सबको समान शिक्षा की बात

डॉ अनुज लुगुन सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया [email protected] अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच ने आगामी 18 फरवरी 2019 को सबको समान शिक्षा के लिए ‘हुंकार रैली’ का आह्वान किया है. इसके लिए शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आंदोलन की कार्ययोजना बनायी है. इसमें देशभर के शिक्षा, शिक्षक और छात्र संगठन शामिल हो […]
डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच ने आगामी 18 फरवरी 2019 को सबको समान शिक्षा के लिए ‘हुंकार रैली’ का आह्वान किया है. इसके लिए शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आंदोलन की कार्ययोजना बनायी है.
इसमें देशभर के शिक्षा, शिक्षक और छात्र संगठन शामिल हो रहे हैं. इस आंदोलन की भूमिका में इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला और शिक्षा के निजीकरण का विरोध है. इसके लिए लगातार प्रत्येक राज्य में अभियान चल रहा है.
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने अगस्त 2015 में ऐतिहासिक फैसला देते हुए निर्देश दिया था कि सरकार सुनिश्चित करे कि राजकीय खजाने या सार्वजनिक निधियों से किसी तरह की अतिरिक्त आमदनी, लाभ या वेतन पानेवाले सरकारी कर्मचारी, अर्द्धकर्मचारी, स्थानीय निकाय जनप्रतिनिधि, जिसमें सरपंच से लेकर मुख्यमंत्री को भी शामिल किया गया, न्यायिक कर्मचारी और बाकी सभी, प्राथमिक शिक्षा पाने के उम्र के अपने बच्चों को सरकारी बेसिक शिक्षा बोर्ड द्वारा चलाये जा रहे प्राथमिक स्कूलों में ही भेजें. अदालत ने इस बात की ओर ध्यान दिया कि आजादी के पैंसठ सालों के बाद आज भी सरकारी स्कूल बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं, क्योंकि नीति-निर्धारक अपने बच्चों को संपन्न निजी स्कूलों में भेजते हैं और इसलिए सरकारी स्कूलों में उनकी कोई खास रुचि नहीं है.
अदालत ने सरकार को छह महीने के अंदर फैसले को लागू करने का निर्देश दिया, और यह भी कहा कि शर्तों को न माननेवालों को सजा दी जाये. शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने और समाज में समानता के सिद्धांत को स्थापित करने का यह ऐतिहासिक फैसला था.
यद्यपि यह फैसला आज तक लागू नहीं किया गया, लेकिन इसने इस बहस को उठाया कि क्या सबको समान शिक्षा के बिना हम अपने समाज को मजबूत बना सकते हैं? वास्तविकता तो यह है कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाये ही नहीं गये. कोठारी कमीशन द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च किये जाने का परामर्श आज तक लागू नहीं हुआ.
आज प्राथमिक शिक्षा को कई खुले हाथों में अराजक तरीके से छोड़ दिया गया है. सरकारी, अर्द्धसरकारी, गैरसरकारी, कॉरपोरेट, धार्मिक न्यासों के स्कूल इत्यादि ऐसे कई बिखरे हुए संस्थान हैं, जिनके शिक्षा का विचार और लक्ष्य भिन्न-भिन्न है. ऐसी संस्थाओं में भाषा का माध्यम, फीस के ढांचे से लेकर पाठ्यक्रम भी अस्पष्ट है. अपने समाज की नर्सरी को हमने यूं ही गैर-जिम्मेदार तरीके से छोड़ दिया है.
अदालत ने सरकारी स्कूलों को ‘आम लोगों का स्कूल’ कहा है. आज आम लोगों के स्कूल की वही स्थिति है, जो स्थिति आम लोगों की है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में करीब सवा करोड़ बच्चे बाल मजदूरी करते हैं. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार तो हमारे देश में पांच करोड़ बाल मजदूर हैं. यानी पांच करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं.
दूसरी ओर चालीस प्रतिशत बच्चे सातवीं-आठवीं तक की पढ़ाई के बाद स्कूल छोड़ देते हैं. ये सरकारी आंकड़े हैं, जिसे सरकारी भाषा में ‘ड्राप आउट’ कहा जाता है. शिक्षाविद अनिल सदगोपाल इसे ‘पुश आउट’ मानते हैं. ‘ड्राप आउट’ में सरकार अभिभावकों को दोषी मानती है, जबकि ‘पुश आउट’ के लिए सरकार जिम्मेदार है. यानी गलत सरकारी नीतियों की वजह से बच्चे स्कूल छोड़ने को मजबूर होते हैं.
उनका मानना है कि हमारी स्कूली व्यवस्था में ही इतनी खामियां हैं कि बच्चे मनोवैज्ञानिक रूप से स्कूल में टिक ही नहीं पाते. खास तौर पर दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक बच्चों के स्कूल छोड़ने की संख्या बहुत ज्यादा है. उनके साथ होनेवाला भाषाई और सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव इसका एक बड़ा कारण है.
आम लोगों के लिए बने स्कूल आम लोगों की जिंदगी को बर्बाद कर रही है. संभ्रांत और मध्यवर्ग ने तो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से बाहर निकाल लिया है. सबको समान शिक्षा न देने की व्यवस्था के कारण यह सब हो रहा है.
उदारीकरण ने शिक्षा का बहुत बड़ा बाजार खड़ा कर दिया है. कहा जा रहा है कि जिसके पास जितना पैसा है, उसे उतनी शिक्षा मिलेगी. कोई भी निम्न आय वर्ग का परिवार किसी निजी स्कूल में अपने दो बच्चों की पढ़ाई का खर्च वहन कर ही नहीं सकता है.
जितनी तेजी से निजी स्कूल खड़े हुए हैं, उतनी ही तेजी से कोचिंग संस्थान भी पैदा हुए हैं. जब दसवीं या बारहवीं के बाद कोचिंग ही जाना है, तो फिर गुणवत्ता कैसी? शिक्षा का यह व्यवसायीकरण आम नागरिकों को शिक्षा से बाहर कर रहा है.
केंद्रीय विश्वविद्यालयों को भी अब अनुदान की जगह ऋण लेने के लिए और खुद से फंड जुटाने के लिए दबाव डाला जा रहा है. इसके लिए हायर एजुकेशन फंडिंग एजेंसी (एचइएफए) का गठन किया गया है.
इन सबका सीधा असर समाज के आम नागरिकों पर पड़ेगा. इससे न केवल फंड जुटाने के लिए छात्रों की फीस में बढ़ोतरी की जा रही है, बल्कि मानविकी और सामान्य विज्ञान जैसे विषय को भी विश्वविद्यालयों से बाहर करने की योजना चल रही है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है.
ऐसे में इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला उम्मीद देता है कि इसे न सिर्फ प्राथमिक स्तर पर, बल्कि उच्च शिक्षाओं में भी पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए. शिक्षाविदों का मानना है कि बिना सामाजिक भागीदारी के शिक्षा को बाजार के चंगुल से नहीं निकाला जा सकता. शिक्षा अधिकार के कानून के बावजूद शिक्षा के लिए बड़ी लड़ाई बाकी है.
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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