कृषि को उबारना ही होगा
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 28 Nov 2018 12:36 AM
अजीत रानाडे सीनियर फेलो, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन editor@thebillionpress.org अक्तूबर माह के लिए मुद्रास्फीति की दर 3.1 प्रतिशत प्रतिवेदित की गयी, जो पिछले एक वर्ष के दौरान न्यूनतम थी. यह एक बड़ी राहत थी, क्योंकि एक माह पहले ही ऐसी आशंकाएं थीं कि ईरान पर लगाये जानेवाले अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल […]
अजीत रानाडे
सीनियर फेलो, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन
editor@thebillionpress.org
अक्तूबर माह के लिए मुद्रास्फीति की दर 3.1 प्रतिशत प्रतिवेदित की गयी, जो पिछले एक वर्ष के दौरान न्यूनतम थी. यह एक बड़ी राहत थी, क्योंकि एक माह पहले ही ऐसी आशंकाएं थीं कि ईरान पर लगाये जानेवाले अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरेल तक पहुंच जायेंगी. पर अगले चार सप्ताहों के दौरान तेल की कीमतें लगभग 30 प्रतिशत घटकर वर्तमान में 60 डॉलर प्रति बैरेल से भी कम हो गयीं.
तेल की कीमतों में यह गिरावट भारत के लिए वरदान बन कर आयी, क्योंकि उनमें प्रति एक डॉलर की कमी से भारत को प्रतिवर्ष 1.4 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा की बचत होती है. हाल ही आयी यह कमी यदि बनी रही, तो हमारी कुल बचत का अंदाजा लगाया जा सकता है.
इसने डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर में भी स्थिरता ला दी है, क्योंकि अभी यह 72 पर रुकी हुई है, जबकि इसके और सुधरने की संभावनाएं भी हैं.
मुद्रास्फीति और तेल की कीमतों में आयी यह न्यूनता चौतरफा राहत ले आयी, क्योंकि यह राजकोषीय घाटे और चालू खाते के घाटे के अलावा रुपये एवं ब्याज दरों के लिए भी आशाजनक है. गौर करने की बात यह है कि मुद्रास्फीति की दर में भारी कमी की वजह खाद्य मुद्रास्फीति में आयी कमी है, जो नकारात्मक हो चुकी है. सब्जियों तथा फलों की कीमतों में भारी कमी आयी है.
अहमदनगर मंडी के एक वायरल बने वीडियो में एक किसान को अनार की अपनी उपज निराशा से नष्ट करते हुए दिखाया गया है, क्योंकि वे 10 रुपये किलो की दर पर भी नहीं बिक सके. इस वीडियो में न सिर्फ उस किसान की पीड़ा साफ तौर पर प्रकट हो पा रही थी, बल्कि उसमें मुंबई और दिल्ली की बाजारों में वही अनार 100 रुपये किलो बिकते भी देखे जा सकते थे.
यही इस समस्या का मूल बिंदु है. प्याज को भी यही रोग लगा है. खरीफ फसलों के अंतर्गत 1420 लाख टन की जोरदार उपज हुई है. इस बार चावल, गेहूं तथा चीनी की भी अतिरिक्त आपूर्ति हुई है. भारत इस वर्ष विश्व में चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक बन जायेगा.
यदि हम चीनी का निर्यात करने की कोशिश करें, तो भी हमें अच्छी कीमतें नहीं मिल सकेंगी. दालों की दृष्टि से परिस्थितियां संतोषजनक हैं, पर तेलहनों के लिए तो भारत अभी भी एक प्रमुख आयातक बना ही हुआ है.
न्यूनतम समर्थन मूल्यों (एमएसपी) की नीति से यह अपेक्षा की गयी थी कि किसानों को मदद मिलेगी तथा कीमतें लागत से कम से कम पचास प्रतिशत ऊंची रखी जा सकेंगी. पर यह उपज की मात्रा को लेकर भी भरोसेमंद होने की जगह केवल एक मूल्य गारंटी बन कर रह गयी.
यदि एमएसपी के अंतर्गत उपज की अधिप्राप्ति बहुत कम हो, तो फिर उसका कुल असर भी नगण्य ही हो जाता है. ऐसी परिस्थिति में अधिकतर कृषि उपजों का बाजार भाव निम्न बना रहता है, जो अक्तूबर के नकारात्मक खाद्य मुद्रास्फीति से साफ है. कई उपजों के लिए ये बाजार भाव इसी तरह निम्न बने रहेंगे, हालांकि कपास तथा चीनी में कुछ सुधार संभव है.निम्न खाद्य मुद्रास्फीति शहरी उपभोक्ताओं को राहत देते हुए किसानों के लिए मुसीबत बन जाती है. कृषि संकट पहले ही से गहरा है.
महाराष्ट्र, गुजरात तथा कर्नाटक समेत देश के कई हिस्सों में कम बारिश हुई है. रबी बुआई का वक्त आ गया है, मगर अधिकांश फसलों की बुआई का रकबा बहुत कम है, जिसकी एक वजह किसानों की कम आय भी है. ये सारे संकेत शुभ नहीं हैं, जिनके नतीजे गर्मी के महीनों में शहरों की ओर कृषि श्रमबल के अधिक प्रवासन में भी दिख सकते हैं. मई में आम चुनाव होने वाले हैं, जिनमें गिरती ग्रामीण आय एक प्रमुख मुद्दा बन सकती है.
निम्न आय, निम्न उत्पादकता एवं श्रमबल का बाहुल्य जैसी कृषि समस्याओं के समाधान कृषि क्षेत्र के बाहर ही स्थित हैं. जब विनिर्माण, निर्माण, वस्त्र तथा पर्यटन जैसे क्षेत्र तेजी से विकासशील हों, तो वे कृषि से श्रमबल को अपनी ओर खींच सकने में समर्थ होते हैं.
यह प्रक्रिया एक बड़े पैमाने पर संपन्न हो, तभी इस संकट का हल निकल सकेगा. विश्व बैंक की एक हालिया रिपोर्ट यह बताती है कि पिछले बीस वर्षों के दौरान कई पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में कुल रोजगार के हिस्से के रूप में औद्योगिक रोजगार दोगुने हो गये.
भारत में यह मौका पहले तो गंवाया जा चुका है, पर यह अभी भी मौजूद है. किंतु भारतीय समाज को उद्योगों एवं कृषि, अथवा अधिक प्रासंगिक रूप में, शहरी खाद्य उपभोक्ताओं तथा किसान उत्पादकों के बीच व्यापार की शर्तें पुनर्भाषित करनी होंगी. कृषि को लाभप्रद बनाये रखने के लिए खाद्य मुद्रास्फीति की कुछ मात्रा अपरिहार्य होगी.
जैसा अनार वाले वीडियो ने बखूबी दर्शाया, यह सही है कि आपूर्ति श्रृंखला में भी कई अकुशलताएं हैं, जिन्हें दूर लिए जाने के बाद उपभोक्ताओं द्वारा चुकायी गयी अंतिम कीमतों का एक बड़ा हिस्सा खुद किसानों की जेबों में जा सकेगा. पर जब तक ऐसा नहीं होता, हमें कुछ ऊंची खाद्य मुद्रास्फीति स्वयं के लिए अधिक स्वीकार्य बनानी ही होगी.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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