जिंदादिल रहने का नाम जिंदगी

कविता विकास लेखिका kavitavikas28@gmail.com युवा पीढ़ी अक्सर कहती है कि जिस काम में वह संलग्न है, उससे उसका मन भर गया है. वह कुछ नया करना चाहती है. उसे ढेर सारी स्वतंत्रता चाहिए, अपने मन की करनी है और किसी दबाव में तो हरगिज नहीं. ऐसा क्या है, इस पीढ़ी में जिसे हर काम की […]
कविता विकास
लेखिका
kavitavikas28@gmail.com
युवा पीढ़ी अक्सर कहती है कि जिस काम में वह संलग्न है, उससे उसका मन भर गया है. वह कुछ नया करना चाहती है. उसे ढेर सारी स्वतंत्रता चाहिए, अपने मन की करनी है और किसी दबाव में तो हरगिज नहीं. ऐसा क्या है, इस पीढ़ी में जिसे हर काम की व्याकुलता रहती है? काम पकड़ने की भी और काम छोड़ने की भी.
समाज में लोग एक-दूसरे के कामों से बहुत प्रभावित रहते हैं. दूसरों के जैसा होने की कोशिश करना हमें अपने जैसा नहीं रहने देता. हरेक आदमी का शौक अलग होता है. कई बार किसी के दबाव में हम उसकी पसंद को अपना लेते हैं. उस काम को जिसे कभी दिल से हम नहीं अपना पाते, वह काम हमारे लिए बोझ बन जाता है. मैंने बहुत से तेज विद्यार्थियों को आगे चल कर गुमनामी में गिरते देखा है. ऐसे बच्चे अनजाने में जीवन का उद्देश्य भूल कर गुमराह हो जाते हैं. जिसे वह सही राह समझ रहे हैं, वह अक्सर उलटी दिशा में ले जानेवाला होता है.
हो सकता है, इसमें उनकी संगति का बहुत प्रभाव रहा हो. किसी के जीवन का कोई पहलू असफल रहा हो, तो जरूरी नहीं कि आपका भी वह पहलू कमजोर हो. आश्चर्य होता है कि जो लोग परायों की सेवा भक्तिभाव से करते हैं, पर अपने मां-बाप को उपेक्षित रखते हैं. इसमें परमार्थ की जगह दिखावा ज्यादा होता है.
उद्देश्यच्युत होने का एक कारण मन में किसी तरह की गांठ का होना भी है. अवचेतन मन में छिपा कोई अंतरद्वंद्व या कोई हादसा शारीरिक पीड़ा से ज्यादा मानसिक पीड़ा देता है. ऐसे में किसी विश्वासपात्र के सामने खुल कर उस बात पर चर्चा करें. सलाह-मशविरा अक्सर ही बढ़ते बच्चों को अवसाद से निकालने में मददगार होती है.
जिस काम में खुशी मिलती है, आनंद मिलता है, वही काम व्यक्ति-विशेष के लिए ठीक है. अपनी शिक्षा, अपने आराम और अपनी जरूरत के अनुसार सभी काम का महत्व है. लेकिन, हमने सामाजिक दायरे में बांध कर कामों को छोटा या बड़ा कर दिया है. एक चपरासी भी अपने लेवल पर आत्मसंतुष्टि का अनुभव कर सकता है, जबकि एक डॉक्टर उससे ज्यादा कमा कर भी नाखुश रह सकता है.
आनंद मिलने से तात्पर्य यह नहीं है कि किसी को कोई अपराध करके आनंद मिलता हो, तो वह इसमें संलग्न रहे. यह तो मानसिक विकृति का उदाहरण है.
जिंदगी केवल परिवार चलाने का नाम नहीं है. खुद से प्यार करने का भी है. यह खुदगर्जी नहीं, बल्कि खुश रहने का एक जरिया है. जब हम अपने आप से प्यार करेंगे, तभी अपने बारे में जान पायेंगे. अपने बारे में ईमानदारी से खोज करना आसान भी नहीं है.
मां-बाप अपने बच्चों के लिए जिंदगी गुजार देते हैं और जब बच्चे बड़े होकर अपनी दुनिया में रम जाते हैं, तब उनमें इतना खालीपन भर जाता है कि वे बीमार पड़ जाते हैं. खुद से परिचित व्यक्ति इसी समय अपनी पसंद और शौक पूरे करके जिंदादिल रह सकता है. उम्र की जिस अवस्था को लोग जीवन की शाम कहते हैं, ऊर्जावान व्यक्ति उसी शाम में अपने कर्मों का सूर्य उगा कर दूसरों के लिए मिसाल बन जाता है.
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