिश में राजनीतिक वंशवाद का वह कीर्तिमान फिर बन गया, जिसे उन्होंने इस बार नहीं दोहराने का साहस दिखाया था.
भाजपा के लगभग वर्चस्व और कांग्रेसी पराभव के इस दौर में क्षेत्रीय दलों का परिवारवाद भी विकल्पहीनता के लिए जिम्मेदार है. अधिकाधिक पारिवारिक होते हुए वे बिल्कुल ‘बंद’ और लोकतांत्रिक दल होते जा रहे हैं. कैसी विडंबना है कि इन दलों के बड़े संकट भी परिवार के भीतर से ही पैदा होते हैं. करुणानिधि, बाल ठाकरे, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव आदि के कभी ताकतवर रहे दल पारिवारिक लड़ाइयों से ही कमजोर हुए.
राजनीति की नयी प्रतिभाओं के विकास के लिए भी क्षेत्रीय दलों का परिवारवाद कोई संभावना नहीं छोड़ता. अब कोई लालू, कोई मुलायम या कोई चंद्रशेखर राव पैदा हो तो कैसे? उनके अस्तित्व को खतरा भीतर से हो या बाहर से, तारणहार परिवार में ही तलाशा जाता है. तेलंगाना में भी यही हुआ है.
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