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आम के स्वाद का रहस्य

Updated at : 15 May 2019 6:51 AM (IST)
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आम के स्वाद का रहस्य

मिथिलेश कु. राय रचनाकार mithileshray82@gmail.com कक्का कह रहे थे कि पके फलों में थोड़ा-सा स्वाद उस वृक्ष का रहता है और थोड़ा-सा उसी वृक्ष के हरे पत्तों का. धूप जो बड़े प्यार से उसमें मीठापन भरती है, पके फलों में वह तो विद्यमान रहता ही है. साथ ही फलों से रगड़ खाती हवा भी अपना […]

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मिथिलेश कु. राय

रचनाकार

mithileshray82@gmail.com

कक्का कह रहे थे कि पके फलों में थोड़ा-सा स्वाद उस वृक्ष का रहता है और थोड़ा-सा उसी वृक्ष के हरे पत्तों का. धूप जो बड़े प्यार से उसमें मीठापन भरती है, पके फलों में वह तो विद्यमान रहता ही है.

साथ ही फलों से रगड़ खाती हवा भी अपना कुछ स्वाद उनमें डाल देती है. पके फलों में थोड़ा सा स्वाद मिट्टी का भी रहता है और जितना भी ठंडापन रहता है उनमें, वह सारा पाताल के पानी का रहता है. इस तरह पके फलों में थोड़ा सा स्वाद जड़ का भी रह जाता है!

बात हरी मिर्ची से शुरू हुई थी और आम तक आ गयी थी. कक्का बिना हरी मिर्ची के एक बखत का भी भोजन नहीं कर सकते. थाली में एक तीखी मिर्ची हो तो वे कहते हैं कि खाने में जैसे कोई दिव्य स्वाद आ जाता है!

लेकिन वे हाट-बाजार की मिर्ची कभी नहीं खाते. कहते हैं कि देखने में तो बड़ी सुंदर लगती है, लेकिन स्वाद ठीक नहीं होता. मिर्ची का भी अपना एक खास स्वाद होता है और वह होता है उसका तीखापन. उनके अनुसार, हाट-बाजार की लंबी-लंबी मिर्ची से वे गुण छीन लिये जाते हैं. वे यह सवाल कर रहे थे कि अगर मिर्च खाने से तीखापन का बोध न हो, तो हम उसको कैसे परिभाषित करेंगे?

कक्का बारहों मास मिर्ची के दो-चार पौधे लगाये रखते हैं. वे कहते हैं कि चाहूं तो थोड़ा-सा खाद दे दूं, जिससे पौधे रातों-रात बड़े हो जायेंगे. चाहूं तो ऐसी दवाइयों का प्रयोग कर दूं कि अभी जो फल फूल छोड़ के निकला है, चार-पांच दिनों में लंबी-लंबी मिर्ची में बदल जायेंगे.

लेकिन नहीं. तब मिर्ची मिर्ची नहीं रह जायेगी. अपनी तासीर के स्तर पर वह पता नहीं क्या हो जायेगी. जब कक्का यह सब कह रहे थे, मुझे वृंद का एक दोहा याद आ गया कि कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर. समय पाय तरुवर फरै, केतिक सींचौ नीर.

कक्का आम के बारे में कहने लगे थे कि फलों को मिट्टी, पानी और धूप सिरजती हैं. समय आता है तो फल स्वतः पक जाते हैं और मीठे हो जाते हैं. लेकिन हम बाजार और उसके व्यवसाय की गिरफ्त में इस तरह फंस गये हैं कि उसके पकने और उसके मीठे होने की प्रतीक्षा नहीं कर पाते. हम कच्चे फलों को ही टहनियों से अलग कर देते हैं और उसे पकानेवाले रसायन में डाल देते हैं.

कच्चे आम जिसे अभी पकने में महीना भर का समय लगता, वह दूसरे ही दिन पक कर पीला हो जाता है. बाजार में लोग उसे देखते हैं और उनका मन ललचने लगता है. वे उसे खरीदते हैं और खाते हैं. उन्हें कई बार यह लगता भी है कि पके आम का स्वाद ऐसा तो नहीं होता है. लेकिन वे ठीक से यह याद नहीं कर पाते कि पके आम का स्वाद कैसा होता है.

आजकल लोग पेड़ पर ही पककर जमीन पर गिरे आम के स्वाद को भूल चुके हैं. कक्का कह रहे थे कि प्रकृति प्रदत्त ये अनमोल उपहार हमारे जीवन की रक्षा के लिए और हमारी स्वाद-ग्रंथियों की संतुष्टि के लिए हैं. लेकिन उसे जीवन से खिलवाड़ करनेवाली चीजों में बदल दिया गया है. वे कह रहे थे कि अब हम भोजन के माध्यम से पहले अपने शरीर में जहर भरते हैं, फिर जहर निकालने के उपक्रम में लगे रहते हैं.

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