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इस विचार को साकार कीजिए

Updated at : 09 Jan 2019 6:23 AM (IST)
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इस विचार को साकार कीजिए

अजीत रानाडे सीनियर फेलो, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन editor@thebillionpress.org अंत्योदय यानी अंतिम का उदय उन प्रमुख सिद्धांतों में एक है, जिन्होंने हमारे संविधान को जीवंत बनाया है. महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत के नेताओं से कहा था कि जब आप किसी नीति का निर्माण करते हैं, तो आपको यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि वह किस […]

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अजीत रानाडे
सीनियर फेलो, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन
editor@thebillionpress.org
अंत्योदय यानी अंतिम का उदय उन प्रमुख सिद्धांतों में एक है, जिन्होंने हमारे संविधान को जीवंत बनाया है. महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत के नेताओं से कहा था कि जब आप किसी नीति का निर्माण करते हैं, तो आपको यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि वह किस तरह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति का भला करेगी. यह उपयोगितावाद के उस सिद्धांत के विपरीत है, जो सर्वाधिक व्यक्तियों की सर्वाधिक भलाई की पैरोकारी करता है.
उपयोगितावाद जहां औसत प्रति व्यक्ति आय की बढ़ोतरी अथवा जीडीपी वृद्धि को अधिकतम करने पर जोर देता है, वहीं अंत्योदय सबसे अंतिम व्यक्ति को राहत प्रदान करने पर केंद्रित होता है. निश्चय ही हम इन दोनों के समन्वय को भी अंगीकार कर सकते हैं.
समानता तथा वाणी, धर्म और कहीं भी जाने-आने की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के बाद अंत्योदय के सिद्धांत का ही स्थान है. अन्य चीजों के अलावा, यह जन वितरण प्रणाली (जविप्र) की प्रेरणा है, जो गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है. यही वजह है कि यह खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013, का हिस्सा बन गयी, जो ग्रामीण भारत की तीन-चौथाई आबादी तथा इसके शहरी भाग की आधी आबादी को आच्छादित करता है.
इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान के अंतर्गत प्रति परिवार प्रति व्यक्ति पांच किलो खाद्यान्न ऊंची अनुदानित दर (गेहूं, चावल एवं मोटे अनाजों के लिए क्रमशः तीन रुपये, दो रुपये तथा एक रुपया प्रति किलो) पर मुहैया करना है, जिसकी लागत केंद्र तथा राज्य मिल कर वहन करते हैं. प्रधानमंत्री वाजपेयी के कार्यकाल के वर्ष 2000 में लागू अंत्योदय योजना भी इस अधिनियम में समाहित हो चुकी है, जिसके अंतर्गत गरीबों में भी सर्वाधिक गरीब परिवारों को 35 किलो खाद्यान्न की आपूर्ति का लक्ष्य रखा गया था.
देश में जविप्र लागू होने के कई दशकों बाद तथा खाद्य सुरक्षा अधिनियम के पांच वर्षों बाद भी इन योजनाओं के प्रतिफल असंतोषजनक ही हैं. विश्व भूख सूचकांक पर 119 देशों की पांत में भारत का स्थान 103 रहा है और यहां 5 साल से कम उम्र के बच्चों में बौनापन तथा कृशता (स्टंटिंग एवं वेस्टिंग) की दर उप-सहारा अफ्रीका के बराबर अथवा उससे भी नीचे है. भारत में विश्व के पचास प्रतिशत कुपोषित बच्चे मौजूद हैं और पिछले पंद्रह वर्षों के दौरान इस आंकड़े में कोई विशेष सुधार नहीं हो सका है. यह स्थिति सरकार के लिए शीर्ष चुनौतियों में शुमार होने योग्य है, क्योंकि आज के बच्चे ही कल के उत्पादक नागरिक तथा कामगार होंगे.
यही वह बिंदु है, जहां हमें जविप्र में ऐसे सुधार करने की जरूरत है कि यह लोगों तक केवल पकाने को खाद्यान्न की ही नहीं, बल्कि उनके पोषण हेतु पोषकता की वाहिका भी बन सके. तथ्य यह है कि अत्यंत अनुदानित अनाजों की आपूर्ति के बावजूद लोगों को उसे पकाना तो पड़ता ही है, जिसके लिए चूल्हे, ईंधन और बर्तनों की आवश्यकता होती है. यदि हम गरीबों में भी सबसे गरीबों, बेसहारा, अत्यंत कुपोषितों, बेघरों, वृद्धों तथा दिव्यांगों पर गौर करें, तो यह पायेंगे कि उनमें से बहुत-से ईंधन या जलावन की लकड़ियां इकट्ठी कर अनाज को खाद्य में परिवर्तित करने हेतु जरूरी साधनों से वंचित होते हैं. ऐसे में, क्यों नहीं उनके पास उच्च गुणवत्ता के तुरंत खाने योग्य पोषक भोजन पहुंचाने के विषय में सोचा जाए?
मध्याह्न भोजन योजना के अंतर्गत स्कूली बच्चों के लिए ठीक यही चीज की जाती है. तमिलनाडु की ‘अम्मा उनवगम’ जैसी अनुदानित योजनाओं का लक्ष्य भी कम कीमत पर तैयार भोजन मुहैया करना है.
विकसित देशों में संचालित ऐसी योजनाओं में यूएस फूड स्टांप प्रोग्राम शामिल है, जिसके अंतर्गत ऐसे वाउचर मुहैया किये जाते हैं, जिनसे सुपर मार्केट से तुरंत खाने योग्य भोजन पदार्थ खरीदे जा सकते हैं. भारत में अक्षय पात्र या नांदी अथवा गुरुद्वारों में चलनेवाले लंगरों के अलावा शेगांव जैसे तीर्थस्थलों में निःशुल्क भोजन आपूर्ति व्यवस्थाएं कार्यरत हैं, जिनके द्वारा तैयार पोषक भोजन मुहैया कराया जाता है.
अंत्योदय दर्शन के अंतर्गत हमें सबसे निचले स्तर पर रहनेवाली भारत की दस प्रतिशत आबादी को मुफ्त तथा तैयार भोजन उपलब्ध कराना ही चाहिए. यदि जविप्र के बजट का एक हिस्सा इस कार्य हेतु सुरक्षित कर दिया जाये, तो इसे बगैर किसी अतिरिक्त व्यय के संपन्न किया जा सकता है.
खाद्य प्रसंस्करण की आधुनिक तकनीकों ने यह संभव कर दिया है कि आवश्यक पोषक पदार्थों एवं स्वादिष्ट संघटकों से युक्त ‘वैक्यूम-पैक्ड’ चपातियों को काफी हद तक लंबी अवधि के लिए उनकी ताजगी तथा स्वाद बरकरार रखते हुए सुरक्षित रखा जा सकता है. ब्रिटानिया, आईटीसी, हिंदुस्तान यूनीलीवर या गोदरेज जैसी खाद्य कंपनियां भी ऐसे खाद्य उत्पादों को उनकी लागत-कुशलता, पोषण, एक अरसे तक सुरक्षित रहने की क्षमता तथा स्वाद के लिहाज से संवर्धित करने में मदद कर सकती हैं.
मध्याह्न भोजन योजना के हिस्से के रूप में तैयार भोजन आपूर्ति की व्यवस्था को लेकर चला विवाद देश की संसद तक पहुंच गया था. इस प्रस्ताव के विरोधियों की दलील यह थी कि हम इसके अंतर्गत केवल बिस्किट, उबले अंडे अथवा केले जैसी चीजें इसलिए नहीं दे सकते, क्योंकि इस योजना का एक उद्देश्य इसके माध्यम से समाजीकरण का प्रयोजन भी सिद्ध करना है. बहुत से बच्चों के लिए यह पूरे दिन में लिया जानेवाला एकमात्र भोजन भी हो सकता है. लेकिन, जब हम भूख सूचकांक पर अपनी स्थिति के संदर्भ में समाज के अंतिम व्यक्तियों के मामले को देखते हैं, तो तैयार भोजन का कोई अन्य विकल्प नहीं दिखता.
इस उपक्रम का अर्थशास्त्र, उत्पादन प्रौद्योगिकी तथा संचालन तंत्र तय किया जा सकता है. इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इसका पायलट परीक्षण किया जा सकता है, ताकि उससे सीखें लेकर व्यवस्था की खामियां दूर की जा सकें. एक अरसे में यह निश्चय ही एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध होगा.
वैसे भी सरकार सभी लोगों के लिए एक बुनियादी आय योजना पर विचार करती रही है, पर उसके राजकोषीय समाधान नहीं तलाशे जा सके हैं. इसके अलावा, वह सिर्फ आय सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है, खाद्य सुरक्षा नहीं, जबकि निःशुल्क चपाती (जिसे ‘अन्न शक्ति’ का नाम दिया गया है) में कोई अतिरिक्त लागत नहीं लगनेवाली और यह आज ही हकीकत में तब्दील की जा सकती है.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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