राजनीति में नहीं आपदा का हल

Updated at : 23 Aug 2018 6:06 AM (IST)
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राजनीति में नहीं आपदा का हल

डॉ अनुज लुगुन सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया anujlugun@cub.ac.in ऐसा माना जा रहा है कि केरल में पिछले सौ वर्षों में ऐसी भीषण बाढ़ नहीं आयी थी. पिछले कई दिनों से केरल बाढ़ में डूबा हुआ है. सैकड़ों लोगों की मृत्यु हुई है और तीन लाख से ज्यादा लोग राहत शिविरों में रहने […]

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डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
anujlugun@cub.ac.in
ऐसा माना जा रहा है कि केरल में पिछले सौ वर्षों में ऐसी भीषण बाढ़ नहीं आयी थी. पिछले कई दिनों से केरल बाढ़ में डूबा हुआ है. सैकड़ों लोगों की मृत्यु हुई है और तीन लाख से ज्यादा लोग राहत शिविरों में रहने के लिए मजबूर हैं. स्थिति सामान्य होने में अभी और कई दिन लगेंगे.
बाढ़ प्राकृतिक आपदा है. बाढ़ पुराने समय से आती रही है. भौगोलिक परिस्थितियां भी इसके लिए जिम्मेदार होती हैं, लेकिन जैसे-जैसे आबादी का घनत्व बढ़ता गया है, इसका रूप विकराल होता गया है.
अब तो बाढ़ की त्रासदी मानव जनित हो गयी है. अर्थात् प्रकृति पर अनावश्यक एवं अति हस्तक्षेप से बाढ़ का रूप और भयावह हो गया है. बाढ़ की स्थिति तब पैदा होती है, जब तेज बारिश से जमा पानी अपने निकास के लिए रास्ता नहीं ढूंढ़ पाता है. कहा जा सकता है कि नदियों का पानी अपने रास्ते से भटककर अराजक हो जाता है, या, बारिश के पानी को नदियों तक उतरने का रास्ता नहीं मिलता है.
जब बाढ़ आती है, तो लोग पानी के उतरने का इंतजार करते हैं. लेकिन पिछले दशकों में जिन भी क्षेत्रों में बाढ़ आयी है, वहां पानी का जमाव बहुत दिनों तक रहा है. इसे बिहार में बाढ़ के उदाहरण से समझा जा सकता है.
विशेषज्ञों के अनुसार 2016 में बिहार में जब बाढ़ आयी थी, तब गंगा नदी में पानी की गति इतनी धीमी थी कि उसे फरक्का तक लगभग चार सौ किलोमीटर की दूरी तय करने में आठ दिन लगे थे, जबकि पानी उतरने में अधिकतम 24 घंटे लगने चाहिए. गंगा नदी की इस धीमी गति की वजह फरक्का बांध है, जिसकी वजह से नदी में गाद जमा हो गया है और नदी उथली होती जा रही है.
नदी के उथला होने और उसकी धीमी गति की वजह से पानी बड़े हिस्सों में फैल जाता है और नदियां अपनी सहायक नदियों के पानी को पीछे धकेल कर रखती है. इससे दो स्थितियां पैदा होती हैं- एक तो यह कि पानी का रास्ता थम जाता है. दूसरा, आबादी के क्षेत्रों में जमा बारिश का पानी वहीं स्थिर हो जाता है. इससे पानी का स्वाभाविक प्रवाह रुक जाता है.
आबादी क्षेत्र में जल के जमाव का बहुत बड़ा कारण बिना रोक-टोक अनियमित कंस्ट्रक्शन और नालियों की सही व्यवस्था का न होना है. हमें इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति की अपनी स्वाभाविक गति होती है और उसके नियमित रास्ते होते हैं.
आबादी के बसने के पहले उस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के अनुसार हवा और पानी के बहाव का रास्ता होता है. लेकिन, अंधाधुंध आबादी के बसने, रियल इस्टेट के बड़े कारोबार इत्यादि ने इन सभी रास्तों को ‘ब्लॉक’ कर दिया है.
पारंपरिक जलस्रोत भी अतिरिक्त पानी को आश्रय देते रहे हैं, जो अब आबादी क्षेत्र से विलुप्त हो गये हैं. इसके साथ ही नालियों की दुर्व्यवस्था संकट को और बढ़ा देती है. लगभग सारे शहरों के नगर निगमों की स्थिति यह है कि जब तक पानी सिर के ऊपर से न निकलने लगे, निगम कर्मचारियों के कान में जूं तक नहीं रेंगते. प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और अवसरवाद प्राकृतिक आपदाओं को और अधिक त्रासद बनाते हैं.
केरल में आयी बाढ़ के संबंध में बीबीसी के साथ हुई एक बातचीत में ‘वाटर मैन’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह ने कहा कि केरल की बाढ़ उसकी 44 नदियों के आंसू हैं.
वे बताते हैं, ‘केरल की सरकार के साथ उन्हें वहां की मृत नदियों को जीवित करने की योजना पर काम करना था, लेकिन वह योजना आगे नहीं बढ़ पायी. नदियों को जीवित करने के लिए उसके क्षेत्र के आतिक्रमण को हटाना ही होगा. वहां से कारखानों और आवासों को हटाना होगा, ताकि नदियों का प्रवाह स्वाभाविक हो. हमने सुख-समृद्धि लानेवाली नदियों को बाढ़ लानेवाली नदियों में बदल दिया है.’
हाल के दिनों में हुई जंगलों की भारी कटाई ने भूस्खलन को भी बढ़ावा दिया है. बाढ़ के साथ भूस्खलन जटिल समस्या है. यह न केवल राहत कार्य में बाधा पैदा करता है, बल्कि इससे भविष्य में पर्यावरण संबंधी दिक्कतें होने लगती हैं. साल 2013 में उत्तराखंड में बाढ़ से जो भीषण तबाही हुई थी, उसकी वजह मंदाकिनी नदी में किया गया अतिक्रमण और भूस्खलन ही था.
आज नदियों के क्षेत्र से अतिक्रमण हटाना और जंगलों की कटाई रोकना बहुत बड़ी राजनीतिक चुनौती है. केरल में विपक्ष ने आरोप लागते हुए कहा कि बांध के पानी को बिना सूचना के तत्काल छोड़ा गया.
ये सब राजनीतिक बहसें हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं को केवल राजनीतिक तरीके से हल नहीं किया जा सकता. इसके लिए जरूरी है प्रकृति की संवेदना को समझना और उससे जुड़ाव. हमने अपनी सुविधा के लिए बांध तो बना दिये, लेकिन बांधों ने प्राकृतिक निरंतरता को खत्म कर दिया.
एक रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में अमेरिका ने 72 जलविद्युत परियोजनाओं को बंद कर बांधों को हमेशा के लिए हटा दिया. इस तरह उसने 1912 से 2016 तक सौ वर्षों में 1384 बांधों को हमेशा के लिए हटा दिया है. ऐसा उन्होंने स्थानीय समुदाय के हितों और जैव विविधता के लिए किया.
कहने का अर्थ है कि सत्ता बदलने से आपदा बदल नहीं जायेगी, बल्कि प्रकृति के साथ रिश्ते को ठीक किया जाये. पूरा देश इस भीषण त्रासदी में केरल के साथ खड़ा है. हम सब तत्काल मदद के लिए हाथ बढ़ायें और भविष्य में प्रकृति के साथ अपने रिश्ते के बारे में जरूर मंथन करें.
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