जीने का तरीका है राजनीति

Published at :23 Apr 2014 4:37 AM (IST)
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जीने का तरीका है राजनीति

।। चंचल।। (सामाजिक कार्यकर्ता) एक बात बताओ वकील साहेब कि जदि हम राजनीति से हटना चाहें तो हमें का करना होगा? लाल्साहेब के बेतुके सवाल ने मन्ना मिसिर की वकालती को ही चुनौती दे दी. मन्ना की खोपड़ी घूम गयी. अदालत में उनके सामने ऐसा सवाल कभी नहीं आया, जिसका जवाब देने में दिमाग ही […]

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।। चंचल।।

(सामाजिक कार्यकर्ता)

एक बात बताओ वकील साहेब कि जदि हम राजनीति से हटना चाहें तो हमें का करना होगा? लाल्साहेब के बेतुके सवाल ने मन्ना मिसिर की वकालती को ही चुनौती दे दी. मन्ना की खोपड़ी घूम गयी. अदालत में उनके सामने ऐसा सवाल कभी नहीं आया, जिसका जवाब देने में दिमाग ही नहीं सब कुछ जड़ से ही हिल जाये.. चीनी तो चलती है न? कोई सुगर-उगर तो ना है? लाल्साहेब के दूसरे सवाल ने मन्ना वकील को कुछ देर के लिए राहत तो दे गयी पर कमबख्त राजनीति हड्डी की तरह फंसी पड़ी है. भाई लाल्साहेब हम मरीज तो ना हैं चीनी जम के मिलाइए. पर एक बात बताओ आपने आज यह सवाल काहे पूछा? लाल्साहेब बोले- वकील साहेब! ई चैत का महीना है न? जदि इस महीने में कोई कजरी गावे लगे तो कैसा लगेगा? मन इहै करेगा न कि निकाले पनही औ दुई पनही उही मुंह देखि के रसीद कर दें. है कि ना? बात वाजिब रही सो मन्ना वकील ने हामी भरी.

ई फसल कटाई क महीना है. साल भर की कमाई समेटना है. कब बारिस आ जाये, पाथर गिर जाये, उसे तो बचाना है न? अब उसी में मुंह उठाये चले आ रहे हैं. कौन है भाई? ई फलां पार्टी है, इन्हें वोट चाहिए. एक गया नहीं कि दूसरा आ पहुंचा.. मन्ना वकील ने असल दिक्कत को पकड़ लिया- देखो भाई, वोट देना ही है, तो जो ठीक लगे उसे दे दो, बस! आप नहीं समझ रहे हैं वकील साहेब! असल दिक्कत है किसे दिया जाये और क्यों उसे ही दिया जाये? वकील साहब बोले- भाई! वोट आपका है, आप जिसे चाहें उसे दें. वोट अब राजनीति नहीं रहा, धर्म बन गया है, और सब को इस धर्म में जीना ही पड़ेगा.

उमर दरजी की आंख गोल हो गयी- ई कोई जबरजस्ती है का भाई? हां है, सुनो कैसे- आपने वोट नहीं दिया. मान लो आप किसी न किसी को तो वोट देते, अगर नहीं दिया तो वह वोट उसके खाते में नहीं गया, लेकिन दूसरे को तो फायदा हो गया न? हम नहीं समङो. उमर दरजी ने तीन बार खोपड़ी झटका लेकिन अकल नहीं खुली. इसी वक्त नाई ने वकील साहेब को आवाज दी और वो उठ कर सैलून की तरफ बढ़ गये.

एक-एक करके सब आ चुके हैं. चिखुरी, मद्दू पत्रकार, नवल उपाधिया, लखन कहार, कीन उपाधिया, प्रिंसिपल, बाकी रेजगारी/ चौराहे की चाय का जायका बनता है बतकही से. और आज की बतकही टेढ़ी हो चुकी है. उसे सीधा कर रहे हैं मद्दू पत्रकार- देखो भाई उमर! हम वकील बाबू को सुन रहे थे. उन्हें तुम समझ नहीं पा रहे थे, क्योंकि वे तुम्हे समझा जरूर रहे थे, लेकिन अपनी भाषा में. हमारी राजनीति में भाषा ने भी बड़ा कमाल किया है. उदाहरण के लिए कम्युनिस्टों को देखो, बात करेगें गरीबों की, मजलूमों की, मजदूरों की, लेकिन उनकी भाषा देखो, ऐसे-ऐसे शब्द झोंकेंगे कि उसे तीसमार तुर्रमखां नहीं समझ सकते, बेचारा अनपढ़ गरीब क्या समङोगा. इसलिए पहले राजनीति समझ लो, राजनीति जिंदगी जीने का तरीका है, लेकिन अकेले का नहीं, पूरे समूह का. और इस समूह में पूरा देश आता है. पूरा देश मिल कर एक सरकार बनाता है. इसे जनतंत्र कहते हैं. खुदमुख्तारी का हक है तुम्हारे पास. तुम केवल वोट नहीं हो सरकार भी हो. यह हक तुम्हें किसने दिया..?

चिखुरी ने सन्नाटा तोड़ा- कांग्रेस ने दिया. बापू ने दिया. सारी दुनिया चौंक गयी थी. इतनी बोली, भाषा, अलग-अलग की जिंदगी जीने का तरीका, तमाम विभिन्नताओं के चलते यह मुल्क कैसे जी लेगा? दुनिया हैरान थी कि यह मुल्क या तो खुद टूट जायेगा या जनतंत्र टूट जायेगा. लेकिन हम दोनों को बचा ले आये हैं. यह हमारी पूंजी है. आज कुछ लोग इस जनतंत्र को तोड़ना चाहते है. कीन को संदेह हुआ- वो कैसे? चिखुरी ने गौर से कीन उपाधिया को निहारा- कीन! तुम्हारी पार्टी को जनतंत्र नहीं पसंद है. वह कहती है, एक देश, एक नेता, एक झंडा, एक तरह के लोग. इसे तानाशाही कहते हैं. मोदी, तोगड़िया, गिरिराज, सिंघल जैसे नेताओं की बातों को गौर से सुनो. एक कह रहा है जो मोदी विरोधी हैं उन्हें इस देश में रहने का अधिकार नहीं है. तुम्हीं बता न कीन, कहां जायेंगे सब?

लाल्साहेब को बल मिल गया-इसीलिए तो हम कही रहे हैं कि अब राजनीति से हट जाने में ही भलाई है. चिखुरी ने डपटा- कहां जाओगे हट कर? इस जनतंत्र को जब कम्युनिस्टों ने स्वीकार कर लिया, संघियों ने स्वीकार कर लिया, मजबूरी में ही सही, तो तुम किस खेत की मूली हो? आज यही लोग इस तंत्र को समाप्त करने पर आमादा हैं. पहले इस तंत्र को बचाओ, फिर जिसको मन आये वोट करना. लेकिन इस चुनाव में उन्हें खारिज करो, जो जनतंत्र को खारिज करके तानाशाही ठोकना चाहते हैं. जनतंत्र हमारा धर्म बन चुका है. डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा है- अल्पकालिक धर्म राजनीति होती है, और दीर्घकालिक राजनीति धर्म. मद्दू ने टुकड़ा जोड़ा- राम उनके लिए राजनीति में थे. जनतंत्र दीर्घकालिक है, इसलिए धर्म है. नवल की खोपड़ी घूमने लगी..

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