शशि थरूर : ''बीच बहस में''

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 16 Jul 2018 6:27 AM

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रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार ravibhushan1408@gmail.com चरम स्वीकार-अस्वीकार के इस दौर में विचार-बहस, तर्क-वितर्क, संवाद-परिसंवाद के लिए अब बहुत कम जगह बच रही है. भारतीय विश्वविद्यालयों को बौद्धिक बहसों और संवादों से दूर किया जा रहा है. स्वतंत्र-स्वायत्त संस्थाओं में भी पहले की तरह का बौद्धिक वातावरण नहीं है. संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रीढ़ पर प्रहार […]

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रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार

ravibhushan1408@gmail.com

चरम स्वीकार-अस्वीकार के इस दौर में विचार-बहस, तर्क-वितर्क, संवाद-परिसंवाद के लिए अब बहुत कम जगह बच रही है. भारतीय विश्वविद्यालयों को बौद्धिक बहसों और संवादों से दूर किया जा रहा है.

स्वतंत्र-स्वायत्त संस्थाओं में भी पहले की तरह का बौद्धिक वातावरण नहीं है. संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रीढ़ पर प्रहार किया जा रहा है. तर्क और तथ्य को, धैर्य और सहिष्णुता को शोर और हंगामे से खत्म किया जा रहा है. यह माहौल एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए सर्वाधिक हानिकारक और चिंताजनक है.

शशि थरूर ने 11 जुलाई को तिरुअनंतपुरम में ‘इंडियन डेमोक्रेसी एंड सेकुलरिज्म’ पर अपने भाषण में भारत को ‘हिंदू पाकिस्तान’ बनने-बनाने की एक संभावना प्रकट की. पिछले वर्ष ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर सीताराम येचुरी ने अपने भाषण में राज्यसभा में सेकुलर भारत को शक्तिशाली बनाने की बात कही थी, न कि भारत को ‘हिंदू पाकिस्तान’ बनाने की.

‘हिंदू पाकिस्तान’ मुहावरे के प्रयोग का श्रेय सीताराम येचुरी को जाता है. साल 2017-18 के पहले ‘हिंदू पाकिस्तान’ मुहावरे का प्रयोग क्या किसी ने किया था. क्यों नहीं किया था, जबकि 19वीं सदी के अंत से दशकों बाद तक ‘हिंदू राष्ट्र’ का प्रयोग किया जाता रहा है?

सर्वप्रथम 19वीं सदी में राजनारायण बसु (7 सितंबर, 1826- 18 सितंबर, 1899) (अरबिंदो घोष के नाना) ने ‘हिंदू राष्ट्र’ को नींद से जागने की बात कही थी. साल 1899 में ही लाला लाजपत राय (28 जनवरी, 1865-17 नवंबर, 1928) ने हिंदुओं को अपने आप में एक ‘राष्ट्र’ बताया था. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जन्म (1925) के एक वर्ष पहले (1924) में ‘संयुक्त भारत’ की बात न कहकर ‘हिंदू और मुस्लिम इंडिया’ की बात कही थी.

संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार (1 अप्रैल, 1889-21 जून, 1940) के गुरु बालकृष्ण शिवराम मुंजे (12 दिसंबर, 1872-3 मार्च, 1948) ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के दो वर्ष पहले 1923 में स्पष्ट कहा था कि जिस प्रकार इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनी अंग्रेजों, फ्रांसीसियों और जर्मन नागरिकों का देश है, उसी प्रकार भारत हिंदुओं का देश है. इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनी धार्मिक राष्ट्र नहीं हैं, जबकि भारत को धार्मिक राष्ट्र के रूप में देखने का चलन पुराना है.

बीडी ग्राहम ने ‘हिंदू नेशनलिज्म एंड इंडियन पॉलिटिक्स’ (1993, पृष्ठ-11) में नाथूराम गोडसे के ‘हिंदू राष्ट्र दल’ से जुड़े होने की बात कही है. साल 1943 में ‘हिंदू राष्ट्र दल’ के गठन की बात वाल्टर के एंडरसन और श्रीधर डी डामले ने अपनी पुस्तक ‘द ब्रदरहुड इन सैफरन’ (1943) के पृष्ठ 43 पर कही है.

पाकिस्तान का जन्म धार्मिक आधार पर हुआ था. वर्ष 1947 में भारत धार्मिक देश नहीं बना. गांधी और नेहरू के साथ पटेल की भी दृष्टि ऐसी नहीं थी कि भारत हिंदू राष्ट्र बनता. पाकिस्तान भी ‘टेररिस्तान’ बाद में बना है.

धर्म पर आधारित राष्ट्र में बाद में आतंक और हिंसा प्रमुख हो जाती है. गांधी, नेहरू, पटेल, आजाद- किसी ने भी भारत की कल्पना हिंदू राष्ट्र के लिए नहीं की थी. गोलवलकर-सावरकर के विचारों के विरुद्ध उनके विचार थे. स्वतंत्र भारत में धर्म और जाति की राजनीति प्रमुख होती गयी है. आज भारत में हिंदू धर्म की राजनीति प्रमुख है. यह राजनीति धर्मनिरपेक्ष भारत के, भारतीय संविधान और संवैधानिक लोकतंत्र के विरुद्ध है.

आज भारतीय राजनीति के विमर्श में ‘हिंदुत्व’ का एजेंडा प्रमुख है. यह अचानक सामने नहीं आया है. वाजपेयी की सरकार में भाजपा बहुमत में नहीं थी. उस समय ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू राष्ट्र’ का स्वर धीमा था. साल 2014 के चुनाव में भाजपा को बहुमत मिला, तब से यह स्वर कहीं अधिक तीव्र और प्रबल है. आज 20 राज्यों में भाजपा की सरकार है.

आज देश के सभी प्रमुख पदों पर संघ के लोग आसीन हैं. पिछले चार वर्ष के भारत पर देश-विदेश में बार-बार चिंताएं प्रकट की गयी हैं. भाजपा से जुड़े लोगों ने ही ‘अघोषित आपातकाल’ की बात कही है. भीड़ हिंसा, लव जिहाद, घर वापसी से लेकर रसोईघर, शयनकक्ष, बोली-बानी, परिधान- सब पर ताक-झांक ही नहीं की जाती, दखल भी दिया जाता है. इसी वर्ष शशि थरूर ने ‘व्हाई आई एम ए हिंदू’ पुस्तक लिखी. थरूर लेखक-राजनीतिज्ञ हैं. भाजपा के पास ‘विकास’ और ‘हिंदुत्व’ के जो दो एजेंडे (प्रत्यक्ष-परोक्ष) हैं, उन पर संवाद क्यों नहीं होना चाहिए?

येचुरी ने संसद में ‘हिंदू पाकिस्तान’ कहा था. थरूर ने अपने भाषण में ‘हिंदू पाकिस्तान’ की बात कही. उनकी चिंता में भावी भारत है, समावेशी भारत है.

केवल थरूर को नहीं, अनेक भारतीयों को इसकी चिंता है कि भाजपा अगला आम चुनाव (2019) जीतने के बाद देश के संवैधानिक ढांचे में परिवर्तन करेगी. उस स्थिति में भारत अपना सेकुलर रूप खोकर ‘हिंदू पाकिस्तान’ (पाकिस्तान की तरह का धार्मिक राष्ट्र) बन जायेगा.

इस आशंका का खंडन भाजपा यह कहकर कर सकती है कि वह सावरकर-गोलवलकर और संघ के हिंदू राष्ट्र के एजेंडे पर नहीं चलेगी. सरकार उसकी है. वह आश्वस्त कर सकती है कि भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और सदैव बना रहेगा.

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