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बदलते समय का संकेत ‘मीटू’

Updated at : 25 Oct 2018 12:38 AM (IST)
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बदलते समय का संकेत ‘मीटू’

मृणाल पांडे ग्रुप सीनियर एडिटोरियल एडवाइजर, नेशनल हेराल्ड mrinal.pande@gmail.com वरिष्ठ कामकाजी महिलाओं का भारतीय दफ्तरों में बड़े-बड़े ओहदों पर काबिज यौन उत्पीड़कों को बेनकाब करने का निडर ‘मीटू अभियान’ अब जिस तरह मीडिया से लेकर राजनीति तक को लपेटे में ले रहा है, वह बदलते समय का संकेत है. एक क्षण आता है, जब बात […]

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मृणाल पांडे
ग्रुप सीनियर एडिटोरियल
एडवाइजर, नेशनल हेराल्ड
mrinal.pande@gmail.com
वरिष्ठ कामकाजी महिलाओं का भारतीय दफ्तरों में बड़े-बड़े ओहदों पर काबिज यौन उत्पीड़कों को बेनकाब करने का निडर ‘मीटू अभियान’ अब जिस तरह मीडिया से लेकर राजनीति तक को लपेटे में ले रहा है, वह बदलते समय का संकेत है. एक क्षण आता है, जब बात बर्दाश्त से बाहर हो जाती है.
दर्जनों वरिष्ठ सम्मानित महिला मीडियाकर्मी जिस तरह निजी साक्ष्य देकर आज अपने भोगे यथार्थ के खुले ब्योरे बता रही हैं, उनसे किसी भी राज-समाज का माथा शर्म से झुकना ही चाहिए. निर्भया मामले के उजास में अब इसे सोशल मीडिया का फितूर या आत्मप्रचार का हथकंडा कहकर टाला या खिसियाये झूठमूठ के साथ ‘भारत में ऐसा हो ही नहीं सकता’, कहकर खारिज नहीं किया जा सकता.
आजादी के बाद अगर सबसे अधिक विकास कहीं दिखता है, तो हमारे शहरी मध्यवर्ग में. इसके सुफल महिलाओं की झोली में भी जाते रहे हैं. खुली सोच वाले परिवारों की महिलाओं को सत्तर के दशक तक घर की चहारदीवारी से बाहर आकर मनचाहे क्षेत्र में काम करने की आजादी भी पहली बार मिली. उस पीढ़ी के पास पूर्ववर्ती रोल मॉडल बहुत कम थे.
मेरी तरह ही मध्यवर्ग की पढ़ी-लिखी लड़कियों की वह पहली जमात थी, जिसने तमाम कड़वे-मीठे अनुभवों के साथ उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ाने से लेकर मीडिया तक हर क्षेत्र में काम किया, पैठ बनायी और अपनी मेहनत व हुनर से उच्चतम पदों पर पहुंचीं. यही प्रक्रिया बैंकिंग, सेवा क्षेत्र, डिजिटल तकनीकी तथा प्रशासकीय सेवाओं जैसे अन्य क्षेत्रों में भी हुई. इसका फायदा परवर्ती पीढ़ियों को मिला.
इसीलिए कार्यक्षेत्र में नयी शहरी महिला कर्मियों की मांगों का दायरा अब पहले की तरह समान वेतन, महिला शौचालय या क्रेश सुविधा पाना नहीं. अब वे महिलाओं की कामकाजी जिंदगी के सबसे बड़े, पर अब तक अनकहे सच को शेरदिल बनकर सामने ले आयी हैं, जो उनके काम, तरक्की और तन-मन को दीमक की तरह कुतरता आया है.
पुरुषों की छेड़छाड़, पुरुष सहकर्मियों द्वारा अपने शरीर या कपड़ों पर शर्मसार करनेवाले चुटकुले सुनने को बाध्य होना या मीटिंग्स में उनकी दबंगई को अब तक महिलाओं ने तो बर्दाश्त किया, पर परिवार समर्थित और सोशल मीडिया की मार्फत पुरुष दबंगई और यौन दबावों पर महिलाओं के सशक्त पलटवार से वाकिफ आज की भारतीय ‘मीटू’ पीढ़ी चुप्पी नहीं साधती. वह नाम लो और शर्मिंदा करो (नेम एंड शेम) की पक्षपाती है.
शहर से गांव तक, घरों या कार्यक्षेत्रों में बच्चियों और युवतियों का यौन उत्पीड़न होता है, यह बात वह कई बार खुद मौका-ए-वारदात पर जाकर रिपोर्ट करती रही है. उसने वहां का महिला विरोधी वातावरण और नेताओं के ‘लड़के हैं, माफ कर दो’ जैसा दोमुंहापन भी काफी उजागर किया है.
पुरुष लेखक या रिपोर्टरों से एक कदम आगे जाकर वे बता रही हैं कि जिसका उत्पीड़न किया जाता है. किस तरह एक नादान मीडिया प्रशिक्षु बनकर किसी बड़े अखबार में जाने के बाद वहां के वरिष्ठतम पुरुष पहले उनका भरोसा जीतते हैं, फिर अकेले में बुलाकर डराकर या शर्मसार कर उनका यौन उत्पीड़न करते हैं. ऐसी घटनाओं से किस तरह वे खुद अपने वजूद और शरीर से घृणा करने को बाध्य हो जाती हैं, यह बात पिछले दिनों दर्जनों महिलाओं ने खुलकर बतायी है.
इन बयानों से गुजरना गहराई से हमारी अंतरात्मा को झकझोरनेवाला होना चाहिए. लेकिन, जहां आम नागरिक इन बेबाक उद्घाटनों से पहली बार यौन-भेदभाव के सबसे घिनौने सच से रूबरू हुए हैं, वहीं ताकतवर उत्पीड़क हमेशा की तरह शक का फायदा उठाने की फिराक में हैं, और युवतियों को कोर्ट में घसीटने की धमकियां देने पर उतारू हैं.
तीन बातों से समझदार न्यायप्रिय लोगों को काफी चुभन महसूस हो रही है. एक, अगर हम लगातार महिलाओं को अच्छी शिक्षा देकर उन्हें पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करने का सपना दिखाते हैं, तो फिर इसकी भी पूरी जिम्मेदारी राज-समाज पर है कि कार्यक्षेत्र में युवतियों के शोषण की हर शिकायत को, अगर वे यौन उत्पीड़न से जुड़ी हों, निर्भया कांड के बाद वर्मा कमिटी के सुझावों पर संशोधित यौन उत्पीड़न निरोधी कानूनों के उजास में परखा जाये, ताकि उत्पीड़ित को तुरंत न्याय मिले.
दूसरे, राजनीतिक स्पर्धा और चुनावी प्रचार को ढाल बनाकर अपने लिए शर्मिंदगी पैदा करनेवाले किसी भी मामले को राजनीतिक शत्रुता के तहत रचा गया षड्यंत्र बताना बंद हो. तीसरे, सारा ठीकरा मीडिया के सिर पर फोड़ते हुए इसे टीआरपी बढ़ाने का हथकंडा या सोशल मीडिया में पैठे ट्रोल्स का काला कारनामा बताकर रफा-दफा न किया जाये. ये तीनों बातें आपस में जुड़ी हैं, और सिर्फ समझदारों की चिंता या सार्वजनिक प्रदर्शनों से स्थिति का कोई तसल्लीबख्श हल नहीं निकल सकता.
संसद में विपक्ष से जूझनेवाली स्मृति ईरानी या निर्मला सीतारमण सरीखी ताकतवर मंत्रियों की तुलना में यहां महिला बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी इस सरकार की संवेदनशील महिला मंत्रियों में से एक साबित हुई हैं. उन्होंने क्षोभ जताते हुए कहा कि वे अपनी आपबीती खुलकर बयान करनेवाली युवा लड़कियों के साहस की दाद देती हैं.
उनकी तरफ से केंद्र सरकार को सुझाव भेजा गया कि एक चार जजोंवाली समिति इन मामलों की खुली सुनवाई करे और उनके मंत्रालय को सुझाव दे कि इन तकलीफों का स्थायी निराकरण कैसे हो. लेकिन, इस समिति में कौन-कौन हो, इसके पहले यह खोजना जरूरी है कि न्यायपालिका के साथ रिश्तों को लेकर इस सरकार की अपनी छवि कैसी रही है? कानून का अंकुश प्रभावी बना रहे, इसके लिए राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र में पवित्र आचरणों का पालन जरूरी है. इनमें से एक है कि जिस भी मंत्री पर घृणित आरोप लगे हों, राजनीतिक दुर्भावना की चिंदी सामने रखकर उसका बचाव न किया जाये.
उत्पीड़ित महिलाओं के सवालों के अभी कोई निश्चित उत्तर नहीं हैं. लेकिन, एक बात साफ है कि कार्यक्षेत्र में यौन उत्पीड़न पर संस्थागत और सरकारी दोनों ही तरीके से रोक लगानी जरूरी है. यहां मीडिया की तारीफ करनी होगी कि वह पुरुष आधिपत्यवाला और कनफटा भले दिखता हो, पर अधिकतर जिम्मेदार संस्थान प्रमुखों ने खुलकर महिलाओं का पक्ष लिया है और आरोपितों को तत्काल प्रभाव से भीतरी सुनवाई के बाद फैसला आने तक पदमुक्त कर दिया है. उनका न्यायबोध वेतनभोगी सरकारी लोगों से तो कहीं अधिक प्रामाणिक है. इसके बाद भी सामान्यत: चबर-चबर बोलनेवाले सत्तारूढ़ राजनेता मौकापरस्त चुप्पी बनाये रखें, तो उनको खुद को जनमत का बेहतर प्रवक्ता मानने का कोई हक नहीं रह जाता.
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