बिश्केक में कूटनीति

Updated at : 14 Jun 2019 7:01 AM (IST)
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बिश्केक में कूटनीति

क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति व आर्थिकी में उथल-पुथल के वर्तमान माहौल में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन की शिखर बैठक बहुत महत्वपूर्ण है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां एक ओर अधिक आत्मविश्वास के साथ क्षेत्रीय सहयोग एवं विकास पर अपनी दृष्टि को अभिव्यक्त करेंगे, वहीं उन्हें चीन और रूस तथा अमेरिका के […]

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क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति व आर्थिकी में उथल-पुथल के वर्तमान माहौल में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन की शिखर बैठक बहुत महत्वपूर्ण है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां एक ओर अधिक आत्मविश्वास के साथ क्षेत्रीय सहयोग एवं विकास पर अपनी दृष्टि को अभिव्यक्त करेंगे, वहीं उन्हें चीन और रूस तथा अमेरिका के प्रति भारत के संतुलित रुख को इंगित करने की चुनौती भी होगी. रूस और चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर करने के अलावा मध्य एशियाई देशों के साथ मिल कर क्षेत्रीय विकास को सुनिश्चित करने की दिशा में इस मंच के विशेष महत्व को प्रधानमंत्री रेखांकित कर चुके हैं.
ऐसी संभावना है कि अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध तथा अमेरिका संरक्षणवादी नीतियों के संदर्भ में रूस एवं मध्य एशियाई देश इस सम्मेलन में चीन के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करेंगे. भारत भी व्यापार युद्ध को लेकर चिंतित है तथा प्रधानमंत्री समेत सरकार से जुड़े अहम लोगों ने अक्सर अंतरराष्ट्रीय व्यापार-वाणिज्य के नियमों पर आधारित संचालन की पक्षधरता की है.
अमेरिका ने आयात-निर्यात शुल्कों को लेकर भारत पर भी दबाव बढ़ाया है, परंतु ऐसी आशा बहुत कम है कि भारत इस प्रकरण में सीधे तौर पर चीन के साथ खड़ा होगा, क्योंकि अमेरिका से द्विपक्षीय संबंधों को लेकर भारत को भरोसा है कि उसे एक कारक के रूप में चीन की आवश्यकता नहीं है तथा वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप दोनों देशों के साथ सहभागिता निभा सकता है.
इसी भरोसे का परिणाम है कि इस महीने भारत के दौरे पर आ रहे अमेरिकी विदेश सचिव माइक पॉम्पियो ने परस्पर संबंधों को नयी ऊंचाई देने के लिए ‘बड़े विचारों एवं बड़े अवसरों’ को चिह्नित किया है. शुल्कों पर रार के समाधान की आवश्यकता के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र एवं सामरिक आदान-प्रदान में दोनों देशों के बीच सहकार की संभावनाओं ने भी भारत और अमेरिका की निकटता बढ़ाने में योगदान दिया है.
प्रधानमंत्री की छवि तथा चीन और अमेरिका के साथ भारत के कूटनीतिक और आर्थिक सहयोग को बढ़ाने में राजनयिक के रूप में उल्लेखनीय भूमिका निभा चुके एस जयशंकर के लिए द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित किये बिना अमेरिका और चीन के साथ संतुलन बनाना मुश्किल नहीं होगा. भारत के लिए एक चुनौती यह भी है कि उसके क्षेत्रीय लक्ष्यों और मध्य एशियाई देशों की आकांक्षाओं के साथ तालमेल कैसे बैठाया जाए? सम्मेलन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी भाग ले रहे हैं.
भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई नहीं करता है, किसी द्विपक्षीय संवाद की गुंजाइश नहीं है. इसके बावजूद देश-दुनिया के पर्यवेक्षकों की निगाहें दोनों नेताओं पर जमी रहेंगी. आतंकवाद पर अंकुश के मुद्दे पर प्रस्तावित रणनीति का दबाव पाकिस्तान पर होगा. बहरहाल, बिश्केक सम्मेलन क्षेत्रीय सहयोग की यात्रा में एक अहम मील का पत्थर साबित हो सकता है.
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