विदेश नीति का वैचारिक पहलू

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 21 Jun 2019 2:57 AM

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तरुण विजयवरिष्ठ नेता, भाजपाtarunvijay55555@gmail.com गत सप्ताह चीन में विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा अकादमियों में मुझे तीन व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया था, जिनका मुख्य विषय दोनों देशों के मध्य गतिशील सांस्कृतिक संबंधों पर केंद्रित था. भारत-चीन संबंध महाभारतकालीन हैं, यह तो प्रमाणित है. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी चीन के रेशम का जिक्र है. […]

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तरुण विजय
वरिष्ठ नेता, भाजपा
tarunvijay55555@gmail.com

गत सप्ताह चीन में विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा अकादमियों में मुझे तीन व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया था, जिनका मुख्य विषय दोनों देशों के मध्य गतिशील सांस्कृतिक संबंधों पर केंद्रित था. भारत-चीन संबंध महाभारतकालीन हैं, यह तो प्रमाणित है. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी चीन के रेशम का जिक्र है. हजार साल पहले चीन के राजगुरु के नाते भारत के बौद्ध भिक्षु कुमारजीव (चीनी भाषा में चोमोलिशु) प्रतिष्ठित किये गये थे.
हर भारतीय दिन में अनेक बार जिस दानेदार शक्कर का इस्तेमाल करता है, वह चीन से ही आयी थी, इसलिए उसे हम चीनी कहते हैं. साल 1962 का अपवाद छोड़ दें, भारत-चीन आध्यात्मिक संबंध हमेशा अच्छे ही रहे हैं. लेकिन, क्या वर्तमान भारत-चीन संबंध उस वैचारिक और सांस्कृतिक विरासत के परिदृश्य में देखे जा सकते हैं?
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हमारे द्विपक्षीय संबंध बराबरी और भारत हित सुरक्षित करने हुए दृढ़ता के आधार पर नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं. गत वर्ष वुहान में अनौपचारिक शिखर वार्ता को दोनों देशों के मध्य एक मील का पत्थर माना जाता है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पहले चीनी राष्ट्रपति हैं, जो किसी विशेष विदेशी मेहमान की अगवानी के लिए राजधानी बीजिंग से बाहर किसी नगर में पहुंचे और गर्मजोशी के साथ नरेंद्र मोदी की मेहमाननवाजी की.
चीन को भारत की बात माननी पड़ी तथा संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने में भारत को सफलता मिली. अन्य विषय भी हैं, जो असहमति के बिंदु हैं, जैसे भारत-चीन व्यापार में भयानक असंतुलन है. सत्तर प्रतिशत से अधिक व्यापार चीन के पक्ष में है. भारत की दवाएं अब भी बड़ी मात्रा में चीन के बाजार में प्रवेश नहीं कर पा रही हैं.
भारत को पेंसिलिन दवाओं तथा इंजेक्शनों की आपूर्ति करनेवाला चीन सबसे बड़ा देश बना, जो इन दवाओं के निर्माण के मूल तत्व भेजता है और जो कारखाने भारत में इनका निर्माण कर रहे थे, वे चीन की अतिशय आपूर्ति के दबाव में बंद हो चुके हैं. इस्पात के क्षेत्र में भी चीन भारत से कच्चा माल यानी लौह अयस्क भारती मात्रा में ले रहा है और उसका भारत के स्टील निर्माण पर खराब असर पड़ा है.
दिल्ली की खिलौना दुकानें तथा खिलौना निर्माता या तो सिर्फ चीन का सामान बेच रहे हैं या उनके यहां ताले लग गये हैं. पंचकुइयां रोड और कीर्ति नगर की लक्कड़ मंडियां कभी भारतीय कारीगरों, भारतीय लकड़ी और उनसे निर्मित सामान का देश का बड़ा बाजार हुआ करती थीं, आज वह सब बंद हो चुका है और जो पहले निर्माण के केंद्र हुआ करते थे, वहां अब सिर्फ चीन से आयातित लकड़ी के फर्नीचर तथा अन्य सजावटी सामानों का व्यापार होता है.
भारत की वर्तमान सरकार यह स्थिति बदलने के लिए पूरी गंभीरता से काम कर रही है. चीन में ऐसे साम्यवाद का शासन है, जिसके लिए देशभक्ति तथा ‘चीन प्रथम’ की नीति सर्वोपरि है. भारत के साम्यवादी देशभक्ति को पाप और अपराध मानते हैं तथा उनके लिए विदेश निष्ठा ही राजनीतिक मजहब है. चीन में देशभक्ति बहुत पवित्र और सरकार की आधारभूत निष्ठा का प्रतीक है.
वे चीन के प्राचीन सम्राटों एवं बौद्ध संतों का सम्मान के साथ अपने साहित्य में उल्लेख करते हैं. भारत से गये बौद्ध भिक्षु जैसे कुमारजीव, समंतभद्र, मातंग और कश्यप वहां के ऐतिहासिक महापुरुष माने जाते हैं. चीन बौद्ध मत के संरक्षण और प्रसार के लिए विशेष रुचि दिखा रहा है तथा वहां के सभी बौद्ध मठों में एक पुस्तकालय और शाकाहारी भोजनालय होता ही है.
अब चीन में भारत को नेहरूवादी और वामपंथी चश्मे से देखने के बजाय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा के दर्पण में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है. वहां संघ पर सकारात्मक दृष्टि से एक पुस्तक प्रकाशित करने की भी योजना बन रही है.
मुझे कुनमिंग की युन्नान सोशल साइंस अकादमी और सिचुआन विवि में छात्रों व अध्यापकों के समक्ष भारत-चीन सांस्कृतिक संबंधों पर बोलने का अवसर मिला. कुनमिंग में बीसीआइएम अर्थात बांग्लादेश, चीन, भारत और म्यांमार के मध्य गठबंधन और उसके द्वारा आपसी संपर्क मार्गों और अन्य संबंधों को छूना था, जबकि सिचुआन में विचारधारा का विषय था.
वहां के वैचारिक नेताओं में यह जानने की उत्कंठा थी कि मोदी की सफलता के पीछे किस विचारधारा का प्रभाव है. आश्चर्य है कि अब तक चीन के पुस्तकालयों में बड़ी मात्रा में पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी एवं संघ का साहित्य पहुंचना चाहिए था, लेकिन कम ही दिखता है. इसका कारण चीन के वैचारिक क्षेत्र में नेहरूवादी और वामपंथी प्रभाव का प्राबल्य ही कहा जा सकता है.
नये भारत में जिन विचारधाराओं का योगदान है, चीन उसे समझे बिना भारत को समझ नहीं सकता. पूंजीवाद और साम्यवाद के सामने एकात्म मानववाद का दर्शन नये भारत की सत्ता नीति का आधारभूत हिस्सा है. पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय को सर्वोच्च वरीयता दी थी और सामाजिक समता और समरसता एकात्म मानव दर्शन का आधार है.
चीन के लिए यह समझना जरूरी है कि भारत पूंजीवाद और साम्यवाद को अस्वीकार करनेवाली विचारधारा पर चल रहा है, जिसे एकात्म मानव दर्शन कहते हैं. इसके लिए हिंदू जीवन पद्धति या हिंदुत्व सम्मान और गौरव का विषय है. चीन के विद्वानों ने दीनदयाल जी और डॉ मुखर्जी का साहित्य अपने पुस्तकालयों में लाने का आश्वासन दिया.
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