लंबी लड़ाई के लिए कमर कसनी होगी
Updated at : 09 Aug 2019 7:00 AM (IST)
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पुष्पेश पंत अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार pushpeshpant@gmail.com किसी भी देश की विदेश नीति का सर्वप्रमुख कर्तव्य उसके राष्ट्रीय हितों का संरक्षण होता है और इन हितों में सबसे प्राथमिक है एकता-अखंडता की हिफाजत तथा राज्य की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखना. भारत की विदेश नीति का प्रयास भी आजादी से आज तक यही रहा है, हालांकि […]
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पुष्पेश पंत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
pushpeshpant@gmail.com
किसी भी देश की विदेश नीति का सर्वप्रमुख कर्तव्य उसके राष्ट्रीय हितों का संरक्षण होता है और इन हितों में सबसे प्राथमिक है एकता-अखंडता की हिफाजत तथा राज्य की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखना. भारत की विदेश नीति का प्रयास भी आजादी से आज तक यही रहा है, हालांकि विद्वानों में इस बात को लेकर मतभेद है कि हमारी सरकारें इसमें कहां तक सफल रही हैं.
पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है कि उनकी आदर्शवादिता, समाजवादी रुझान एवं गुटनिरपेक्षता के कारण ही देश को पाकिस्तान तथा चीन के संदर्भ में भारी नुकसान उठाना पड़ा है. ये सारी बातें इस घड़ी याद आ रही हैं, क्योंकि जम्मू-कश्मीर राज्य में आकस्मिक परिवर्तन से भारतीय विदेश नीति की जटिल चुनौतियों ने अचानक विस्फोटक रूप ले लिया है.
तीन दशकों से भी अधिक समय से पाकिस्तान कश्मीर घाटी में सुनियोजित तरीके से अलगाववाद फैला रहा है और आतंकवाद का इस्तेमाल भारत को कमजोर बनानेवाले हथियार के रूप में करता रहा है.
इस बात की अनदेखी कठिन है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 का दुरुपयोग एक ढाल की तरह भारत-द्रोही करते रहे हैं. जिस तरह इसे खारिज किया गया, उस तरीके को लेकर बहस जायज है, परंतु पाकिस्तान का तैश खाकर यह धमकी देना कि इसके अंजाम बुरे होंगे, परमाणु युद्ध के लिए भारत को तैयार रहना होगा, वगैरह असहनीय है.
चौतरफा घिरा पाकिस्तान बेनकाब हो चुका है. सुरक्षा परिषद से लेकर अंतरराष्ट्रीय अदालत तक उसे शिकस्त मिली है. अमेरिकी सहायता की बैसाखी छिनने को है. धौंस-धमकी की बजाय उसे पुरानी सरकारों की गलतियों को कबूल कर कश्मीर में आज दखलंदाजी को छोड़ने की जरूरत है. यह काम इमरान नहीं कर सकते.
पाकिस्तानी फौज तथा आइएसआइ ही यह फैसला कर संवाद की जमीन तैयार कर सकते हैं. भारतीय राजनयिक विकल्प बहुत सीमित हैं. पाक फौज तथा आइएसआइ दोनों ही के स्वार्थ तभी पनप सकते हैं, जब भारत-पाक तनाव उग्र बने रहें. हां, भारतीय नीति अमेरिका को पाकिस्तान पर अंकुश लगाने के लिए प्रेरित करनेवाला होना चाहिए.
चीन की चुनौती कम कठिन नहीं. जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक, संवैधानिक स्थिति ने लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया है. यही पुराने राज्य का वह हिस्सा है, जिस पर चीन अपनी दावेदारी घोषित करता रहा है. इसी क्षेत्र के पाकिस्तान के नाजायज कब्जे वाले कुछ हिस्से को वह सौगात के रूप में ग्रहण कर चुका है. अक्साई चिन नामक यह इलाका चीन के लिए बेहद संवेदनशील सामरिक महत्व का है.
इसी के माध्यम से वह तिब्बत पर तथा उग्युर बहुल पूर्वी तुरकिस्तान पर अपना आधिपत्य बरकरार रख सकता है. यहीं से गुजरता है वह ऐतिहासिक रेशम राजमार्ग, जिसके जरिये वह ग्वादर के बंदरगाह में पहुंचना चाहता है. मध्य एशिया में चीन की मौजूदगी को प्रभावशाली बनाने के लिए यह परमावश्क है, अर्थात किसी भी कीमत पर वह यह कब्जा-दावेदारी छोड़ नहीं सकता. अतीत में चीन यह पेशकश कर चुका है कि भारत यदि इस दिशा में समझौते के लिए तैयार हो, तो पूर्वोत्तर में वह कुछ रियायत कर सकता है.
बहरहाल, लद्दाख के घटनाक्रम ने उसे चौंका दिया है. भारत सरकार को चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने चेतावनी दी है कि उन्हें यथास्थिति में छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए. अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए चीन ने मानसरोवर के तीर्थयात्रियों के जत्थे को वीसा देने में टालमटोल शुरू कर दी है.
आज चीन भी पाकिस्तान की तरह धमकी ही दे सकता है, पर कुछ कर नहीं सकता. उसकी अर्थव्यवस्था ट्रंप के लगाये प्रतिबंधों के कारण मंदी की चपेट में है और वाणिज्य युद्ध में लगे घावों पर भारत के साथ व्यापार ही मलहम लगा सकता है. भारत की घेराबंदी की उसकी साजिश कमजोर हो चुकी है- श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव तथा नेपाल में भी चीन के आक्रामक लगभग औपनिवेशिक तेवर स्थानीय जनता को त्रस्त कर चुके हैं. जिस-जिस की चीन ने मदद की थी, वह दिवालियेपन की कगार पर है.
इस संक्षिप्त सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य भारत के अनुकूल है. प्रधानमंत्री मोदी ने सही कहा है कि लंबी लड़ाई के लिए कमर कसनी होगी. लड़ाई का अनुवाद सैनिक संग्राम न करें. चीन की तरह हमारी अब तक तेजी से आगे बढ़ती विकास दर भी मंद पड़ चुकी है.
अमेरिका के ईरान पर लगाये प्रतिबंधों तथा मध्यपूर्व में इस्राइल से लेकर तुर्की तक बढ़ते तनावों के कारण भी तेल कीमतें प्रभावित हो रही हैं. यूरोपीय समुदाय भले ही टूट की कगार से जस-का-तस लौट आया है, पर ब्रेग्जिट की समस्या से उबरा नहीं. भारत के लिए यह सोचना मूर्खता ही कहा जायेगा कि वह यह मान ले कि यह तमाम घटनाक्रम उसके पक्ष में है.
पिछले बीस साल में भारत चिंताजनक तेजी से नाहक उतावली से अमेरिका के साथ अपने रिश्ते घनिष्ठतर बनाने में जुटा रहा है. इसी का नतीजा है कि भारत आज अमेरिका की नाराजगी का जोखिम नहीं उठा सकता. यूरोपोन्मुखी पुतिन के राज वाले रूस को हम अपना खास मित्र भी नहीं मान सकते. हम बरसों से ‘उदीयमान’ क्षेत्रीय शक्ति हैं, पर हमारा मुकाबला कोई खस्ताहाल चीन से भी नहीं.
सरकार को भारत के ऐतिहासिक प्रभाव क्षेत्र के बारे में पुनर्विचार करना चाहिए. पाकिस्तान को हाशिये पर पहुंचाने के लिए बांग्लादेश को साथ रखना होगा. वहां से जिहादी जहर का समूल उच्छेदन जरूरी है.
रोहिंग्या या अन्य घुसपैठिये शरणार्थियों को खदेड़ने के चक्कर में हमें उभयपक्षीय संबंधों को हानि पहुंचाने से बचना चाहिए. नेपाल में रियायत को समर्पण समझा जाता रहा है, वहां साम-दाम को संतुलित रखना होगा. पर इसका अर्थ दंड-भेद की नीति का अनुसरण नहीं है. नेपाल संप्रभु जनतांत्रिक गणराज्य है. उसकी पहचान और स्वाभिमान का आदर करने में रत्ती भर कोताही नहीं होनी चाहिए.
दक्षिण-पूर्व एशिया को कभी वृहत्तर भारत कहा जाता था. बिना अहंकारी दावे के यह कहा जा सकता है कि यहां हमारा सांस्कृतिक प्रभाव सदियों से रहा है. ऐतिहासिक संपर्क औपनिवेशिक काल में टूटे और शीत युद्ध के युग में खाई गहरायी. अपने हितों की रक्षा के लिए हम इस तरफ नजर दौड़ाएं. इंडोनेशिया तथा वियतनाम आसियान के असरदार देश हैं- चीन के आक्रामक विस्तारवाद से आशंकित तथा कट्टरपंथी इस्लामी मानसिकता से त्रस्त-चिंतित. यही हमारे स्वाभाविक ‘संधिमित्र’ हैं.
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