प्लास्टिक का कहर
Updated at : 11 Jun 2019 6:37 AM (IST)
विज्ञापन

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आकलन के मुताबिक, साल 2017-18 में भारत में 6.6 लाख टन से अधिक प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ था. लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है. देश के 35 क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में से सिर्फ 14 ने ही ऐसे कचरे के बारे में जानकारी दी थी. वर्ष 2016-17 में केवल 25 […]
विज्ञापन
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आकलन के मुताबिक, साल 2017-18 में भारत में 6.6 लाख टन से अधिक प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ था. लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है. देश के 35 क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में से सिर्फ 14 ने ही ऐसे कचरे के बारे में जानकारी दी थी. वर्ष 2016-17 में केवल 25 बोर्डों ने केंद्रीय बोर्ड को जानकारी दी थी. विवश होकर बोर्ड को राष्ट्रीय हरित ट्रिब्यूनल की शरण लेनी पड़ी थी.
ट्रिब्यूनल ने इस वर्ष 30 अप्रैल तक सभी क्षेत्रीय केंद्रों से जानकारी देने का निर्देश दिया था. परंतु, लापरवाही का आलम यह है कि आंध्र प्रदेश, सिक्किम, पश्चिम बंगाल और पुद्दुचेरी के अलावा किसी भी अन्य राज्य ने रिपोर्ट नहीं दिया है. अब इन 25 राज्यों को हर महीने एक करोड़ रुपये का अर्थदंड देना पड़ सकता है. जिस देश में 1.65 करोड़ टन प्लास्टिक की सालाना खपत होती हो, इसमें 43 फीसदी का इस्तेमाल सिर्फ एक बार होता हो, कुल उत्पादन का 80 फीसदी कचरे में फेंक दिया जाता हो तथा कचरे का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा जमा भी नहीं होता हो, वहां इस समस्या के प्रति अगंभीर प्रशासनिक रवैया बेहद चिंताजनक है.
प्लास्टिक कचरे के बारे में सही आंकड़ों को जुटाना बहुत जरूरी है, क्योंकि भारत ने एक बार इस्तेमाल होनेवाले प्लास्टिक पर धीरे-धीरे पाबंदी लगाने का संकल्प लिया है तथा प्लास्टिक कचरे के आयात पर भी रोक लगा दी है. जो कचरा जमा नहीं हो पाता है, वह आखिरकार समुद्र में और जमीन पर बिखर जाता है तथा मनुष्य समेत तमाम जीव-जंतुओं के लिए भारी नुकसान की वजह बनता है.
हम किसी भी शहर में टीले बनते कचरे के ढेर में प्लास्टिक की बहुतायत देख सकते हैं. महानगरों में तो कचरे के बड़े-बड़े पहाड़ बनने लगे हैं. गलियों, सड़कों, नालियों और नदियों में भी ऐसा कचरा पसरे देख सकते हैं. समुद्र में तो इतना प्लास्टिक जमा हो चुका है कि उसकी सफाई करना असंभव हो चुका है. भारी खर्च और श्रम के कारण समुद्री तटों को भी साफ नहीं रखा जा सकता है.
एक आकलन के मुताबिक, 2050 तक समुद्र में प्लास्टिक की मात्रा तमाम मछलियों के कुल वजन से ज्यादा हो जायेगी. ऐसे में यह दुर्भाग्य ही है कि न तो देश के स्तर पर और न ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से इस संकट से जूझने की कोई ठोस पहलकदमी हो रही है. हाल में इस मुद्दे पर हुए संयुक्त राष्ट्र की बैठक में कोई वैश्विक सहमति नहीं बन पायी. प्लास्टिक के नुकसान पर चर्चाओं और जागरूकता अभियानों के बावजूद हमारे देश में इसके उपभोग में कमी के संकेत नहीं हैं, बल्कि इसमें बढ़ोतरी ही हो रही है.
औद्योगिक रिपोर्टों के अनुसार, 2015 में इसका कुल उत्पादन 1.34 करोड़ टन हुआ था, जिसके 2020 में 2.20 करोड़ टन होने का अनुमान है. इसमें लगभग आधा एक बार इस्तेमाल होनेवाला प्लास्टिक होगा. आवश्यकता है कि पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों में प्लास्टिक पर नियंत्रण को प्राथमिकता दी जाये.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Tags
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन




