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अवैध इमिग्रेशन पर लगे रोक

Updated at : 07 Feb 2019 6:49 AM (IST)
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अवैध इमिग्रेशन पर लगे रोक

अभिषेक कुमार टिप्पणीकार abhi.romi20@gmail.com विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर देश में ही हजारों लोग ठगे जाते हैं. कबूतरबाजी यानी अवैध इमिग्रेशन के शिकार इन्हीं लोगों में से कुछ लोग जब किसी तरह विदेश पहुंच जाते हैं, तो वहां उनके रोजगार से लेकर जिंदगी तक का कोई ठिकाना नहीं होता. ताजा घटनाक्रम अमेरिका में […]

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अभिषेक कुमार

टिप्पणीकार

abhi.romi20@gmail.com

विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर देश में ही हजारों लोग ठगे जाते हैं. कबूतरबाजी यानी अवैध इमिग्रेशन के शिकार इन्हीं लोगों में से कुछ लोग जब किसी तरह विदेश पहुंच जाते हैं, तो वहां उनके रोजगार से लेकर जिंदगी तक का कोई ठिकाना नहीं होता.

ताजा घटनाक्रम अमेरिका में खड़ी की गयी एक फर्जी यूनिवर्सिटी के जरिये 129 भारतीय छात्रों की धर-पकड़ का है. बताया गया है कि ये भारतीय छात्र वहां एक इमिग्रेशन रैकेट के जरिये पहुंचे थे. आरोप है कि ये छात्र यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए रजिस्टर्ड थे, लेकिन वे अमेरिका में काम कर रहे थे.

यह भी बताया गया कि इस फर्जी यूनिवर्सिटी को एक स्टिंग ऑपरेशन के तहत 2015 में अमेरिका ने खुद बनाया था. अमेरिका के मिशिगन राज्य में ‘यूनिवर्सिटी ऑफ फार्मिंग्टन’ को अमेरिकी सुरक्षा बलों के अंडरकवर एजेंट चला रहे थे, ताकि पैसे के बदले अवैध प्रवास की चाह रखनेवालों को पकड़ा जा सके. इस मामले में भारत ने राजनयिक विरोध दर्ज कराया है विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने वादा किया है कि इन भारतीय छात्रों को कानूनी मदद दिलायी जायेगी.

अमेरिका में ‘पे एंड स्टे’ गिरोह के भंडाफोड़ का यह मामला नया नहीं है. साल 2016 में वीजा घोटाले में 306 भारतीय छात्रों को अमेरिका से निकाल दिया गया था.

अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी इन्वेस्टीगेशन (एचएसआई) ने लंबी जांच के बाद कहा था कि इन छात्रों ने यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्दर्न न्यूजर्सी (यूएनएनजे) में दाखिला लिया था. दाखिले के लिए सभी छात्रों ने फर्जी तरीके से अमेरिका का वीजा हासिल किया था.

उस वक्त भी बताया गया था कि एचएसआई ने वीजा घोटाले का पर्दाफाश करने के लिए ही यूएनएनजे की स्थापना की थी. यह एक तरह का स्टिंग ऑपरेशन था. इस फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ करने के लिए एचएसआई ने स्टिंग के तहत कुल 1,076 विदेशी नागरिकों की पहचान की, जिनमें 306 भारतीय छात्र थे. यह भी पता चला कि कई शिक्षण संस्थाएं दरअसल वीजा के फर्जीवाड़े में ही संलिप्त हैं.

बेरोजगारी से जूझ रहे हमारे देश में रोजगार की तलाश में विदेश जाने की चाहत नयी नहीं है. इससे पहले खाड़ी देशों में गये भारतीय श्रमिक के शोषण की अंतहीन कहानियां सामने आती रही हैं.

कई बार प्लेसमेंट एजेंट विदेश पहुंचे मजदूरों से मारपीट करते हैं, उनके पासपोर्ट छीन लेते हैं और इसके बाद भी अगर किसी तरह ये मजदूर कोई काम पाने में कामयाब रहे, तो सऊदी अरब के निताकत जैसे कड़े श्रमिक कानून उनकी नौकरी में आड़े आते रहते हैं.

वहां कामगारों के हक, काम के घंटे, छुट्टी में स्वदेश जाने के इंतजाम और अवकाश पर कहीं कोई सुनवाई नहीं है. दो साल पहले 2016 में आरटीआई से मिली जानकारी से पता चला था कि भारत से कुल 112 देशों में प्रवासी कामगार जाते हैं, जिनमें से 6,635 कामगार भारतीय विदेशी जेलों में उस वक्त बंद थे (यह जानकारी ‘माइग्रेंट्स राइट्स काउंसिल ऑफ इंडिया’ के अध्यक्ष पी नारायण स्वामी ने जुटायी थी).

सच है कि ज्यादातर मामलों में हमारी सरकार न तो इन कैदियों की तरफ ध्यान दे पाती है और न ही वह उन गरीब प्रवासियों की सुध ले पाती है, जो अवैध रूप से विदेश जाते हैं. लगता है कि सरकार को फिक्र सिर्फ प्रवासियों से मिलनेवाले पैसे की है, उनके हितों से उसका कोई सरोकार नहीं है.

खाड़ी देशों में काम करने गयेे भारतीय मजदूरों के पास अक्सर ना तो कोई पेशेवर डिग्री होती है और न ही उनके पास विदेश में प्रवास के वैध दस्तावेज होते हैं.

कबूतरबाजी यानी प्लेसमेंट एजेंसियों के फर्जीवाड़े से इनमें से जो कुछ मजदूर खाड़ी मुल्कों में पहुंच जाते हैं, वे वहां मिलनेवाले दीनार या रियाल की मदद से कुछ ठीक-ठाक गुजारा करते रहे हैं और बचायी गयी रकम भेज कर अपने घरवालों और सरकार तक की मदद करते रहे हैं.

लेकिन, सऊदी में अप्रैल, 2013 में लागू किये गये श्रम कानून- निताकत ने ऐसे श्रमिकों के लिए दो ही विकल्प छोड़े- या तो वे किसी तरह अपने लिए वैध दस्तावेजों का इंतजाम करें या स्वदेश लौट जायें. उस वक्त ज्यादातर श्रमिक स्वदेश लौट आये थे.

विदेशों में रोजगार के लिए गये एक करोड़ 10 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों के लिए संकट यह है कि उन्हें स्थानीय श्रम कानूनों में होनेवाले फेरबदल के साथ-साथ सिकुड़ते रोजगार विकल्पों की समस्या, गृहयुद्ध और आतंकवाद से भी जूझना पड़ता है.

दरअसल, पूरी दुनिया का रोजगार मार्केट सिकुड़ रहा है. हर जगह स्थानीय लोगों को रोजगारों में प्राथमिकता देने की मांग उठ रही है. ऐसे में सवाल यह है कि विदेश गये अनिवासी भारतीयों के हित में हमारी सरकार को क्या उपाय करने चाहिए? इसका पहला उपाय है देश से बाहर नौकरी जानेवाले हर शख्स के वैध प्रवासन की व्यवस्था करना.

सिर्फ कोसने से कुछ नहीं होगा, बल्कि सरकार को अवैध ढंग से चलनेवाली गैरकानूनी माइग्रेशन के चोर दरवाजे को बंद करने में सख्ती दिखानी होगी. उसे यह भी गौर करना चाहिए कि जिन देशों में भारतीय कामगार व आईटी पेशेवर जा रहे हैं, क्या उनके माइग्रेशन में वहां के वीजा और श्रम कानूनों से कोई खिलवाड़ तो नहीं किया जा रहा है.

यदि उन देशों में कोई समस्या नजर आये या वहां के वीजा और श्रम कानूनों में कोई बड़ी तब्दीली नजर आये, तो ऐसे लोगों को वहां जाने से रोक लेना चाहिए. ऐसी व्यवस्था नहीं करने पर ही वहां उनके साथ होनेवाली समस्या उन लोगों के परिवारों समेत खुद सरकार के लिए भी संकट का कारण बन जाती है.

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