टिक या कट उर्फ टिकट
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :25 Mar 2019 6:03 AM (IST)
विज्ञापन

आलोक पुराणिक वरिष्ठ व्यंग्यकार puranika@gmail.com चालू विवि ने टिकट विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया, इसमें प्रथम पुरस्कार निबंध इस प्रकार है- टिकट कई तरह के होते हैं. सिनेमा टिकट, बस टिकट, हवाई जहाज टिकट और चुनावी टिकट. इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण चुनावी टिकट होता है. जिसके चुनावी टिकट की सैटिंग सही है, वह सिनेमा, […]
विज्ञापन
आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
puranika@gmail.com
चालू विवि ने टिकट विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया, इसमें प्रथम पुरस्कार निबंध इस प्रकार है-
टिकट कई तरह के होते हैं. सिनेमा टिकट, बस टिकट, हवाई जहाज टिकट और चुनावी टिकट. इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण चुनावी टिकट होता है. जिसके चुनावी टिकट की सैटिंग सही है, वह सिनेमा, बस और हवाई जहाज का मालिक हो जाता है. इसलिए चतुर सुजान इसी टिकट पर फोकस करते हैं और इस कदर फोकस करते हैं कि चाहे राजनीतिक पार्टियां बदल जायें,पर वह चुनावी टिकट हासिल करके ही मानते हैं.
महाराष्ट्र से लेकर उत्तर प्रदेश तक ऐसे कई नेता हैं, जो कुछ दिन पहले सेकुलर बने राष्ट्रवाद को कोसते थे, पर अब टिकट के चक्कर में घणे राष्ट्रवादी होकर सेकुलरवादी हो गये हैं. ये न किसी के विरोधी हैं न किसी के समर्थक हैं, ये सिर्फ और सिर्फ अपने चुनावी टिकट के समर्थक हैं. अगर पाकिस्तान के इमरान खान की पार्टी के टिकट पर भारत में चुनाव लड़ने की अनुमति होती, तो भारत में कई नेता चुनावी टिकट के चक्कर में इमरान खान की पार्टी के मेंबर हो जाते.
टिकट में से अंत का ट हटा दिया जाये, तो टिक बनता है और टिकट में से शुरू का टि हटा दिया जाये, तो कट बनता है. आशय यह है कि टिक ले या कट ले. यानी नेताओं को जमकर टिक कर काम करना चाहिए, वरना कटना पक्का हो जाता है.
इधर का कटा उधर जमेगा या नहीं पक्का ना होता. बिहार की कई सीटों पर ऐसे नेता टहल रहे हैं, जो पुरानी पार्टी से कट लिये इस उम्मीद में कि नयी पार्टी में चुनावी टिकट मिल जायेगा, पर नयी से टिकट न मिला, पुरानी से कट लिये. यानी पुरानी से कटने से पहले तय कर लेना चाहिए कि नयी जगह टिकना कहां है.
टिकटों के मामले दार्शनिक मामले हैं, बंदा जो और जितनी उम्मीद करता है, उतना नहीं मिलता. एक वक्त था, जब यूपी-बिहार में कांग्रेस की हैसियत सारे टिकट तय करने की होती थी. अब कांग्रेस चिरौरीवान स्थिति में है कि कुछ टिकट मिल जायें. टिकट की महिमा है कि टिकट बांटनेवाले को भी एक दिन टिकट मांगना पड़ता है. इस वाक्य का शरद यादव की स्थिति से कोई लेना-देना नहीं है.
कईयों के पास टिकट बहुत हैं, पर जीत कम हैं. कईयों के पास जीत भले ही न हो, पर टिकट बांटने की हैसियत उन्हीं की है. तमाम परिवारवादी दलों में टिकट वही बांटते हैं, जिनके अपने जीतने का रिकाॅर्ड संदिग्ध है. कांग्रेस नेता राज बब्बर के पास कुल मिला कर पांच टिकट हैं.
यूपी में फिरोजाबाद, आगरा, गाजियाबाद का चुनावी टिकट रहा इनके पास, फिर 2019 में इन्हें मुरादाबाद से टिकट मिला. चुनावी रेल में सवार हो पाते, उससे पहले ही मैसेज आया कि आपका टिकट दूसरे स्टेशन का है- फतेहपुर सीकरी स्टेशन का. ना टिकट पक्का होता है, ना सीट पक्की होती है, बस नेता पक्का होता है कि वह जीतेगा.
हमें टिक कर काम करना चाहिए, वरना बेरोजगार होने के खतरे हैं. आखिर हर कोई तो कुछ खास वंशों से न होता, जिनमें रोजगार की गारंटी हर हाल में होती ही होती है!
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन




