हिंदी प्रदेशों के सांसदों का महत्व

Updated at : 17 Dec 2018 6:56 AM (IST)
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हिंदी प्रदेशों के सांसदों का महत्व

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार ravibhushan1408@gmail.com लोकसभा में निर्वाचित सांसदों की संख्या 543 है, जिनमें 225 सांसद हिंदी प्रदेशों (बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली) के हैं. मैं लगभग बीस वर्ष से यह लिखता-कहता रहा हूं कि भारतीय राजनीति में हिंदी प्रदेश अपनी सांसद-संख्या के कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं. […]

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रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार

ravibhushan1408@gmail.com

लोकसभा में निर्वाचित सांसदों की संख्या 543 है, जिनमें 225 सांसद हिंदी प्रदेशों (बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली) के हैं.

मैं लगभग बीस वर्ष से यह लिखता-कहता रहा हूं कि भारतीय राजनीति में हिंदी प्रदेश अपनी सांसद-संख्या के कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं. साल 1967, 1977, 1989 और 2004 के लोकसभा चुनाव में हिंदी प्रदेश की भूमिका सर्व प्रमुख रही है.

स्वतंत्र भारत के आरंभिक दशकों में इस क्षेत्र पर कांग्रेस का वर्चस्व था. बिहार और उत्तर प्रदेश में कुछ समय तक वामपंथियों (कम्युनिस्टों और समाजवादियों) की भी भूमिका रही, जो बाद में समाप्त हुई. हिंदी क्षेत्र का राजनीतिक परिदृश्य मुख्यत: मंडल-कमंडल की राजनीति के बाद बदला.

जिस प्रकार अंग्रेजों ने 1857 के बाद मुख्य रूप से विभाजनकारी नीति अपनायी, उसी प्रकार कुछ हेर-फेर के साथ स्वतंत्र भारत के राजनीतिक दलों ने भी जनता को बांटकर शासन करने का तरीका कायम रखा. साल 1977 में इंदिरा गांधी को हिंदी प्रदेश ने ही सत्ताच्युत किया था और यहां की उदारमना, भावुक जनता ने पुन: उन्हें 1980 में सत्ता पर बिठा दिया. वर्ष 1984 में भाजपा को जो दो सीट मिली थी, उसमें से एक भी सीट हिंदी प्रदेश की नहीं थी. पिछले लोकसभा चुनाव (2014) में भाजपा को कुल 282 सीट मिली थी, जिसमें 185 सीट हिंदी प्रदेश की थी.

हिंदी प्रदेश के बाहर भाजपा को मात्र 97 सीट प्राप्त हुई थी. भाजपा और हिंदुत्व के पहले ‘मार्गदर्शक’ लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा की थी. वे हिंदी प्रदेश के नहीं हैं. नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की थी. बनारस उनका संसदीय क्षेत्र है, पर वे भी हिंदी प्रदेश के नहीं हैं.

भारत में मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल सात हैं- कांग्रेस, भाजपा, भाकपा, माकपा, बसपा, राकांपा और तृणमूल कांग्रेस. इनके अलावा सभी राज्यों में क्षेत्रीय दल हैं, जो संख्या में कम नहीं हैं, पर प्रभावशाली भूमिका में प्रत्येक हिंदी राज्य में क्षेत्रीय दलों की संख्या 4-5 से अधिक नहीं है.

बिहार में राजद, जदयू, लोजपा, रालोसपा, झारखंड में झामुमो, आजसू, झाविमो, उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा, अपना दल (सोनेलाल), रालोद, हरियाणा में भारालोद प्रमुख दल है. छत्तीसगढ़ में अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जकांछ) का क्षेत्र सीमित है, पर वह बसपा से मिलकर विधानसभा चुनाव में 7 सीट जीती है.

जहां तक हिंदी प्रदेश के क्षेत्रीय दलों का प्रश्न है, राजद, सपा, बसपा, रालोसपा, भारालोद, झामुमो, आजसू, झाविमो, अपना दल, जकांछ, रालोद प्रमुख हैं. तीन हिंदी राज्यों- बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय दल की विशेष प्रभावशाली भूमिका है. हरियाणा मेें भीतरी उठापटक के बाद भी भारालोद प्रभावशाली है. सर्वाधिक निर्णायक भूमिका उत्तर प्रदेश की है, जहां के निर्वाचित सांसदों की संख्या 80 है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां से 71 सीटें मिली थीं.

कांग्रेस-सपा-बसपा का गठबंधन बनने के बाद भाजपा को मुश्किल से यहां से 30 सीटें प्राप्त होंगी. फूलपुर, गोरखपुर और कैराना लोकसभा का उपचुनाव भाजपा हार चुकी है. तेरह लाेकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा आठ में हारी है, जिनमें हिंदी प्रदेश की छह सीट है- उत्तर प्रदेश की तीन सीट को छोड़कर मध्य प्रदेश की रतलाम और राजस्थान की अजमेर और अलवर सीट. लोकसभा में पहले भाजपा को बहुमत से 10 सीट अधिक थी, अब मात्र एक सीट अधिक रह गयी है.

हिंदी प्रदेश चुनावी दृष्टि से समर-क्षेत्र है. छत्तीसगढ़, मध्य-प्रदेश और राजस्थान विधानसभा के चुनावी-परिणाम इस प्रदेश के गंभीर मूल्यांकन की मांग करते हैं.

ये तीनों राज्य भाजपा के थे और अब वहां कांग्रेस का शासन है. इन तीनों राज्यों में लोकसभा की कुल 65 सीटें हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मात्र 3 सीटें मिली थीं और अब अगले चुनाव में इन तीन राज्यों में भाजपा को 30 से अधिक सीटें शायद ही मिलें.

उत्तर प्रदेश की 80, बिहार की 40, झारखंड की 14, हरियाणा की 10, दिल्ली की 7, उत्तराखंड की 5 और हिमाचल प्रदेश की 4 लोकसभा सीटों पर भी पूर्व की स्थिति नहीं रहेगी. तीन राज्यों के चुनाव-परिणामों से सभी राजनीतिक दलों को सीखने-समझने की जरूरत है. मतदाताओं को लंबे समय तक ठगा नहीं जा सकता.

हिंदी प्रदेश के क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस को भी पुनर्विचार करना होगा. बसपा को पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी. झारखंड में भाजपा के 12 और झामुमो के मात्र 2 सांसद हैं.

पुराने मिजाज से आगामी लोकसभा चुनाव लड़ना सभी दलों के लिए आत्मघाती होगा. एक नयी राजनीतिक शैली विकसित करनी होगी. कांग्रेस को झुकना होगा और सीट-संख्या को लेकर क्षेत्रीय दलों का अड़ना और आपस में लड़ना उनके लिए नुकसानदेह होगा. किसी राजनीतिक दल में 225 के महत्व को झुठलाने की शक्ति नहीं है. सत्ता लोलुपता बढ़ने से लोकतंत्र लहूलुहान होता है. कांग्रेस 44 सीटों पर सिमटेगी, क्या किसी ने सोचा था?

परिपक्व दृष्टि से वह अब 100 की संख्या पार कर सकती है और भाजपा को जिस हिंदी प्रदेश में 185 सीटें प्राप्त हुई थीं, वह सिमटकर 100 तक आ सकती है. चुनाव परिणामों से राजनीतिक दल कुछ सीखने को तैयार हैं या नहीं, यह आनेवाले दिनों में पता चलेगा. कुल 543 में 225 का महत्व कल भी रहेगा.

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