कार का रोमांटिक विज्ञापन
Author Prabhat khabar digital desk
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संतोष उत्सुक व्यंग्यकार [email protected] कुछ दिनों से लाजवाब कारों के गजब विज्ञापन देखने को मिल रहे हैं. सड़कों के किनारे, बाजारों में पैदल चलना वाकई हिम्मत का काम हो चला है, पैदल चलने के लिए कोई प्रेरक विज्ञापन नहीं आता. पिछले दिनों एक नयी कार का ‘रोमांटिक’ विज्ञापन देखने का अवसर मिला. विज्ञापन की टैगलाइन […]
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संतोष उत्सुक
व्यंग्यकार
कुछ दिनों से लाजवाब कारों के गजब विज्ञापन देखने को मिल रहे हैं. सड़कों के किनारे, बाजारों में पैदल चलना वाकई हिम्मत का काम हो चला है, पैदल चलने के लिए कोई प्रेरक विज्ञापन नहीं आता.
पिछले दिनों एक नयी कार का ‘रोमांटिक’ विज्ञापन देखने का अवसर मिला. विज्ञापन की टैगलाइन है- ‘द आल स्मूद, आल सेक्सी सिविटी’.
विज्ञापन में कार की खूबियां बखान करते हुए उकसाया गया है- ‘सी सेक्सी इन ए न्यू लाइट’. हर शब्द की तरह इस शब्द के भी कई अर्थ हैं. सही कहा गया है कि किसी चीज पर खास कोण से रोशनी डालने से उसका प्रभाव बदल जाता है.
दिवाली के विज्ञापन अब शुरू हो चुके हैं. कार खरीदने पर लंदन व पेरिस का पेड लक्की ट्रिप भी है. कार खरीदने और चलाने में सौ जहमतें हैं, इसलिए ऐसे विज्ञापन पढ़ने में जो सुरक्षित मजा है, वह कार चलाने में कहां.
कार को सेक्सी बताना नया, मुहब्बत भरा अनुभव लगा. इधर डिजाइनर वस्त्रों को भी आभामंडित किया जाता रहा है कि उन्हें पहननेवाले सेक्सी लगेंगे. पहले यह बात महिलाओं पर लागू होती थी, अब पुरुषों पर भी समान प्रभाव से लागू होने लगी है. सेक्सी लगने के लिए फेशियल क्रीम ही नहीं, कई दूसरे फाॅर्मूले भी प्रयोग में आने लगे हैं. यह निरंतर विकासजी की महिमा है कि सेक्सी कार भी बाजार की रौनक बना दी गयी है.
सख्त कानून ईमानदारी व सख्ती से लागू करने से भी ऐसा कोई आकर्षण अब तक पैदा नहीं हुआ कि लोग अपनी वासनात्मक भूख को खेल, धार्मिक, आध्यात्मिक रास्ते पर ले जाने के प्रयास करें. बरसों तक, धर्म स्थलों में रहकर, धार्मिक वस्त्र पहनकर भी यह भूख जवान रहती है.
हमें लगता है कंडोम के विज्ञापन सुबह से रात तक न दिखाने से नयी सोच उगेगी. सेंसर बोर्ड की कैंची को अंगूठा दिखानेवाले कई विज्ञापन आ गये हैं, जहां सब के लिए एक खुला आसमान है.
यूटयूब है और पूर्णतया डिजिटल होता देश भी है. यह खुले रास्ते मनोरंजन कम, इच्छाएं जवान करने के बीहड़ ज्यादा हैं.हमारे यहां जो चीज बैन है, वही उपलब्ध है. चिकित्सक ही बताते हैं कि जिंदगी को सहज रूप से जीने के लिए ‘काम’ आवश्यक है, तो फिर कोई और क्रिया इसका विकल्प कैसे हो सकती है. क्या असीम दौलत या ज्यादा खूबसूरती, शरीर की इस कुदरती जरूरत का विकल्प हो सकती है? खजुराहो की मूर्तियां इसलिए बनायी गयी थीं, ताकि भक्ति भाव में आसक्त बंदों का झुकाव पारिवारिक दुनिया की तरफ भी हो.
क्या मानवीय शरीर की जरूरतें बदल गयी हैं या विकसित चिकित्सा सुविधा से बदली जा सकती हैं? मेरी आशा और आशंका दोनों यह कह कहती हैं कि आगामी दौर में हो सकता है कार के इस विज्ञापन से प्रेरित होकर सेक्सी फूड, सेक्सी बर्तन, सेक्सी जूते, सेक्सी वाशिंग मशीन या सेक्सी फ्रीज वगैरह भी भारतीय बाजार में पेश कर दिये जायें.
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