मतदान का प्रतिशत बढ़ने के निहितार्थ

।। संजय कुमार।। (डायरेक्टर, सीएसडीएस) लोकसभा चुनाव, 2014 के अब तक संपन्न हुए चरणों में मतदान का बढ़ा प्रतिशत क्या संकेत कर रहा है? चुनावी बहस में बहुत से लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या मतदान प्रतिशत बढ़ना इस चुनाव में ‘मोदी लहर’ का सूचक है? इस सवाल के सही उत्तर तक पहुंचने के […]
।। संजय कुमार।।
(डायरेक्टर, सीएसडीएस)
लोकसभा चुनाव, 2014 के अब तक संपन्न हुए चरणों में मतदान का बढ़ा प्रतिशत क्या संकेत कर रहा है? चुनावी बहस में बहुत से लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या मतदान प्रतिशत बढ़ना इस चुनाव में ‘मोदी लहर’ का सूचक है? इस सवाल के सही उत्तर तक पहुंचने के लिए हमें पिछले कुछ वर्षो में हुए चुनावों पर नजर डालना चाहिए. पिछले तीन वर्षो के दौरान देश के विभिन्न राज्यों में हुए लगभग सभी विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत उससे पहले के विधानसभा चुनावों की तुलना में अधिक रहा है. उन चुनावों के दौरान भाजपा नेता नरेंद्र मोदी की भूमिका गुजरात के मुख्यमंत्री तक ही सीमित थी. यहां तक कि भाजपा शासित राज्यों में भी उनके नाम पर वोट नहीं मांगे गये थे. गैर-भाजपा शासन वाले राज्यों में तो उनकी भूमिका नहीं ही थी. इस तथ्य के आलोक में मोदी समर्थकों का यह दावा काल्पनिक ही लगता है कि इस लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता या उनकी अपील के कारण ही लोग मतदान केंद्रों पर उमड़ रहे हैं.
इस लोकसभा चुनाव में अब तक बढ़े मतदान प्रतिशत का जो सबसे ठोस कारण नजर आता है, वह है मतदान का महत्व बता कर मतदाताओं को जागरूक करने के लिए चलाया गया चुनाव आयोग का सक्रिय अभियान. हाल के वर्षो में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान भी चुनाव आयोग ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए कुछ ठोस प्रयास किये थे. इतना ही नहीं, हालिया कुछ चुनावों के दौरान मतदाताओं को जागरूक करने के लिए सिविल सोसाइटी और मीडिया की ओर से किये गये प्रयासों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. खासकर शहरी इलाकों में इस तरह के प्रयासों का अच्छा-खासा असर पड़ा है.
हालांकि मतदाताओं को प्रेरित करने में चुनाव आयोग की सक्रिय भूमिका को रेखांकित करने के पीछे मेरा मकसद राजनीतिक पार्टियों की भूमिका को नजरअंदाज करना नहीं है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि लोगों में राजनीति के प्रति उदासीनता खत्म करने में कुछ पार्टियों, खासकर आम आदमी पार्टी ने भी बड़ी भूमिका निभायी है. आम आदमी पार्टी के उभार ने बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को भी राजनीति से सक्रिय रूप से जुड़ने का मौका दिया, जो बेहद सीमित अवसर के कारण अब तक राजनीति के प्रति उदासीन बने हुए थे या इसके हाशिये पर थे. बड़ी संख्या में युवा, खासकर पेशेवर, इस नयी पार्टी से जुड़े. इसने न केवल नये लोगों को राजनीति से जुड़ने का मौका दिया, बल्कि खासकर शहरी मध्यवर्ग की राजनीति के प्रति धारणा भी काफी हद तक बदली. इन कारणों के आधार पर कहा जा सकता है कि लोकसभा चुनाव के आगामी चरणों में भी मतदान प्रतिशत अधिक रहेगा.
फिलहाल ऐसा कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है, जिसके आधार पर कहा जा सके कि इस चुनाव में मतदान प्रतिशत का बढ़ना ‘मोदी लहर’ के कारण मुमकिन हुआ है. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है, क्योंकि देश में कई ऐसे राज्य भी हैं, जहां मोदी या भाजपा का प्रभाव अब भी काफी सीमित है. खासकर पूरे पूवरेत्तर में मतदान संपन्न हो चुके हैं और उन सभी राज्यों में मतदान प्रतिशत बढ़ा है. पूवरेत्तर के राज्यों में भाजपा की उपस्थिति शायद ही कहीं है. इसके बावजूद इन राज्यों में मतदान प्रतिशत बढ़ने को ‘मोदी लहर’ का असर कैसे माना जा सकता है?
यह सही है कि 2014 की चुनावी जंग से जुड़े सभी प्रकार के अनुमानों में भाजपा अन्य पार्टियों से आगे दिख रही है, लेकिन पार्टी अब भी पूरे देश में अपनी पैठ नहीं बना सकी है. कई राज्यों में भाजपा इस चुनावी जंग की मुख्य पार्टी यानी पहले या दूसरे स्थान पर नहीं है. कुछ राज्यों में तो पार्टी की उपस्थिति नहीं के बराबर है. ऐसे में असली सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि क्या वास्तव में इस लोकसभा चुनाव में पूरे देश के स्तर पर कोई ‘मोदी लहर’ है? यह एक ऐसा सवाल है, जो 2014 की जंग में नुक्कड़ बहस के दौरान सबसे अधिक पूछा जा रहा है. जिन राज्यों में भाजपा मुख्य मुकाबले में है, वहां इस सवाल का ‘हां’ या ‘नहीं’ में सीधा जवाब देना लोगों को भले मुश्किल लग रहा हो, लेकिन
एक बात साफ तौर पर कही जा सकती है कि पार्टी के बजाय सिर्फ एक नेता, नरेंद्र मोदी, के इर्द-गिर्द इतने बड़े स्तर पर आक्रामक प्रचार अभियान चलाने के बावजूद भाजपा पूरे देश में ‘मोदी लहर’ पैदा करने में सफल नहीं हो सकी है. वास्तव में ‘मोदी लहर’ अब भी भाजपा समर्थकों तक ही सिमटा दिख रहा है. इस चुनाव में भाजपा समर्थकों के उत्साह का बड़ा कारण नरेंद्र मोदी का ‘करिश्मा’ नहीं, बल्कि देश में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के प्रति व्यापक निराशा का माहौल है. यह देशव्यापी निराशा ही 2014 की चुनावी जंग में भाजपा को अन्य पार्टियों से आगे ले जा रही है.
हां, मोदी की अपील का फायदा भाजपा को कुछ राज्यों में जरूर होता दिख रहा है. खासकर उन राज्यों में, जहां पिछले चुनावों के दौरान भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी रही है या जहां उसने क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गंठबंधन किया है. मसलन, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा और ओड़िशा जैसे राज्यों में मोदी की अपील के कारण भाजपा का मत प्रतिशत बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है. इन राज्यों में भाजपा को पहले से अधिक सीटें मिलने की पूरी संभावना है. लेकिन हकीकत यही है कि ज्यादातर लोग भाजपा को इसलिए वोट दे रहे हैं या देंगे, क्योंकि वे केंद्र में सत्ता परिवर्तन चाहते हैं और उन्हें लगता है कि राष्ट्रीय स्तर पर इस वक्त सिर्फ भाजपा ही कांग्रेस का विकल्प बनने में सक्षम है.
इस तरह हम कह सकते हैं कि मतदान प्रतिशत बढ़ने के मुख्य कारण मतदाताओं की जागरूकता के लिए चुनाव आयोग, सिविल सोसाइटी, मीडिया और राजनीतिक पार्टियों द्वारा किये गये प्रयासों के साथ-साथ कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ उपजी व्यापक निराशा है. भाजपा की बढ़त का मुख्य कारण भी उसकी लोकप्रियता या ‘मोदी लहर’ नहीं, बल्कि यूपीए सरकार के प्रदर्शन के प्रति शहर से लेकर गांव तक सभी वर्गो में उपजी निराशा ही है. यह निराशा मुख्यत: दो कारणों से पैदा हुई है. पहला, भ्रष्टाचार बढ़ने के साथ-साथ मंत्रियों की मिलीभगत से हुए बड़े-बड़े घोटाले और दूसरा, बीते कुछ वर्षो के दौरान कमरतोड़ महंगाई पर नियंत्रण नहीं हो पाना. निराशा के इस माहौल में राष्ट्रीय स्तर पर कोई अन्य मजबूत विकल्प नहीं होने का फायदा स्वाभाविक रूप से भाजपा को मिला है. हाल में भाजपा जिन राज्यों के विधानसभा चुनावों में दोबारा सत्ता में लौटी है, वहां भी इसका कारण ‘मोदी लहर’ नहीं, बल्कि राज्य सरकार की पहली पारी का संतोषजनक प्रदर्शन रहा है.
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