अभ्यास बड़ा स्कूल है

Updated at : 12 Jul 2019 6:16 AM (IST)
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अभ्यास बड़ा स्कूल है

संतोष उत्सुक वरिष्ठ व्यंग्यकार santoshutsuk@gmail.com प्रशासन और राजनेता पक्के खिलाड़ी न हों, तो यही होता है. आजकल ऐसा होना बिल्कुल नहीं मांगता. ऐसा होता है, तो छोटे-छोटे मुंह भी बड़ी-बड़ी हांकने लग जाते हैं. जरा-सी ‘लापरवाही’ के कारण, पूरी जिंदगी लगा कर कमायी ‘इज्जत’ बिना रन बनाये आउट हो जानेवाले कप्तान की तरह हो जाती […]

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संतोष उत्सुक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
santoshutsuk@gmail.com
प्रशासन और राजनेता पक्के खिलाड़ी न हों, तो यही होता है. आजकल ऐसा होना बिल्कुल नहीं मांगता. ऐसा होता है, तो छोटे-छोटे मुंह भी बड़ी-बड़ी हांकने लग जाते हैं. जरा-सी ‘लापरवाही’ के कारण, पूरी जिंदगी लगा कर कमायी ‘इज्जत’ बिना रन बनाये आउट हो जानेवाले कप्तान की तरह हो जाती है.
समझदार पिताओं की कही सही बातें कभी पुरानी नहीं होती, उन्होंने सही फरमाया कि प्रशासन और नये राजनेता कच्चे खिलाड़ी निकले, नहीं तो बिना बल्ला घुमाये ही अच्छा स्कोर जड़ देते. खरी सलाह भी दी उन्होंने कि अफसरों को नेताओं के फोन उठाने चाहिए. नेता बिल्कुल आम लोग नहीं होते. यह बहुत प्रशंसनीय बात है कि उन्होंने कितनी ऊंची कुर्सी पर विराज कर आसमान छूने जैसी ऊंची बात कह कर सबका दिल लूट लिया कि किसी को भी अहंकार नहीं करना चाहिए.
आशंका नहीं संभावना है कि उन्होंने यह बात सभी के लिए कही होगी. उन्होंने यह भी बहुत व्यावहारिक और जायज कहा कि जर्जर मकानों को मॉनसून में नहीं तोड़ना चाहिए. वैसे भी माॅनसून मुश्किल से देर से आता है.
किसी भी जर्जर मकान को गर्मी में तोड़ा जाना चाहिए, ताकि उसमें रहनेवाले, रातें कहीं भी लेट कर निकाल लें. उनके दिन तो मकान टूटने के बाद मुआवजा लेने में छुटभैये नेताओं और बाबुओं के चक्कर काटते निकल ही जायेंगे. विशाल राष्ट्रीय व्यक्तित्व ने और जो कहा, वह भी तारीफ के लायक है. बड़े लोगों की अच्छी बातें कभी पुरानी नहीं होती, हमेशा उपयोगी होती हैं. उन्होंने समझाया कि वर्तमान शासक को पूर्व शासक से दिशा-निर्देश जरूर लेने चाहिए, चाहे वह विरोधी पार्टी का ही हो. किसी को भी राजनीतिक द्वेष के कारण तंग नहीं किया जाना चाहिए.
उन्होंने अपनी तरफ से राज खोल दिया कि उनकी पार्टी की सरकार के दौरान पक्ष और विपक्ष के बीच हमेशा सौजन्य रहा है. एक-दूसरे के काम आना वाकई अच्छी बात है. कई बार अमानवता के आधार पर हम दूसरों के, ‘तमाम काम’ या ‘काम तमाम’ करवा देते हैं, तो मानवता और नैतिक आधार पर काम करवाना तो श्रेष्ठ व्यवहार है. वे बोले कि सभी दलों के जन प्रतिनिधियों के सम्मान का ख्याल रखा जाना चाहिए.
किसी भी किस्म के विवाद न हों, इस बारे में नेताओं व अफसरों को चिंता करनी चाहिए यानी एक-दूसरे का बेहतर ख्याल रखना चाहिए. सही भी है, प्रशासन मिल-जुल कर चलाना चाहिए. खेलना हो तो पक्के खिलाड़ियों की तरह ही खेलना मांगता. पापा लोग अनुशासित, संयमी, अनुभवी, यशस्वी होने के कारण किसी भी स्थिति को सही और परिपक्व शैली में निबटाने के काबिल होते हैं.
पापाओं को ‘होनहार वीरवान के होत चिकने पात’ स्कीम के अंतर्गत घर पर अनाड़ियों को अभ्यास करवाते रहना चाहिए, ताकि वे दक्ष खिलाड़ी बनें. किसी को गाली देनी हो, तो ऐसे मानो कि फूल फेंक दिया हो. जान लेनेवाले को पता रहना चाहिए कि जान किस सलीके से लेनी है. अभ्यास बड़ा स्कूल है, जिसमें से पढ़ते-सीखते जड़मति भी पक्के खिलाड़ी निकलते हैं.
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