पहाड़ों पर बिजली का कहर

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।। अर्थशास्त्री बादल फटने से गिरे पानी को वहन करने की क्षमता पहाड़ों एवं नदियों में प्राकृतिक तौर पर होती है. लेकिन वर्तमान में इस नैसर्गिक क्षमता का ह्रास हाइड्रोपावर कंपनियों के कारण हुआ है. अतएव, इन्हें उत्तराखंड में कहर बरपारने का दोषी मानना चाहिए. उत्तराखंड आपदा के एक वर्ष के […]
।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।
अर्थशास्त्री
बादल फटने से गिरे पानी को वहन करने की क्षमता पहाड़ों एवं नदियों में प्राकृतिक तौर पर होती है. लेकिन वर्तमान में इस नैसर्गिक क्षमता का ह्रास हाइड्रोपावर कंपनियों के कारण हुआ है. अतएव, इन्हें उत्तराखंड में कहर बरपारने का दोषी मानना चाहिए.
उत्तराखंड आपदा के एक वर्ष के बाद भी परिस्थिति सामान्य नहीं हुई है. इस वर्ष भी उत्तरकाशी में भागीरथी का जलस्तर काफी ऊपर बह रहा है. चारधाम यात्रा को बार-बार स्थगित किया जा रहा है. गत वर्ष की तरह इस वर्ष भारी वर्षा नहीं हुई है, परंतु पहाड़ खुश नही हैं. पहाड़ों का धसकना जारी है, क्योंकि जलविद्युत परियोजनाओ ने पहाड़ पर अनेक प्रकार से चोट की है. पहाड़ नाराज हो गया है. सच तो यह है कि पिछले वर्ष की आपदा भी अतिवर्षा के कारण नहीं आयी थी.
इंडिया मेटरोलॉजिकल डिपार्टमेंट (भारत मौसम विज्ञान विभाग) के अनुसार गत 17 जून को वर्षा इस प्रकार हुई थी : टिहरी 179 मिलीमीटर, जोशीमठ 114, जखोली 108, रुद्रप्रयाग 92 तथा चमोली 76 मिलीमीटर. इसी दिन उत्तराखंड के अन्य क्षेत्रों में इससे बहुत ज्यादा वर्षा हुई थी जैसे मुक्तेश्वर में 237 मिलीमीटर, बंबासा 230 तथा चंपावत 222 मिलीमीटर. लेकिन इन स्थानों पर आपदा नहीं आयी. इससे प्रमाणित होता है कि आपदा का कारण वर्षा नहीं था. केदारनाथ के ऊपर चोराबारी तालाब के टूटने से भारी मात्र में मलबा केदारनाथ की ओर बहा था.
इस तालाब में पानी की गहराई 10 मीटर से कम थी. इस छोटे से तालाब के टूटने से बहे पानी को भी कहर का कारण नहीं कहा जा सकता है. कहर का कारण पहाड़ियों से भारी मात्र में पत्थर, मिट्टी और पेड़ों का मंदाकिनी नदी में बहना था. प्रश्न यह है कि कम वर्षा में अधिक मलबा क्यों बहा? दरअसल, उस क्षेत्र में सड़क और हाइड्रोपावर परियोजनाओं को बनाने में भारी मात्र में विस्फोटकों का प्रयोग किया गया था. फलस्वरूप पहाड़ों की मिट्टी दरक गयी और पेड़ों की जड़ें हिल गयीं. पहले पेड़ और मिट्टी पानी के वेग को कम करते थे. अब पानी के साथ बह कर उन्होंने पानी के वेग को बढ़ा दिया, जिससे आपदा आयी.
मलबे और पेड़ों को लेकर मंदाकिनी आगे बढ़ी. उसके सामने सीतापुर के पास फाटा-ब्यूंग हाइड्रोपावर परियोजना का बराज खड़ा था. बराज के गेट पर बड़े-बड़े पत्थर और पेड़ अटक गये. बराज के पीछे तालाब बन गया, जिसमें सीतापुर में मंदाकिनी पर बना पुल टूट गया. केदारनाथ से बच कर आ रहे यात्री मंदाकिनी पार करके सीतापुर की सुरक्षा में नहीं पहुंच पाये और काल कलवित हो गये. फाटा-ब्यूंग से पानी आगे बढ़ा तो सिंगोली-भटवाड़ी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट ने रास्ता रोक लिया. यहां भी बराज के गेट जाम हो गये.
पानी से भरपूर मंदाकिनी ने बराज के एक किनारे पर पहाड़ काट कर रास्ता बना लिया. अब नदी क्रमश: दाहिने और बायें किनारों से टकराती हुई बही, जैसे सांप चलता है. नदी की इस लहर ने दोनों किनारों पर बसे गांवों को अपनी चपेट में ले लिया और वे सब उजड़ गये. हाइड्रोपावर कंपनी ने टनल से निकले मलबे को नदी के किनारे डंप कर रखा था. इस मलबे ने आग में घी का काम किया. मंदाकिनी का पानी ज्यादा भारी हो गया.
पहले विस्फोटकों का प्रयोग करके पहाड़ को कमजोर किया गया. हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के अवरोधों के कारण नदी मलबे को बहा कर आगे नहीं ले जा सकी. नदी सांप की तरह बहने लगी और किनारे पर बसे गांवों को तहस-नहस किया. इसके बाद श्रीनगर प्रोजेक्ट ने एकाएक पानी छोड़ कर मलबे को बहाया और वह मलबा तमाम घरों और हाइवे पर जम गया. इस प्रकार के हाड्रोपावर प्रोजेक्ट नदी की राह में न होते, तो उस सामान्य वर्षा को पहाड़ बर्दाश्त कर लेते और यह नौबत न आती.
आपदा के दौरान उस विस्तृत क्षेत्र में वर्षा सामान्य थी. परंतु विशेषकर केदार घाटी में भारी वर्षा होने के संकेत मिलते हैं. इस स्थानीय भारी वर्षा में टिहरी बांध का विशेष योगदान दिखता है. बड़े बांधों से आसपास की जलवायु में परिवर्तन हो जाता है. टिहरी से कुछ दूर स्थित केदारनाथ की पहाड़ियों पर वर्षा में वृद्घि हुई दिखती है.
टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन का दावा है कि टिहरी बांध ने आपदा पर नियंत्रण किया है. भागीरथी का पानी टिहरी डैम में रोक लिया गया. टीएचडीसी के अनुसार 1924 की बाढ़ में अब तक का अधिकतम 18,700 क्यूमेक पानी हरिद्वार पहुंचा था. टिहरी न होता तो 21,500 क्यूमेक पानी हरिद्वार पहुंचता और हरिद्वार को बहा देता. लेकिन टिहरी बांध न होता तो 21,500 क्यूमेक पानी भी नहीं पहुंचता. पहले टीएचडीसी ने वाष्पीकरण बढ़ा कर बाढ़ को न्येाता दिया और अब उस बाढ़ के कुछ पानी को रोक लेने का श्रेय लेने को उद्यत है.
इस तरह से अगर सीधे तौर पर देखा जाये, तो उत्तराखंड त्रसदी बादल फटने के कारण आयी. परंतु यह सामान्य सी घटना है. बादल फटने से गिरे पानी को वहन करने की क्षमता पहाड़ों एवं नदियों में प्राकृतिक तौर पर होती है. लेकिन वर्तमान में इन पहाड़ों और नदियों की इस नैसर्गिक क्षमता का ह्रास हाइड्रोपावर कंपनियों के कारण हुआ है. अतएव, इन्हें उत्तराखंड में कहर बरपारने का दोषी मानना चाहिए.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए




