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देश आगे बढ़ता जा रहा है

Updated at : 07 Mar 2019 6:04 AM (IST)
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देश आगे बढ़ता जा रहा है

डॉ अश्वनी महाजन एसोसिएट प्रोफेसर, डीयू ashwanimahajan@rediffmail.com हम पढ़ते-पढ़ाते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. आजादी के बाद अपनायी जानेवाली लोकतांत्रिक प्रणाली ने लगातार परिपक्वता हासिल की है, जिस कारण दुनिया में इसकी मिसाल दी जाती है. फिर भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारतीय लोकतंत्र में खामियां ढूंढती रहती हैं और भारतीय लोकतंत्र […]

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डॉ अश्वनी महाजन

एसोसिएट प्रोफेसर, डीयू

ashwanimahajan@rediffmail.com

हम पढ़ते-पढ़ाते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. आजादी के बाद अपनायी जानेवाली लोकतांत्रिक प्रणाली ने लगातार परिपक्वता हासिल की है, जिस कारण दुनिया में इसकी मिसाल दी जाती है.

फिर भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारतीय लोकतंत्र में खामियां ढूंढती रहती हैं और भारतीय लोकतंत्र को कमतर आंकती हैं. किसी भी लोकतंत्र की सफलता का सही पैमाना, लोगों का उस पर विश्वास होता है. इस नाते भारतीय जनमानस का अपने लोकतंत्र पर पूर्ण विश्वास लगातार बना हुआ है.

हम नहीं कह सकते कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकारों में कोई दोष न रहे हों, लेकिन इस दोषों के मद्देनजर ही जनता द्वारा शांतिपूर्वक ढंग से सरकारों को बदलकर बदलाव लाने का काम भी किया है. गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार से पहले यूपीए सरकार की दो पारियां रहीं. पहली पारी में कृषि संकट का तो हल नहीं हो पाया, लेकिन ग्रामीणों को संतुष्ट करने के लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी योजनाआें को शुरू किया गया और अंत में कृषि ऋण माफी की लोकलुभावन नीति से सत्ता दोबारा हासिल कर ली गयी.

लेकिन जनता ने यूपीए सरकार की दूसरी पारी में भ्रष्टाचार से ग्रस्त सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस पार्टी को सबसे बड़े दल से अपदस्थ करते हुए लोकसभा में कांग्रेस पार्टी को मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी हासिल नहीं होने दिया. मेरा मानना है कि अपने अंतिम समय में यूपीए सरकार के घटक दलों (खासतौर पर बीएसपी और समाजवादी पार्टी) ने सभी मर्यादाओं को लांघते हुए, घोषित रूप से खुदरा क्षेत्र में एफडीआई यानी वाॅलमार्ट के आगमन का विरोध करते हुए, उसी के समर्थन में विधेयक पास करने में अपना पूरा योगदान दिया, तो जनता ने उनके आचरण को गंभीरता से लिया. इस सबका परिणाम यह हुआ कि सभी दलों का सफाया करते हुए जनता ने नरेंद्र मोदी के हाथ में सत्ता सौंप दी.

नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद एक ओर तो भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया, साथ ही देश के समक्ष बड़ी आर्थिक समस्याओं से निपटने की तैयारी भी दिखायी दी.

बढ़ती महंगाई पर काबू पाने के लिए एक तरफ राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने का संकल्प दिखायी दिया और दूसरी तरफ खाद्य मुद्रा स्फीति पर काबू पाने के लिए दालों और तिलहनों के उत्पादन को बढ़ाने का विशेष प्रयास हुआ. आज देश दालों के मामले में लगभग आत्मनिर्भर हो चुका है. राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने का मतलब है, सरकारी खर्च पर नियंत्रण और साथ ही साथ कर राजस्व में वृद्धि. गौरतलब है कि जो राजकोषीय घाटा यूपीए के दौरान जीडीपी के 6.5 प्रतिशत से ज्यादा हो गया था, उसे नियंत्रित करते हुए अपने अंतिम बजट तक जीडीपी के 3.4 प्रतिशत तक लाया गया. इसके लिए सरकारी खर्च में रिसाव यानी लीकेज को भी रोका गया.

गौरतलब है कि सरकार द्वारा जनधन योजना, आधार और मोबाइल- इस त्रय के इस्तेमाल से डीबीटी यानी ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ के जरिये लाभार्थी के खाते में सीधे राशि भेजने से लगभग 85 हजार करोड़ रुपये सालाना का रिसाव कम हो गया. साथ ही लगभग सबके बैंक खाते खुलने लगे और कुछ वर्षों में 34 करोड़ से ज्यादा नये शून्य जमा की अनिवार्यता के जनधन खाते खुल गये और बचत को संकलित करने का एक नया रास्ता बना.

सरकार स्वयं बहुत कम रोजगार दे सकती है, लेकिन ऐसा वातावरण जरूर बना सकती है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोग रोजगार देनेवाले बनें.

सही अर्थतंत्र के लिए जरूरी है कि देश की जनता इस तरह सक्षम हो. ‘मेक इन इंडिया’ के साथ-साथ एक बड़ी महत्वाकांक्षी योजना रही- मुद्रा ऋण योजना. इस योजना के माध्यम से लघु उद्यमों को बिना सिक्योरिटी के ऋण मिलने लगा और ऐसा कहा जा रहा है कि करोड़ों लोगों के रोजगार के नये अवसर इसके साथ बने.

यही नहीं, सरकार द्वारा कौशल विकास योजना के कार्यान्वयन से युवकों में नये कौशल का प्रशिक्षण भी बड़ी मात्रा में हुआ. ‘स्टार्ट-अप’ योजना के माध्यम से नये इरादों और विचारों को नये पंख मिलने लगे और पहली बार नये उद्यमों के लिए टैक्स की छूट का प्रावधान होने के साथ-साथ अन्य प्रकार से सरकारी मदद मिलना संभव हो पाया.

इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास जो रुक गया था, अब दोबारा शुरू हुआ. ग्रामीण सड़कें भी बनीं और गरीबों के लिए घर भी. स्वच्छता अभियान के तहत नये टॉयलेट भी बने और स्वच्छता एक अभियान बन गया.

उज्ज्वला स्कीम के अंतर्गत गरीब महिलाओं को नये गैस कनेक्शन मिले और बड़ी बात यह रही कि आजादी के बाद जितने गैस कनेक्शन दिये गये थे, लगभग उतने गैस कनेक्शन पिछले पांच वर्षों से भी कम समय में दे दिये गये. पहली बार दो हेक्टेयर तक के किसानों को सीधे छह हजार रुपये वार्षिक की मदद का रास्ता खुला और किसानों को उनकी उपज की लागत का 150 प्रतिशत देने का प्रावधान हुआ.

सरकार द्वारा बिना इस बात की परवाह किये हुए कि उसके निर्णयों का राजनीतिक असर क्या होगा, बड़ा कर सुधार जीएसटी और उससे भी बड़ा एक फैसला विमुद्रीकरण के संदर्भ में लिया गया. कह सकते हैं कि तमाम राजनीतिक विरोधाभासों के बावजूद देश आगे बढ़ता जा रहा है. विकास की बात हो या जनकल्याण की, हमारा लोकतंत्र हमेशा इसके लिए एक प्रकार से प्रोत्साहन का काम करता रहा है.

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