भारतीय कूटनीति की सफलता
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :29 Aug 2019 6:47 AM (IST)
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अवधेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार awadheshkum@gmail.com फ्रांस के क्वारित्ज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बैठक का सुर्खियां बनना स्वाभाविक है. थोड़ी गहराई से देखेंगे, तो नजर आयेगा कि भारतीय कूटनीति पूरी गति से दौड़ रही है. प्रधानमंत्री फ्रांस की यात्रा पर गये. वहां से वे संयुक्त अरब अमीरात पहुंचे और फिर […]
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अवधेश कुमार
वरिष्ठ पत्रकार
awadheshkum@gmail.com
फ्रांस के क्वारित्ज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बैठक का सुर्खियां बनना स्वाभाविक है. थोड़ी गहराई से देखेंगे, तो नजर आयेगा कि भारतीय कूटनीति पूरी गति से दौड़ रही है.
प्रधानमंत्री फ्रांस की यात्रा पर गये. वहां से वे संयुक्त अरब अमीरात पहुंचे और फिर बहरीन. फिर जी7 की बैठक में शामिल होने फ्रांस गये. उसके पहले वे भूटान में थे. हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दो दिनों के लिए रूस दौरे पर थे. उसके बाद वे प्रधानमंत्री के साथ थे. विदेश मंत्री एस जयशंकर पहले चीन गयेे और फिर नेपाल. इसके पूर्व प्रधानमंत्री ने फोन पर डोनाल्ड ट्रंप से बात की.
उसके बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन से बात की. इसके अलावा भी प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और हमारे कई राजनयिक अलग-अलग देशों के नेताओं से बात कर रहे हैं. मालदीव के राष्ट्रपति, श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, अफगानिस्तान के राष्ट्रपति, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस, संयुक्त अरब अमीरात के प्रिंस आदि से प्रधानमंत्री ने स्वयं बात की. अनुच्छेद 370 हटाये जाने के साथ ही कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गयी थीं. यही कारण है कि पाकिस्तान को दुनियाभर में कहीं से समर्थन नहीं मिल रहा है.
भारत की इस गतिशील और सघन कूटनीति के कई परिणाम हमारे सामने हैं. इसमें एक महत्वपूर्ण परिणाम है, एफएटीएफ यानी फिनांशियल एक्शन टास्क फोर्स की एशिया प्रशांत ग्रूप द्वारा पाकिस्तान को एन्हांस्ड एक्सपेडिटेड फॉलोअप लिस्ट में डालना. यह दरअसल काली सूची में डालना ही है.
ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा में भारतीय कूटनीति इसके लिए प्रयासरत थी. इस बैठक में पाकिस्तान का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी शामिल था. उसने सारे तर्क रखे, लेकिन निर्णय उसके विपरीत हुआ.
इस समूह ने साफ निष्कर्ष दिया कि धनशोधन और आतंक के वित्त पोषण के जो 40 अनुपालन मानक थे उसमें से 32 पर पाकिस्तान खरा नहीं उतरा और जो 11 प्रभावी मानक तय किये गये थे, उनमें से 10 पर खरा नहीं उतरा. इसके बाद पाकिस्तान पर अक्तूबर मंें होनेवाली एफएटीएफ की पूर्ण बैठक में काली सूची में डाले जाने का खतरा मंडराने लगा है.
भारत को अंदाजा है कि चीन उसके बचाव में आयेगा. वह कुछ और देशों जैसे तुर्की, मलेशिया आदि को अपने साथ लेने की कोशिश करेगा. इसका ध्यान रखते हुए भारत की कूटनीति का एक हिस्सा का वहां फोकस है.
पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर को लेकर यह दुष्प्रचार कर रहा है कि वहां की सेना मुस्लिम जनता का खुलेआम दमन कर रही है. ऐसे में कश्मीर को लेकर दुनिया में गलतफहमियां पैदा न हो जाएं, इसके लिए कूटनीतिक सक्रियता आवश्यक है.
भारत ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के साथ प्रमुख देशों के दूतावासों, उच्चायोगों के प्रतिनिधियों को स्पष्ट कर दिया कि यह हमारा आंतरिक मामला है और हमने इसके लिए संविधान में संशोधन किया है.
संयुक्त अरब अमीरात में प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा सफल रही. उसने अपना सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ जाएद’ मोदी को दिया. इसके पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री वहां के शाह एवं प्रिंस से बात कर चुके थे. इससे मोदी की यात्रा और उनके सम्मान में कोई कमी नहीं आयी. गुस्से में पाकिस्तान के सीनेट के अध्यक्ष सादिक संजरानी ने एक प्रतिनिधिमंडल के साथ वहां की अपनी प्रस्तावित यात्रा रद्द कर दी.
बहरीन की यात्रा में भी प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत हुआ. मोदी बहरीन में ‘द किंग हमाद ऑर्डर ऑफ द रेनेसां’ से सम्मानित हुए. बहरीन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से दूसरे देशों के खिलाफ आतंकवाद के इस्तेमाल को खारिज करने की रविवार को अपील की. बयान में पाकिस्तान का नाम नहीं है, लेकिन इसका अर्थ साफ है.
इन दोनों यात्राओं की चर्चा इसलिए आवश्यक है, क्योंकि पूरी इमरान सरकार सक्रिय है कि कम से कम मुस्लिम देश भारत के खिलाफ हों.
मालदीव एक मुस्लिम देश है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने जब वहां के विदेश मंत्री से जम्मू-कश्मीर पर मदद मांगी, तो जवाब मिला कि यह भारत का आंतरिक मामला है. जब पाकिस्तान ने यह कहा कि अफगानिस्तान में आतंकवाद फिर से बढ़ जायेगा, तो अफगानिस्तान ने जवाब दिया कि उनके यहां पाकिस्तान द्वारा वित्त पोषित और भेजे गये आतंकवादी ही हमला करते हैं. ऐसे दो टूक जवाब बिना सघन कूटनीति के नहीं मिल सकते थे.
रूस का तो पहले दिन ही स्पष्ट बयान आ गया था कि यह भारत का आंतरिक मामला है. फ्रांस का समर्थन भी सुरक्षा परिषद् के बंद कमरे की गयी मंत्रणा में साफ-साफ मिला. उस दौरान चीन के अलावा किसी देश का समर्थन पाकिस्तान को नहीं मिला.
मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युएल मैक्रों ने कहा कि भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय मामले में तीसरे की कोई भूमिका नहीं है. ट्रंप पहले तीन बार कश्मीर पर मध्यस्थता की बात कर चुके थे. मोदी से फोन पर बातचीत के बाद उन्होंने इमरान को फोन पर कहा कि भारत के बारे में बयान देते समय संयम बरतें.
जी7 से परे बिआरित्ज में दोनों नेताओं की संयुक्त पत्रकार वार्ता में मोदी ने कश्मीर संबंधी सवाल पर बिना कश्मीर का नाम लिए कहा कि भारत-पाकिस्तान के बीच अनेक द्विपक्षीय मामले हैं, जिसमें हम किसी तीसरे को कष्ट नहीं देते. उसके बाद ट्रंप ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी से उनकी बात हुई है और वहां स्थिति नियंत्रण में है. हमें भरोसा है कि वे सही तरीके से समाधान कर लेंगे. मोदी ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन के साथ भी फोन एवं जी7 में बातचीत की. जॉन्सन ने भी कश्मीर को भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय मामला करार दिया.
पाकिस्तान की कोशिश यह है कि किसी तरह वह दुनिया को यकीन दिलाये कि जम्मू-कश्मीर पर कदम उठाकर मोदी सरकार ने एक बड़ा संकट पैदा कर दिया है कि कभी भी युद्ध हो सकता है, जो नभिकीय युद्ध में बदल सकता है.
किंतु भारतीय कूटनीति की परिपक्व भूमिका से कोई पाकिस्तान की सुनने को तैयार नहीं है. इसी कारण इमरान खान ऐसे बयान दे जाते हैं, जिससे उनके मानसिक असंतुलन का आभास होने लगता है.
हम भारत की इन कूटनीतिक सफलताओं पर गर्व कर सकते हैं, पर निश्चिंत होकर नहीं बैठ सकते. इसे इसी तरह जारी रखना होगा. पाक विनष्ट होने की सीमा तक हमारे खिलाफ जायेगा. पाकिस्तान के विदेश मंत्री कह ही रहे हैं कि हमें एक दिन मुस्लिम समुदाय का साथ अवश्य मिलेगा.
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