खाड़ी में युद्ध के मंडराते बादल
Updated at : 22 May 2019 3:29 AM (IST)
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पुष्पेश पंत अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार pushpeshpant@gmail.com पिछले कुछ महीनों से अमेरिका और ईरान के इस्लामी गणराज्य के संबंधों में तनाव निरंतर बढ़ता रहा है. इस बारे में दो राय नहीं हो सकती कि राजनयिक संकट को विस्फोटक रूप देने के लिए जिम्मेवार अमेरिका ही है. उसने ईरान के परमाण्विक कार्यक्रम पर रोक लगाने के […]
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पुष्पेश पंत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
pushpeshpant@gmail.com
पिछले कुछ महीनों से अमेरिका और ईरान के इस्लामी गणराज्य के संबंधों में तनाव निरंतर बढ़ता रहा है. इस बारे में दो राय नहीं हो सकती कि राजनयिक संकट को विस्फोटक रूप देने के लिए जिम्मेवार अमेरिका ही है. उसने ईरान के परमाण्विक कार्यक्रम पर रोक लगाने के लिए उसके विरुद्ध कड़े आर्थिक प्रतिबंध लागू किये और दूसरे राष्ट्रों को भी चेतानी दी कि जो कोई भी इन निषेधों का उल्लंघन कर ईरान के साथ व्यापारिक रिश्ते बरकरार रखेगा, उसे भी ऐसे ही प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा. जाहिर है कि ऐसा आचरण ईरान की संप्रभुता का खुलेआम तिरस्कार है, जिसकी कोई स्वीकृति अंतरराष्ट्रीय विधि में नहीं.
इस घड़ी अमेरिका ने अपना एक विमानवाहक पोत हॉर्मुज की खाड़ी में तैनाती कर दी है, जिसे ईरान की नाकाबंदी का एक और गैर-कानूनी प्रयास ही कहा जा सकता है. अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, नाविक नाकेबंदी (नेवल ब्लॉकेड) को युद्ध की कार्रवाई ही माना जाता है. क्यूबाई मिसाइल संकट के समय सोवियत संघ पर दबाव बनाने के लिए भी ऐसी ही कार्रवाई की गयी थी.
राष्ट्रपति ट्रंप निरंतर ईरान को भड़काने-उकसानेवाले बयान दे रहे हैं, जिनमें से नया यह है कि यदि ईरान ने युद्ध छेड़ने का दुस्साहस किया, तो सर्वशक्तिमान अमेरिका उसे नेस्तनाबूद कर देगा, उसका नामोनिशान बाकी नहीं रहेगा.
इसके जवाब में ईरान की विदेश मंत्री का बयान संयत नजर आता है. उन्होंने सिर्फ इतना कहा है- जाने कितने आक्रमणकारी आये और गये, साम्राज्यों का उत्थान-पतन हुआ, पर ईरान की हस्ती बरकरार है.
ईरान का कोई इरादा किसी पर हमला करने का नहीं है, पर यदि कोई ईरान के राष्ट्रहितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा, तो वह पूरी शक्ति से अपनी रक्षा करेगा. यह जाहिर है कि ईरान की मुद्रा आत्मरक्षात्मक है, आक्रामक नहीं. राष्ट्रपति ट्रंप जान-बूझ कर ऐसी हरकतें कर रहे हैं कि उन्हें यह कहने का मौका मिले की ईरान के किसी हमले के जवाब में ही उन्होंने अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए मजबूरन सैनिक कार्यवाही की है.
वास्तव में ईरान-अमेरिका की रस्साकशी मध्य एशिया की तेल की राजनीति से अभिन्न रूप से जुड़ी है और उसी में जोर-आजमाइश के उतार-चढ़ाव से प्रभावित होती रहती है.
इराक, सीरिया और लीबिया को तबाह करने के बाद वहां अमेरिका अपनी इच्छानुसार सत्ता परिवर्तन कराने में कामयाब रहा है. सऊदी अरब और अबू धाबी के तेल संसाधनों पर तो पहले से ही उसका आधिपत्य था. इस पूरे इलाके में एक ईरान ही है, जिसके तेल पर अमेरिका का कब्जा नहीं.
यह याद रखने लायक है कि 1945-46 में एंग्लो-अमेरिकन ऑयल कंपनी का ही प्रभुत्व ईरान पर था और वहां के देशप्रेमी प्रधानमंत्री मोसादिक का तख्तापलट अमेरिकी गुप्तचर संस्था सीआइए की साजिश से ही हुआ था और उसके बाद अमेरिका ने अपने मोहरे के रूप में रजाशाह पहलवी को इस्तेमाल किया.
अमेरिका की चिंता (सामरिक और आर्थिक) तब से बढ़नी शुरू हुई, जब से इस्लामी क्रांति के बाद रजाशाह अपदस्थ हो गये. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति कार्टर ने सैनिक हस्तक्षेप द्वारा अमेरिकी दूतावास में बंधक बनाये अमेरिकी राजनयिकों को छुड़ाने का असफल प्रयास किया और तभी से अमेरिका और ईरान के संबंध दुश्मनों जैसे हो गये हैं.
ईरान ने अपनी आत्मरक्षा के लिए एक परमाण्विक कार्यक्रम आरंभ किया और यही अमेरिका के गले ही हड्डी बन गया है. अमेरिका को लगता है कि यदि ईरान ने परमाण्विक अस्त्र बना लिये, तो वह भी उत्तरी कोरिया की तरह उसका भयादोहन करता रहेगा.
अमेरिका ने ईरान को निहत्था बनाने के लिए दोहरी रणनीति अपनायी है. एक ओर वह उसे आर्थिक व तकनीकी सहायता का प्रलोभन देता है, तो दूसरी ओर आर्थिक प्रतिबंध लगा कर उसके बाजू मरोड़ता है.
कुछ सामरिक विद्वानों का यह भी मानना है अमेरिका इस्राइली गुप्तचर संस्था मोसाद के माध्यम से ईरानी परमाण्विक वैज्ञानिकों की हत्या की साजिश में भी लिप्त रहा है. भले ही यह बात किसी अदालत में प्रमाणित न की जा सकी हो, पर अनेक ऐसी दुर्घटनाएं हुईं हैं, जिन्हें मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता.
अभी हाल में राजनयिक समर्थन के लिए ईरानी विदेश मंत्री ने भारत की यात्रा की थी, पर चूंकि पूरा देश लोकसभा चुनावों में व्यस्त था, तो उन्हें कोई आश्वासन नहीं मिल सका.
सिर्फ यह कहा गया कि ईरान से तेल की खरीद के मामले में नयी सरकार ही कोई फैसला करेगी. यहां यह उल्लेख जरूरी है कि अमेरिकी दबाव में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में और अन्यत्र कई ऐसे फैसले लिये हैं, जिन्होंने ईरान को निराश ही किया है.
लगता है कि अमेरिकी दबाव में भारत ईरान में ही नहीं, खाड़ी प्रदेश में भी अपने आर्थिक और सामरिक हितों को नजरअंदाज करने के लिए तैयार हो गया है. भारत से अधिक साहस तो अमेरिका के यूरोपीय संधिमित्रों ने ही दिखाया है, जिन्होंने युद्ध की धमकी से नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद से ही ईरान से विवाद निबटाने का प्रयास किया.
राष्ट्रपति ट्रंप आज उस सौभाग्यशाली स्थिति में हैं, जब अमेरिका को अपनी ऊर्जा सुरक्षा को निरापद रखने के लिए ईरान के तेल की दरकार नहीं. इतना ही नहीं, वह पूरे मध्य एशिया के तेल पर भी निर्भर नहीं. समुद्र के गर्भ मेें शैल तेल से उसकी अपनी सारी जरूरतें पूरी हो सकती हैं. ईरान के तेल पर कब्जा करने का अमेरिका का एकमात्र मकसद जापान तथा यूरोप के अपने संधिमित्रों पर अपना आधिपत्य कायम रखना है.
भारत के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि दूरदर्शिता इसी में है कि वह अमेरिकी हितों को अपना राष्ट्रीय हित न समझे. जिस तरह भारत और चीन के सामरिक हितों में अनिवार्य टकराव है, उसी तरह भारत और अमेरिका के हितों में भी अंततः बुनियादी टकराव है. भारत अमेरिका का पिछलगुवा कभी नहीं बन सकता, जिस तरह चीन अमेरिका के सामने दूसरे नंबर का पद स्वीकार नहीं कर सकता.
कहने का अभिप्राय यह नहीं कि हम अमेरिका तथा चीन अथवा रूस के समकक्ष हैं, पर निश्चय ही दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की और अग्रसर होता भारत अपनी संप्रभुता या स्वायत्ता के साथ समझौता नहीं कर सकता.
ईरान का विरोध करने में अमेरिका का साथ देने की जो कीमत हमें मिल सकती है, वह मीठी शरबत में जहर का ही घूंट साबित हो सकती है. यहां हम ईरान के साथ अपने हजारों वर्ष पुराने सांस्कृतिक संबंधों की दुहाई नहीं दे रहे, बल्कि सच कह रहे हैं.
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