आतंकवाद रोकने की बड़ी पहल है यह निर्णय
Updated at : 06 Aug 2019 6:57 AM (IST)
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महाराज कृष्ण संतोषी लेखक delhi@prabhatkhabar.in धारा 370 की पहली बात तो ये थी कि कोई कश्मीरी लड़की अगर बाहर के लड़के से शादी कर ले तो उसके कई अधिकार समाप्त हो जाते थे. उसको संपत्ति का अधिकार नहीं मिलता था. उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते थे. एक तरीके से उसका जम्मू-कश्मीर के साथ संपर्क […]
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महाराज कृष्ण संतोषी
लेखक
delhi@prabhatkhabar.in
धारा 370 की पहली बात तो ये थी कि कोई कश्मीरी लड़की अगर बाहर के लड़के से शादी कर ले तो उसके कई अधिकार समाप्त हो जाते थे. उसको संपत्ति का अधिकार नहीं मिलता था. उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते थे. एक तरीके से उसका जम्मू-कश्मीर के साथ संपर्क ही टूट जाता था. इतना ही नहीं, धारा 370 लागू होने की वजह से एक विधान, एक निशान, एक प्रधान का कॉन्सेप्ट भी लागू नहीं हो पा रहा था. जम्मू-कश्मीर का अपना अलग संविधान है, सारी धारायें अलग हैं.
तो इस वजह से जम्मू-कश्मीर और भारत के बीच का जो एक रिश्ता था, उसमें अवरोध पैदा हो रहा था. इस स्थिति का फायदा अलगाववादी तत्व उठा रहे थे. धारा 370 की आड़ में इस तरह की फायदा उठानेवाली अनेक गतिविधियों चलती रहीं, इसीलिए यह लगने लगा था कि इस धारा का इस्तेमाल एक समय पर जितने अच्छे ढंग से किया गया था, उस तरीके से आज शायद उसका इस्तेमाल नहीं हो रहा है. लग रहा था, जैसे इसका ज्यादा फायदा आतंकवाद के लिए उठाया जा रहा है. तो मेरी नजर में सरकार के सामने ये सारे तथ्य भी रहे होंगे, इसलिए उन्होंने यह कदम उठाया है. तो आतंकवाद जैसी चीजों को वहां कैसे रोका जाये, इसकी पहल तो उन्होंने की है.
अब रही बात इस कदम के प्रतिक्रिया की, तो कश्मीर और जम्मू की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग होंगी. जम्मू में इसका वो विरोध नहीं होगा, जो कश्मीर में होगा. तो इससे यह भी पता लग जाता है कि जम्मू, कश्मीर, लद्दाख एक राज्य तो हैं, लेकिन तीनों के अलग-अलग विचार हैं.
जम्मू व लद्दाख विचार में जहां काफी साम्य रखते हैं, वहीं कश्मीर का विचार इन दोनों से अलग होता है. हालांकि, अभी तक कश्मीर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है, क्योंकि अभी वहां पर सब कुछ बंद है. दूसरी बात ये कि जो भारतीय तत्व वहां हैं, उनमें वो हौसला नहीं आ सकता के वि इस संबंध में अपना पक्ष रख सकें, क्योंकि कश्मीर में भारत-विरोधी भावना रखनेवालों की आबादी काफी है. ऐसे में जिनके मन में भारत के समर्थन की भावना है भी, वो उसे खुलकर व्यक्त नहीं कर सकते हैं.
सरकार ने लद्दाख को केंद्र शासित बना दिया है, लेकिन वहां विधानसभा नहीं होगी, जबकि जम्मू-कश्मीर के लिए विधानसभा का भी प्रावधान है.
आपको लगता होगा कि लद्दाख जम्मू-कश्मीर से एक तरीके से अलग हो गया है. पहले जम्मू, कश्मीर व लद्दाख मिलाकर एक राज्य बनता था, लेकिन लद्दाख का नाम कभी नहीं लिया जाता था. उसे जम्मू-कश्मीर ही कहा जाता था, लद्दाख ताे वैसे भी वहां छूट गया था.
वर्ष 1990-91 के दौरान लद्दाख में एक मूवमेंट शुरू हुआ था, तो उस दौरान वहां कश्मीरी विरोधी भावना लोगों के मन में आ गयी थी. यह एक नयी चीज थी. उस दौरान लद्दाख के लोग चाहते थे कि कश्मीर का जो उन पर नियंत्रण है वो ना हो. असल में लद्दाख के लोग शुरू से ये चाहते रहे कि उनका केंद्र के साथ सीधा संबंध रहे और वे कश्मीर के अंतर्गत न रहें. लद्दाख में मैं दो साल रहा हूं तो इस बात को जानता हूं. अब यहां दूसरा मसला है.
मतलब कि वो अपने लिए विधानसभा चाहते हैं या नहीं. चाहते हैं तो क्या वे विधानसभा की मांग करेंगे. लेकिन हम यह तो कह ही सकते हैं कि उनका आधा मसला तो पूरा हो ही गया है कि वे अब विशेष श्रेणी में आ गये हैं. तो अब उनके विकास व कल्याण कार्यक्रमों पर ज्यादा तवज्जो दी जायेगी. कश्मीर के साथ उनका कोई संपर्क नहीं रह जायेगा, तो फंड का बंटवारा भी नहीं होगा, फंड सीधे उनके पास आ जायेगा.
कश्मीरी पंडितों की वापसी एक ऐसा मुद्दा है जो सरकारें तो खैर तय करती ही हैं, लेकिन देखा जाये तो हमारा वापस जाना वहां के बहुसंख्यकों पर ज्यादा निर्भर करता है.
कश्मीरी पंडितों की वापसी होने पर भी आज के हालात में उन्हें वहां बहुसंख्यकों के हिसाब से ही रहना है. अगर ऐसा नहीं होता है और आप वहां सरकारी बलबूते पर जायेंगे तो फिर सेना के संरक्षण में रहेंगे या अकुपायड प्लेस में रहेंगे. लेकिन, अभी हम इस बारे में कुछ भी नहीं कह पायेंगे और इस संबंध में अभी हमें कुछ कहना भी नहीं है.
क्योंकि, कश्मीरी पंडितों के अंदर खुद भी इस बात को लेकर मंथन चल रहा है कि अगर हम जायेंगे, तो किस तरह से हमें वहां जाना चाहिए. इस मुद्दे पर भीतरी तौर पर बातचीत भी हो रही है. लेकिन हां, यह कहा जा सकता है कि सरकार के एजेंडे में यह बात भी है. जम्मू व कश्मीर को लेकर जो एक मूवमेंट चली है, उसमें वो चाहती है कि जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा हमें भी बसने के लिए दिया जाये. अगर ऐसा होता है, तो फिर हम चाहेंगे कि वहां जायें.
अंत में, हम तो चाहेंगे कि हम जम्मू-कश्मीर में ही रहें, और आशा भी है कि वहां सब कुछ ठीक-ठाक रहे. वैसे भी जो चीजें बिगड़ती हैं, वह तो सुलह से ठीक हो ही जाती हैं. हम चाहते हैं कि इस वक्त जम्मू-कश्मीर के जो हालात हैं, वहां जो हिंसा है, उसका वाजिब तरीके से हल निकाला जाये.
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