जी-20 में भारत की कूटनीति

Updated at : 02 Jul 2019 7:10 AM (IST)
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जी-20 में भारत की कूटनीति

प्रो सतीश कुमार अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार singhsatis@gmail.com विश्व राजनीति की दिशा को तय करने के लिहाज से कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं बनीं और बिखर गयीं. कई बार संस्थाएं जिस उद्देश्य से बनायी गयीं, उस पर काम हुआ ही नहीं. जी-20 सम्मेलन भी उसी श्रेणी का हिस्सा है, जो अपने मूल मकसद से हट गया. हालांकि, […]

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प्रो सतीश कुमार

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

singhsatis@gmail.com

विश्व राजनीति की दिशा को तय करने के लिहाज से कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं बनीं और बिखर गयीं. कई बार संस्थाएं जिस उद्देश्य से बनायी गयीं, उस पर काम हुआ ही नहीं. जी-20 सम्मेलन भी उसी श्रेणी का हिस्सा है, जो अपने मूल मकसद से हट गया. हालांकि, भारत के नजरिये से यह सम्मेलन बहुत सार्थक रहा, क्योंकि इस सम्मेलन में दुनिया के वे तमाम देश शामिल थे, जिनके सहारे नयी विश्व व्यवस्था की रणनीति बनायी जा रही है.

भारत के प्रधानमंत्री ने न केवल जापान के साथ वार्ता को एक नयी दिशा दी, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मिलकर विश्व के मुख्य सवालों पर चर्चा की, जो भारत के राष्ट्रीय हित में खास भूमिका रखते हैं. भारत ने दो अलग-अलग और विपरीत खेमों के साथ अपने पक्ष को रखने की कोशिश की. ब्रिक्स देशों से भी बातचीत हुई. लेकिन, बहुपक्षीय सम्मेलन में केवल भारत के कहने या सोचने से बात नहीं बनेगी.

इसके लिए अन्य देशों की रजामंदी जरूरी है. आतंकवाद, 5जी, डाटा आदान-प्रदान और जलवायु परिवर्तन पर सभी देशों में आम सहमति की जरूरत है. अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाएं विवाद के घेरे में हैं. विकासशील देशों की मुश्किलें बढ़ती जा रही है. विश्व व्यापार केंद्र और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अमेरिकी दबाव में हैं. भारत ने इन सारे मुद्दों पर नये सिरे से विचार करने की बात पर जोर दिया है.

इस शिखर सम्मेलन में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु भारत के ‘शेरपा’ थे. उन्होंने बताया कि सऊदी अरब और इटली के बाद 2022 में भारत जी-20 की मेजबानी करेगा. इस सम्मेलन में हिस्सा लेनेवाले सभी देश वैश्विक अर्थव्यवस्था का 85 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं.

भारत चाहता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की सेहत अच्छी रहे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि ‘नये भारत’ में दोनों देशों के संबंध और मजबूत होंगे. कोबे में भारतीय समुदाय से मोदी ने कहा- ‘जब भारत का दुनिया के साथ संबंध की बात आती है, तो जापान का इसमें एक खास स्थान है. यह संबंध शताब्दियों पुरानी है.

इसमें एक-दूसरे की संस्कृति और सभ्यता के प्रति सम्मान है.’ भारत अगले पांच वर्ष में पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखता है. इस लिहाज से दोनों देशों के संबंध और मजबूत होंगे. दुनिया आज भारत को संभावनाओं के ‘गेटवे’ के तौर पर देखती है.

भारत ने डिजिटल इकोनॉमी पर ओसाका घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया है. दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया समेत कई अन्य देशों ने भी इससे दूरी बनायी है. डिजिटल इकोनॉमी से वैश्विक अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है और लोगों को भी फायदा होता है.

लेकिन, भारत में इसे लेकर नीति-नियंताओं की राय अलग है. भारतीय रिजर्व बैंक इसके खिलाफ है. भारतीय रिजर्व बैंक का कहना है कि भुगतान से संबंधित सभी डेटा केवल स्थित सिस्टम में स्टोर किया जाना चाहिए. डेटा को प्रोसेसिंग के बाद ही भारत में स्टोर किया जाये.

यही नहीं, लेन-देन का पूरा ब्योरा डेटा का हिस्सा होना चाहिए. इसके पीछे नीति-नियंताओं की दलील है कि ऐसा होने से विदेशी धरती से इसके दुरुपयोग की आशंका कम की जा सकेगी. भारतीय रिजर्व बैंक के साथ वाणिज्य मंत्रालय के मसौदे से साफ है कि फेसबुक, गूगल और अमेजन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीयों के संदेशों और खरीदारी से संबंधित डाटा को भारत में ही संग्रहित करना होगा. गौरतलब है कि डाटा की सुरक्षा को लेकर चिंतित होनेवालों में चीन भी शामिल है.

संभवतः शीत युद्ध के बाद पहली बार दुनिया दो अलग ढांचे में बंटी हुई दिखायी दी- चीन का राज्य केंद्रित ढांचा और अमेरिका का मुक्त व्यापार सोच. संघर्ष आर्थिक लाभ से लेकर सामरिक बिसात तक की है.

ऑस्ट्रेलिया, जापान और कई देश अमेरिका के साथ खड़े हैं, तो कई देश चीन के साथ हैं. भारत ने सोच-समझकर चाल चली है. एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ भारत ने शिकायत और परेशानी को साझा किया, वही इस बात की पुष्टि भी की कि भारत ने अमेरिकी पहल को मानते हुए ईरान से अपने तेल आयात को कम कर दिया है. भारत का 11 प्रतिशत तेल ईरान से आता है.

साथ ही भारत ने अमेरिका के साथ मिलकर अपने इंडो-पैसिफिक समीकरण को मजबूत बनाने की बात भी अमेरिका से की. भारत ने ब्रिक्स देशों को भी विश्वास में लिया है. चीन के साथ आर्थिक व्यापार को और आगे बढ़ाने की सहमति बनी है.

जी-20 का सम्मेलन केवल अपने एजेंडे तक सीमित नहीं था. बात एक नयी दुनिया बनाने की है, जिसमें द्वंद्व चीन और अमेरिका के बीच है.

सबकी निगाहें भी इसी मुद्दे पर थीं. अमेरिका ने चीन की बात मानते हुए टैरिफ में कटौती स्वीकार ली है. लेकिन, यह उपाय मरहम-पट्टी से ज्यादा कुछ नहीं है. द्वंद्व तो दादागिरी की है कि विश्व व्यवस्था की कुंजी किसके हाथों में होगी. क्या वैश्विक आर्थिक संगठन अमेरिकी दलीलों से हटकर चीन के इशारे पर चलेंगे या अमेरिकी हठधर्मिता बनी रहेगी?

विश्व राजनीति के पंडित जानते हैं कि जिसके चंगुल में आर्थिक ढांचा होगा, वही दुनिया का पुरोहित होगा. जिस वैश्विक अर्थव्यवस्था में अामूल-चूल परिवर्तन की बात भारत करता है, चीन भी उसी की बात करता है. दूसरी तरफ 5जी और ओबीओआर को लेकर अमेरिका की सोच भारत से मिलती है. इसलिए ओसाका सम्मेलन भारत के राष्ट्रीय हित को मजबूत बनाने का एक महत्वपूर्ण आयाम साबित होगा.

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