तमिलनाडु में मोदी बनाम जयललिता!

Published at :21 Apr 2014 4:32 AM (IST)
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तमिलनाडु में मोदी बनाम जयललिता!

।। आर राजगोपालन।। (वरिष्ठ पत्रकार) भाजपा-अन्नाद्रमुक और दो मुख्यमंत्रियों- नरेंद्र मोदी व जयललिता- के बीच ‘राजनीतिक हनीमून’ क्या खत्म हो गया है? क्यों दोनों एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं? क्यों तमिलनाडु और गुजरात के विकास मॉडल की तुलना की जा रही है? राजनीतिक तौर पर कहें, तो जयललिता और मोदी के बीच छिड़ी […]

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।। आर राजगोपालन।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

भाजपा-अन्नाद्रमुक और दो मुख्यमंत्रियों- नरेंद्र मोदी व जयललिता- के बीच ‘राजनीतिक हनीमून’ क्या खत्म हो गया है? क्यों दोनों एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं? क्यों तमिलनाडु और गुजरात के विकास मॉडल की तुलना की जा रही है? राजनीतिक तौर पर कहें, तो जयललिता और मोदी के बीच छिड़ी जुबानी जंग को रोका नहीं गया, तो राष्ट्रीय राजनीति पर इसका असर पड़ना तय है. मोदी को दो वजहों से जयललिता के समर्थन की जरूरत पड़ेगी. गुजरात और तमिलनाडु ही दो ऐसे राज्य हैं, जो ‘कांग्रेस मुक्त राज्य’ हो सकते हैं. लेकिन जयललिता ने मोदी की आलोचना को गंभीरता से लिया है. मोदी और रजनीकांत की मुलाकात जयललिता को नागवार गुजरी है. मोदी का विजयकांत के साथ समझौता भी जयललिता को नापसंद है. तमिलनाडु में मोदी लोकप्रिय हो रहे हैं और उनकी रैलियों में भीड़ उमड़ रही है. यह जयललिता सहन नहीं कर सकती. इस कारण मोदी को चुनाव के बाद जयललिता का सक्रिय समर्थन मिलना मुश्किल होगा. अन्ना द्रमुक को संसद में 25-30 सीटें मिलने की संभावना है. तो क्या मोदी को जयललिता पर तीखे हमले करने से नहीं बचना चाहिए? जयललिता ने 1990 के दशक के आखिरी वर्षो में राष्ट्रपति को समर्थन की चिट्ठी देने में देरी कर भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी को नाको चने चबवा दिया था. क्या ऐसी स्थिति की आशंका मई, 2014 में भी है, जब जयललिता फिर लुका-छिपी का खेल खेलेंगी. ऐसा हुआ तो इसकी भारी कीमत भारतीय राजनीति को चुकानी होगी.

तमिलनाडु की असली राजनीति इससे अलग है. मोदी ने राज्य में असर डाला है. ‘कांग्रेसमुक्त तमिलनाडु’, ‘यह 24 अप्रैल को होगा’ जैसे जुमले वे तमिलनाडु में अपने भाषणों में इस्तेमाल करते हैं. तमिलों में मोदी की स्वीकार्यता को उनकी रैलियों में उमड़ रही भीड़ से साफ देखा जा सकता है. इसे केंद्र सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजगी का संकेत माना जाना चाहिए. मोदी तमिलनाडु में घर-घर में जाने-पहचाने जाने लगे हैं. सुदूर गांव के लोग भी उनकी भाषण कला को सुनते हैं, जो काफी हद तक करुणानिधि और सीएन अन्नादुरै के ठेठ तमिल भाषणों की तरह है. ऐसा मोदी की वाक्पटुता का करिश्मा है. तमिलनाडु में भाजपा का डीएमडीके, पीएमके और एमडीएमके के साथ गंठबंधन एक मजबूत समूह है. मतों में इन पार्टियों का हिस्सा 2016 में होनेवाले विधानसभा चुनाव के लिए बेहतर निवेश होगा.

जब मोदी रजनीकांत से मिले तो अखबारों ने सुर्खियां बनायी कि ‘तमिलनाडु में मोदी का जबर्दस्त असर’. इसके मद्देनजर जयललिता ने मोदी को निशाना बनाना शुरू कर दिया और दावा किया कि गुजरात मॉडल के आंकड़े तमिलनाडु की उपलब्धियों के सामने कुछ भी नहीं हैं.

करुणानिधि के बेटे एमके अलागिरी खुलेआम कह रहे हैं कि भारत को पांच साल के लिए मोदी की जरूरत है. मोदी वित्त मंत्री पी चिदंबरम को ‘रिकाउंट मिनिस्टर’ कह संबोधित कर रहे हैं और पूर्व पर्यावरण मंत्री के कथित भ्रष्टाचार की तरफ ध्यान दिलाने के लिए उन्होंने एक नया शब्द ‘जयंती टैक्स’ ही गढ़ दिया है. मोदी कुछ चुनिंदा शब्दों के प्रयोग से तमिलनाडु के मतदाताओं को लुभा रहे हैं. नागरकोईल की रैली में, जहां एक दिन पहले सोनिया गांधी ने सभा की थी, मोदी ने कहा कि तमिलनाडु सरकार मछुआरों के हितों की रक्षा करने में नाकाम रही है. उन्होंने कहा कि मैडम (सोनिया गांधी) अम्मा (जयललिता) को दोष देती हैं और अम्मा मैडम को. मोदी इस पर जोर दे रहे है कि भाजपा को भविष्य में तमिलनाडु में जगह बनानी चाहिए. मोदी ने वह हासिल किया है, जो राजीव गांधी 1989 में हासिल नहीं कर पाये थे. वे तमिलनाडु में कांग्रेस के लिए समर्थक और सांगठनिक आधार नहीं बना सके थे.

तमिलनाडु दौरे से एक दिन पहले मोदी ने पांच प्रमुख तमिल टीवी चैनलों से बातचीत की थी, जिसका सीधा प्रसारण किया गया था. यह जयललिता और दूसरे विरोधी द्रमुक नेताओं को परेशान करने के लिए काफी था, क्योंकि मोदी अब छह करोड़ तमिलों के बीच चर्चा का विषय हैं. मोदी जमीनी हकीकत भांप चुके हैं. लोकसभा चुनाव परिणाम मोदी के प्रचार के प्रभाव की पुष्टि करेंगे. राज्य में कांग्रेस का संगठन नहीं है और कार्यकर्ता हतोत्साहित हैं. पहली बार कांग्रेस किसी द्रविड़ पार्टी के बिना चुनाव लड़ रही है. मोदी ने इस जगह पर कब्जा कर लिया है.

करुणानिधि परिवार में फूट के कारण द्रमुक के कार्यकर्ता विभाजित हैं. अधिकतर द्रमुक कार्यकर्ता स्टालिन के साथ हैं, लेकिन 30 से 40 फीसदी कार्यकर्ता अलागिरी के पक्ष में है. द्रमुक का भविष्य लोकसभा चुनाव परिणाम से तय होगा. अगर यह पार्टी दहाई अंकों में पहुंचती है, तो एमके स्टालिन पार्टी के मुखिया बने रहेंगे. द्रमुक और अन्ना द्रमुक के बरक्स वायको की एमडीएमके, विजयकांत की डीएमडीके और डॉ एस रामादौस की पीएमके जैसी छोटी पार्टियों का कुछ जिलों में प्रभाव है.

तमिलों में सिनेमाई संस्कृति रची-बसी है. नरेंद्र मोदी ने राज्य के अपने छह दौरों में सिनेमा से जुड़ी अनेक हस्तियों से मुलाकात की है. हालांकि द्रमुक नेताओं का मानना है कि भविष्य में खतरा जयललिता से नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी से है. इसका कारण यह है कि करुणानिधि के बाद का राजनीतिक परिदृश्य बहुत जटिल है. पारिवारिक विवाद के कारण द्रमुक तमिलनाडु के भीतरी इलाकों में अपनी पकड़ नहीं बना सका है.

जहां तक बात तमिलनाडु कांग्रेस की है, उसमें वरिष्ठ नेता अधिक हैं और कार्यकर्ता कम. उनका कोई काडर नहीं है और न ही संगठन. यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि तमिलनाडु कांग्रेस के पास गांवों के मतदान केंद्रों पर खड़ा करने के लिए लोग तक नहीं हैं. 1989 में राजीव गांधी ने कार्यकर्ताओं को उत्साहित करने और कांग्रेस को सक्रिय करने के इरादे से राज्य के 15 दौरे किये थे. यह तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष जीके मूपनार की पहल थी. राजीव गांधी ने स्थानीय स्तर पर स्थिति को समझने की कोशिश की, लेकिन इससे कुछ सकारात्मक नहीं हो सका. बार-बार उड़ कर आनेवाले राजीव गांधी की इस कोशिश का राजनीतिक लाभ द्रमुक और उसके नेता करुणानिधि ने उठा लिया.

चूंकि ये चुनाव प्रचार के आखिरी दिन हैं, 2014 की चुनावी स्थिति में अंतर साफ दिख रहा है. नरेंद्र मोदी की रैलियों ने तमिलनाडु की विरोधी पार्टियों को उत्साहित तो किया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा भविष्य में इसका लाभ उठा सकेगी? और यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि नरेंद्र मोदी आगे भी वहां लगे रहें, ताकि जयललिता और करुणानिधि की द्रविड़ पार्टियों को दूसरे स्थान पर धकेल सकें.

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