यौन शोषण के विरुद्ध

Updated at : 10 Oct 2018 6:11 AM (IST)
विज्ञापन
यौन शोषण के विरुद्ध

अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस इंसाफ की राह में उठाया गया शुरुआती कदम होता है. इस आवाज को मिलनेवाले समर्थन से तय होता है कि समाज कितना इंसाफ पसंद है. कार्यस्थल पर यौन-उत्पीड़न का अनुभव करनेवाली महिलाओं की एक बड़ी आबादी सामाजिक लांछन और अन्य आशंकाओं से चुप रहती आयी है, लेकिन अब […]

विज्ञापन

अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस इंसाफ की राह में उठाया गया शुरुआती कदम होता है. इस आवाज को मिलनेवाले समर्थन से तय होता है कि समाज कितना इंसाफ पसंद है.

कार्यस्थल पर यौन-उत्पीड़न का अनुभव करनेवाली महिलाओं की एक बड़ी आबादी सामाजिक लांछन और अन्य आशंकाओं से चुप रहती आयी है, लेकिन अब मुखरता का दौर है और इससे लैंगिक समानता की दिशा में संभावनाओं के नये द्वार खुल रहे हैं. भारत में कई महिलाएं ‘मी टू’ अभियान के तहत अपने अनुभव सार्वजनिक कर रही हैं तथा वैसे लोगों का नाम बता रही हैं, जिन्होंने उनके साथ आपराधिक कृत्य किया है.

अच्छी बात है कि अनेक मामलों में पुलिस तंत्र ने भी पीड़ितों का साथ देने की पहल की है. पिछले साल अक्तूबर में भारतीय विश्वविद्यालयों के प्रतिष्ठित विद्वानों पर इंटरनेट के जरिये महिलाओं ने दुर्व्यवहार और उत्पीड़न के आरोप लगाये थे. बीते दिनों पूर्व अभिनेत्री तनुश्री ने अभिनेता नाना पाटेकर को नामजद किया, तो इससे बड़ी तादाद में महिलाओं को अपनी आपबीती रखने का साहस मिला. इससे लैंगिक समानता के मौजूदा इंतजामों तथा यौन-दुर्व्यवहार रोकने के कानूनों को ज्यादा संवेदनशील और पीड़ित-पक्षधर बनाने की मांग भी उठी है.

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने एक जरूरी उपाय की तरफ ध्यान दिलाया है कि पीड़ित के लिए तय समय सीमा के भीतर ही यौन-दुर्व्यवहार की शिकायत करने जैसी पाबंदी नहीं होनी चाहिए, जैसा कि मौजूदा कानून में प्रावधान है.

कार्यस्थल पर यौन-उत्पीड़न को रोकने के लिए 1997 में दिये गये सर्वोच्च न्यायालय के ‘विशाखा निर्णय’ के निर्देशों को भी समुचित संवेदनशीलता के साथ लागू करने की बात उठी है. बीते मई में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक सुनवाई के दौरान कहा था कि उन निर्देशों का गंभीरता से पालन होना चाहिए, न कि एक कर्मकांड की तरह. उन्हीं निर्देशों के आधार पर दिसंबर, 2013 में एक विशेष कानून ‘महिला यौन उत्पीड़न (निरोधक) अधिनियम’ के नाम से बना था.

इसका उद्देश्य सरकारी और निजी दफ्तरों एवं कार्यस्थलों पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकने तथा उनके लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने का था. दुर्भाग्य है कि उत्पीड़न और शोषण के अपराधों की बढ़ती संख्या के बावजूद संस्थाओं में इस कानून को ठीक से लागू करने की कोई व्यवस्था नहीं बन पायी है.

इस संबंध में उत्तरदायित्व और पालन के स्तर का निर्धारण भी शेष है. लैंगिक समानता और न्याय के लिए दीर्घकालिक प्रयास जरूरी हैं. समाज में जागरूकता के साथ सांस्थानिक प्रणाली की व्यापकता को सुनिश्चित करने की महती चुनौती है.

विषमता, पूर्वाग्रह और पितृसत्ता से मुक्ति के बिना एक सक्षम, समृद्ध और सुखी देश का निर्माण असंभव है. इसके लिए महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की गारंटी के हरसंभव प्रयास किये जाने चाहिए. मौजूदा अभियान सरकारों, संस्थानों और समाज के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है.

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola