पार्टियां और उसकी सदस्यता

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date
आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक,
एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
delhi@prabhatkhabar.in
जब आप भाजपा की आधिकारिक वेबसाइट पर जाते हैं, तो आपको वहां एक संदेश मिलता है, जिसमें कहा गया है कि 'विश्व के सबसे बड़े दल की वेबसाइट पर आपका स्वागत है.' भाजपा के 10 करोड़ सदस्य हैं. तकरीबरन 10 वयस्क भारतीय में से एक भाजपा का सदस्य है. यह एक चौंका देनेवाला आंकड़ा है. वर्ष 2014 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 16 करोड़ मत मिले थे और उनमें अधिकांश हिस्सा भाजपा का था.
इसका अर्थ यह हुआ कि इस पार्टी के लगभग उतने ही सदस्य हैं, जितने इसके मतदाता हैं. इसके आकार का मूल्यांकन करने के लिए दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) पर एक नजर डालते हैं. चीन एकदलीय शासन प्रणाली का राष्ट्र है. इस पार्टी के नौ करोड़ से अधिक सदस्य हैं, लेकिन इस पार्टी की सदस्यता लेना इतना आसान नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार, सेना, बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य और राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों के सभी शीर्ष पद इस पार्टी के सदस्यों के पास होते हैं.
वर्ष 1921 में सीपीसी के केवल 57 सदस्य थे. वर्ष 2014 में 2.2 करोड़ चीनी लोगों ने सीपीसी की सदस्यता के लिए आवेदन किया था और उनमें से केवल 20 लाख लोगों को सदस्यता मिली. आवेदन करने से सदस्य बनने तक एक वर्ष का समय लगता है. आवेदन में एक पत्र शामिल करना जरूरी होता है, जो यह कहता है कि व्यक्ति सीपीसी पर विश्वास क्यों करता है. इससे तय होता है कि सदस्य के तौर पर उसकी भर्ती होगी या नहीं. उसके बाद आवेदक को एक अनिवार्य परीक्षा पास करनी होती है.
परीक्षा में सफल होने के बाद व्यक्ति की स्क्रीनिंग होती है, उसके बाद उस व्यक्ति को दो ऐसे वर्तमान सदस्यों को तैयार करना होता है, जो उसकी सिफारिश करें. इन सब प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद उस व्यक्ति को परीविक्षा यानी प्रोबेशन पर स्वीकार कर लिया जाता है. जबकि भाजपा इस तरह से अपने सदस्यों को प्रतिबंधित नहीं करती है, लेकिन यह नि:शुल्क नहीं है. भाजपा का सदस्यता शुल्क पांच रुपया है और उसके बाद कम से कम 100 रुपये का 'स्वैच्छिक' योगदान देना होता है. इस प्रकार इस पार्टी में शामिल होने के लिए प्रत्येक सदस्य को 105 रुपये या उससे अधिक का योगदान देना होता है.
यदि वास्तव में सदस्य बनने की उनकी यही परिभाषा है, तो इस पार्टी ने अकेले सदस्यों से ही 1,000 करोड़ रुपये एकत्रित किये हैं. यह उल्लेखनीय है. इसके ठीक नीचे फार्म में आजीवन सहयोग निधि के तौर पर पार्टी कोष में योगदान के लिए कहा जाता है, जो न्यूनतम 1,000 रुपया है.
पाठकों को यह जानने में रुचि होगी कि भाजपा के संविधान में सभी सदस्यों के लिए यह शपथ लेना अनिवार्य है, जिसमें यह पंक्ति शामिल है, ‘मैं पंथनिरपेक्ष राज्य और वैसा राष्ट्र जो पंथ आधारित नहीं है, की अवधारणा में विश्वास रखता हूं.’
जो लोग इस दल को इसकी विचारधारा के माध्यम से जानते हैं, उनके लिए दिलचस्प यह है कि भाजपा का संविधान इस पंक्ति से शुरू होता है कि यह 'विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान और समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र के इसके सिद्धांतों के प्रति पूरी आस्था और निष्ठा रखेगा.'
अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने मिस्ड कॉल के जरिये लोगों को इसकी तरफ आकर्षित करने का कार्यक्रम शुरू किया. भाजपा विभिन्न शहरों में होर्डिंग्स पर इस फोन नंबर को प्रचारित करती है. इस नंबर पर कॉल करनेवाले व्यक्ति को एक संदेश भेजा जाता है और यह निश्चित करने के लिए कॉल किया जाता है कि वे पैसों का योगदान दे सकते हैं या स्वैच्छिक सेवा कर सकते हैं.
एक कंप्यूटर रिकॉर्ड रखा जाता है कि संदेश या कॉल पर प्रत्येक व्यक्ति ने कैसी प्रतिक्रिया दी और उन्होंने क्या योगदान दिया, अपना समय या पैसा. इस तंत्र के जरिये, पार्टी यह देख सकती है कि समय के साथ किस व्यक्ति पर विश्वास किया जा सकता है और वे अपने प्रयासों पर केंद्रित हो सकते हैं. चूंकि भाजपा का नेतृत्व एक ऐसा नेता कर रहा है, जो मध्य वर्ग के बीच बहुत लोकप्रिय है, हम उम्मीद कर सकते हैं कि इसकी सदस्यता और स्वयंसेवकों की संख्या का विस्तार होता रहेगा.
इसके अतिरिक्त यह पार्टी विश्व के सबसे बड़े गैर-सरकारी संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ का भरोसा कर सकती है. पूरे भारत में 55,000 से अधिक संघ की शाखाएं हैं. इसके 6,000 पूर्णकालिक प्रचारक हैं, जो वर्तमान में चुनाव ड्यूटी पर तैनात हैं. लोगों को कैसे संगठित करना है, इसके लिए वे वर्षों से प्रशिक्षित किये गये हैं.
आरएसएस की विचारधारा और उसके लक्ष्य से भले ही कोई असहमत हो सकता है, लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि उसने जो सेना तैयार की है, वह सक्षम और प्रतिबद्ध है. कुल मिलाकर देखा जाये, तो भाजपा के पास लोगों, नेटवर्क और पैसे के संदर्भ में विश्व की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक मशीन है.
निश्चित तौर पर कांग्रेस पार्टी का एक लक्ष्य अपने संगठन के पुनर्निर्माण का होगा, ताकि वह भाजपा की बराबरी कर सके. राहुल गांधी पिछले 15 वर्षों से इस दल में हैं, बावजूद इसके अभी तक ऐसा नहीं हुआ है. भारत में अपने पहले 15 वर्षों के दौरान महात्मा गांधी ने चंपारण, खेड़ा, खिलाफत, असहयोग और दांडी नमक आंदोलन का नेतृत्व किया.
इस कांग्रेस में हम समान स्तर की जमीनी गतिविधि नहीं पाते हैं. समाज को एकजुट करने के लिए पूर्व में जिस तरह के दृष्टिकोण के साथ यह पार्टी आगे बढ़ी थी, वैसा आज हमें देखने को नहीं मिलता है, या कम से कम मुझे ऐसा नहीं दिखता है. अपने विकास के कारण भी कुछ मायनों में जमीनी स्तर से इसने अपने जुड़ाव को खो दिया है.
सेवा दल नाम से कांग्रेस का भी एक स्वयंसेवी संगठन है, जिसकी स्थापना आरएसएस से एक वर्ष पहले हुई थी. यह वह संगठन है जिसने स्वतंत्रतापूर्व के सभी आंदोलनों में कांग्रेस को संसाधन और जन समर्थन मुहैया कराया था. लेकिन स्वतंत्रता के बाद के दशकों में यह क्षीण होता गया, जबकि इस दौरान आरएसएस का लगातार विकास हुआ है.
सदस्यता, खास तौर से शुल्क आधारित सदस्यता, किसी दल की लोकप्रियता का सही सूचक है. कांगेस को अपनी गतिविधियों और भारत के लिए अपनी दृष्टि के आधार पर युवा भारतीयों को अपनी सदस्यता लेने के लिए प्रेरित करने की महती चुनौती है.
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