दूर हो शैक्षणिक विषमता

Updated at : 10 Apr 2019 6:13 AM (IST)
विज्ञापन
दूर हो शैक्षणिक विषमता

मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा तैयार देश के श्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थानों की वार्षिक सूची में पहले की तरह केंद्रीय संस्थानों का वर्चस्व है. इसमें शामिल राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय संस्थान महानगरों और राजधानियों में स्थित हैं. इस सूची के संदर्भ में समूची शिक्षा व्यवस्था पर विचार करने की आवश्यकता है. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी), भारतीय प्रबंधन संस्थान […]

विज्ञापन

मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा तैयार देश के श्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थानों की वार्षिक सूची में पहले की तरह केंद्रीय संस्थानों का वर्चस्व है. इसमें शामिल राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय संस्थान महानगरों और राजधानियों में स्थित हैं. इस सूची के संदर्भ में समूची शिक्षा व्यवस्था पर विचार करने की आवश्यकता है.

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी), भारतीय प्रबंधन संस्थान (आइआइएम) और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी) में देश के छात्रों की कुल संख्या का मात्र तीन प्रतिशत हिस्सा पढ़ता है, किंतु इन संस्थानों को 2015 से 2018 के बीच उच्च शिक्षा के लिए केंद्रीय आवंटन का 50 प्रतिशत से अधिक भाग मिला था. शेष राशि उन 865 संस्थानों में वितरित हुई, जहां 97 प्रतिशत छात्र हैं.

इनमें भारतीय विज्ञान संस्थान और विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान के संस्थान भी हैं. इसी तरह से केंद्रीय विश्वविद्यालयों को भी बहुत अधिक आवंटन प्राप्त होता है. इन संस्थाओं की उत्कृष्टता के कारण इन्हें मेधावी छात्र और विद्वान शिक्षक भी मिलते रहे हैं. ऐसे में इन्हें शीर्ष स्थान मिलता है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. प्रश्न यह है कि सरकारों और नीति-निर्धारकों द्वारा इस असंतुलन को दूर करने का गंभीर प्रयास क्यों नहीं किया जाता.

बीते सालों में शिक्षा के मद में बजट आवंटन तो बढ़ा है, लेकिन सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) के अनुपात में इस क्षेत्र में खर्च में कमी आयी है. पिछले वर्ष की आर्थिक समीक्षा में बताया गया था कि शिक्षा में जीडीपी का तीन प्रतिशत से भी कम खर्च किया जा रहा है.

ध्यान रहे, इसमें शिक्षा के अलावा खेल, कला और संस्कृति भी शामिल है. दिसंबर, 2018 में नीति आयोग ने 2022 तक इस आंकड़े को छह प्रतिशत तक ले जाने की सलाह दी थी. इस संबंध में राज्यों, विशेषकर आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों, का प्रदर्शन भी बेहद निराशाजनक है, जहां शैक्षणिक संस्थान बुनियादी सुविधाओं, योग्य शिक्षकों, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं आदि समस्याओं से जूझ रहे हैं. ऐसी जगहों से पढ़े छात्र पढ़ाई और रोजगार के बेहतर मौके पाने से चूक जाते हैं.

अच्छी उच्च शिक्षा के लिए स्कूलों की स्थिति में भी बड़े सुधारों की जरूरत है. साल 2017 में वित्त मंत्रालय के अधीनस्थ एक स्वायत्त संस्था ने 12 राज्यों में अध्ययन कर जानकारी दी थी कि इनके स्कूलों में बड़ी संख्या में शिक्षकों और कक्षाओं की दरकार है.

असर रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों के ज्यादातर बच्चे निचली कक्षाओं के पाठ नहीं पढ़ पाते. समर्थ शिक्षकों का अभाव भी चिंताजनक है. बीते छह सालों में केंद्रीय बजट में शिक्षकों के प्रशिक्षण का आवंटन 1,158 करोड़ (2014-15) से घटकर मात्र 150 करोड़ (2019-20) रह गया है, यानी इस मद में 87 प्रतिशत की कटौती हुई है.

देश के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करने के लिए बहुत जरूरी हो गया है कि छात्रों की बड़ी संख्या को देखते हुए हर स्तर पर ठोस उपाय हों और हजारों संस्थानों को बेहतर करने के लिए निवेश बढ़ाया जाये.

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola