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विश्व राजनीति और गांधी का सोच

Updated at : 06 Mar 2019 5:56 AM (IST)
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विश्व राजनीति और गांधी का सोच

प्रो सतीश कुमार अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार singhsatis@gmail.com दुनिया आज बुरी तरह से लहूलुहान है. हर दिन लोग बम और बारूदों से मारे जा रहे हैं. एशिया महादेश ज्यादा ही संकट में है. मध्य-पूर्व में सीरिया की समस्या, तो दक्षिण एशिया में पाकिस्तान की दहशतगर्दी संकट का कारण बना हुआ है. यह वही पाकिस्तान है, […]

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प्रो सतीश कुमार
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
singhsatis@gmail.com
दुनिया आज बुरी तरह से लहूलुहान है. हर दिन लोग बम और बारूदों से मारे जा रहे हैं. एशिया महादेश ज्यादा ही संकट में है. मध्य-पूर्व में सीरिया की समस्या, तो दक्षिण एशिया में पाकिस्तान की दहशतगर्दी संकट का कारण बना हुआ है.
यह वही पाकिस्तान है, जिसकी आर्थिक मदद के लिए गांधी ने सत्याग्रह किया था कि बंटवारे के बाद उसको पैसे दिये जायें, जिसे लेकर कांग्रेस के बड़े नेता नाराज हुए थे. साल 1947 में दिल्ली में एशियाई कॉन्फ्रेंस बुलायी गयी थी.
उस कॉन्फ्रेंस का अभिकल्प क्या था? एक ऐसी दुनिया बनाने का अभिकल्प था, जो एशिया के मूल्यों पर टिका हो. दरअसल एशियाई विश्व तो बन गया, लेकिन शांति और अहिंसा की व्यवस्था पहले से भी ज्यादा खौफनाक बन गयी. चीन पूरी तरह से अमेरिका और अन्य औपनिवेशिक यूरोप के देशों की तरह आक्रामक है. अफ्रीका से लेकर लैटिन अमेरिका और एशिया के तमाम देश चीन के मकड़जाल में फंसते जा रहे हैं. आज गांधी होते, तो वे बहुत दुखी होते.
यूरोप और अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में गांधी के जिन विचारों को पढ़ाया जाता है, उसकी रूपरेखा एक शांतिपूर्ण विश्व की परिकल्पना है, जहां समस्याओं का निपटारा हिंसा से नहीं, बल्कि बातचीत से किया जाये, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बनाये गये नियमों पर दुनिया चलती रहे और शत्रुता विश्व युद्ध का कारण न बने. लेकिन हुआ ठीक गांधी के विचारों के विपरीत. आज दुनिया का हर कोना हिंसक है.
कभी उत्तर कोरिया आण्विक हथियारों की धमकी देता है, तो कभी पाकिस्तान. चीन भी बाज नहीं आता. चीन ने तो आण्विक कचरे का ढेर इकट्ठा कर एशिया के सारे देशों को खतरे में डाल दिया है. तिब्बत का पहाड़ पीने के पानी का सबसे बड़ा स्रोत है, वहीं पर चीन ने आण्विक कूड़ा इकट्ठा किया है, जिससे कई एशियाई देशों पर खतरा है.
प्रश्न महत्वपूर्ण है कि ऐसा हुआ कैसे? इसके लिए दोषी कौन है? इसका उचित समाधान क्या हो सकता है? इन प्रश्नों पर खूब बहस हो रही है.
पहला, विश्व व्यवस्था की रूपरेखा जिन सिद्धांतों पर चलती है, पहले भी चलती थी, उसका मुख्य प्रेरक तत्व शक्ति-सिद्धांत था, अर्थात जिसकी लाठी उसकी भैंस. अमेरिका जब प्रथम विश्व युद्ध के बाद शक्तिशाली बना, तो उसने दुनिया को अपने ढंग से हांकने की कोशिश की. जिन देशों ने प्रतिरोध किया, वहां की सत्ता को जबरन बदल दिया गया. लोकतंत्र और मानवाधिकार के नाम पर घोर अत्याचार शुरू हुआ. अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को कठपुतली बना दिया गया. किसी देश की कूवत नहीं थी कि अमेरिका का विरोध करे. शीत युद्ध के बाद तो अमेरिका निष्कंटक रॉबिनहुड की शक्ल में आ गया.
दुनिया दो रंगों में दिखने लगी- एक अमेरिका-पसंद की दुनिया और दूसरा अमेरिका-विरोध की दुनिया. गांधी ने अपने एक भाषण में कहा था कि अगर पश्चिमी दुनिया पूर्व के देशों को बल और छल से जीतने की कोशिश करेगी, तो वह बहुत दिनों तक टिक नहीं पायेगी.
उन्होंने संघर्ष से अलग एक नयी दुनिया की सोच विकसित की थी, जिसे नेहरूजी ने गुटनिरपेक्षता के रूप में स्थापित किया था. लेकिन, यह संगठन भी चाय-कॉफी का केवल मंच बनकर रह गया. साठ-सत्तर के दशक में उत्तर और दक्षिण के रूप में विश्व के दो विरूपित केंद्र बन गये. जो गरीब थे, वे दक्षिण की टोली में थे और जो अमीर थे, वे उत्तर की टोली में शामिल थे. एक टोली अन्नदाता बन गयी, तो दूसरी निहायत गरीब भिक्षु, जिसका भरण-पोषण मांग कर ही संभव था.
उसके बाद भूमंडलीकरण की आंधी शुरू हुई. जो जितना ही शक्तिमान, वह उतना ही महान. विधाता का नियम है कि कोई भी देश हमेशा श्रेष्ठ नहीं बना रहता, उसका पतन सुनिश्चित है. अमेरिका का भी पतन आरंभ हो गया.
यूरोप के हालात पहले से ही खराब थे. इस बीच चीन एक नयी शक्ति के रूप में उभरकर आया, जिसके बारे में 18वीं शताब्दी में नेपोलियन ने कहा था कि यह सोया हुआ शेर है, इसे छेड़ो मत, जग गया तो सबकी नींद हराम कर देगा. सच में नेपोलियन की बात सच साबित हुई. अमेरिका आज चीन की गति और शक्ति दोनों से परेशान है. लेकिन, दुखद बात यह है कि दुनिया में शक्ति का ध्रुवीकरण बदल गया, केंद्र पश्चिम से पूर्व की ओर खिसक गया, लेकिन नियामक वही रहे, जो 19वीं और 20वीं शताब्दी में थे.
गांधी ने कहा था कि पूर्व की दुनिया अलग है, इसके मूल्य अलग हैं, यह एक बेहतर सोच पैदा कर सकती है, लेकिन बात बनी नहीं, वातावरण और तल्ख बनते चले गये. समाज और हिंसक हो गया. धर्म और जाति के नाम पर सामूहिक कत्लेआम होने लगे. जिस धर्म को गांधी ने एक सुंदर दुनिया बनाने की परिकल्पना की थी, उसी को रक्तरंजित कर दिया गया.
गांधी गीता को सर्वोच्च धर्मग्रंथ मानते थे. उनकी वैश्विक सोच भी गीता के नियमों से सिंचित थी. विश्व को जब तक औपनिवेशिक नजरों से देखा जायेगा, तब तक मैं और तुम का अंतर कभी खत्म नहीं होगा.
ऐसी दुनिया चाहिए, जिसमें सबको बराबर का हक हो. बंदूक और बारूद के ढेर पर बैठा विश्व आज पूरी तरह से गांधी की सोच से विपरीत है. इसको बदलने के लिए आध्यात्मिक नियमों का पालन जरूरी है, जिसमें हर धर्म को एक रूप में देखा गया हो, जिसमें पूरा विश्व अपना परिवार हो, यह चिंतन और सिद्धांत केवल भारत की सोच में है, गांधी इसी सोच के प्रवर्तक थे. दुनिया को बारूद की ढेर से बचाना ही होगा.
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